Srishti Khanda Extracted Page 184

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-184

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Sanskrit Original

बह्वातोद्यसमुत्पन्नसमूहस्वननादिता । लयतालयुतानेकगीतवादित्रशोभिता ॥९२॥ सभाकांतिमती नाम देवानां शर्मदायिका। ऋषिसंघसमायुक्ता मुनिबंदनिषेविता ॥१३॥ द्विजातिसामशब्देन नादितानंददायिनी । तस्यां निविष्टो देवेशस्संघ्यासक्तः पितामहः ॥१४॥ ध्यायतिस्म परंदेवं येनेदं निर्मितं जगत् । ध्यायतो बुद्धिरुत्पन्ना कथं यज्ञं करोम्यहम् ॥१५॥ कस्मिन्स्थाने मया यज्ञः कार्यः कुत्र धरातले। काशी प्रयागस्तुंगाच नैमिषं श्रंखलं तथा ॥१६॥ कांची भद्रा देविका च कुरुक्षेत्रं सरस्वती । प्रभासादीनि तीर्थानि पृथिव्यामिह मध्यतः ॥१७॥ क्षेत्राणि पुण्यतीर्थानि संति यानीह सर्वशः । मदादेशाच्च रुद्रेण कृतान्यन्यानि भूतले ॥१८॥ यथाहं सर्वदेवेषु आदिदेवो व्यवस्थितः । तथाचैकं परं तीर्थमादिभूतं करोम्यहम् ॥१९॥ अहं यत्र समुत्पन्नः पद्य तद्विष्णुनाभिजम् । पुष्करं प्रोच्यते तीर्थमृषिभिवेदपाठकैः ॥२०॥ एवं चिंतयतस्तस्य ब्रह्मणस्तु प्रजापतेः । मतिरेषा समुत्पन्ना व्रजाम्येष धरातले ॥२९॥ प्राक्स्थानं स समासाद्य प्रविष्टस्तद्वनोत्तमम्। नानाद्टुमलताकीर्ण नानापुष्पोपशोभितम्॥२ २॥ नानापक्षिरवाकीर्ण नानामृगगणाकुलम् । द्ुमपुष्पभरामोदै ् वासयद्यत्सुरासुरान् ॥२३॥ बुद्धिपूर्वमिवन्यस्तैः पुष्पैर्भूषित भूतलम् । नानागंधरसैः पक्वापक्वैश्च षड्तुद्धूवैः ॥२४॥ फलैः सुवर्णरूपाढ्यै ध्राणदृष्टिमनोहरैः । जीर्णपत्रं तृणं यत्र शुष्ककाष्ठफलानि च॥२५॥ बहिः क्षिपति जातानि मारुतोनुग्रहादिव । नानापुष्पसमूहानां गंधमादाय मारुतः ॥२६॥ में लगे करोड़ों दर्पणों से सुशोभित, अप्सराओं के नृत्य विलास के उल्लास से सुशोभित ॥११॥ अनेक प्रकार के आतोद्य (वाद्य सामग्री) की ध्वनि से निनादित, लय तथा ताल से युक्त अनेक गीतों तथा वाद्यों से सुशोभित ॥१२॥ देवताओं को सुख देने वाली कान्तिमती नाम की सभा है । वह ऋषियों के समुदाय से युक्त तथा मुनिवृंद से सेवित हैं ॥१३॥ ब्राह्मणों की सामध्वनि से निनादित होने के कारण वह आनन्दप्रद है । उसके बीच में ब्रह्माजी बैठते हैं॥ १४॥ वे वहाँ पर सम्पूर्ण जगत् के निर्माता परंबह्य का ध्यान करते हैं । वहीं पर ध्यान करते समय उनकी बुद्धि उत्पन्न हुयी कि मैं कैसे यज्ञ करूं 2॥१५॥ मुझे पृथिवी के किस स्थान पर यज्ञ करना चाहिए । काशी तीर्थ, प्रयाग तीर्थ, तुंगातीर्थ, नैमिषतीर्थ, श्रृंखल तीर्थ ॥१६॥ काञ्चीपुरी, भद्रानदी, देविकानदी, कुरुक्षेत्र तीर्थ, सरस्वती नदी, प्रभासक्षेत्र इत्यादि पृथिवी पर विद्यमान सभी तीर्थो में ॥१७॥ तथा मेरे एवं रुद्र के आदेश से जो तीर्थ हो गये हैं॥ १८॥ उसीतरह से मैं सभी देवताओं में आदि देवता हूँ उसी तरह मैं एक सर्वोत्तम तीर्थ को बना देता हूँ ॥१९॥ जहाँ पर में उत्पन्न हुआ था भगवान् विष्णु की नाभि से उत्पन्न होने वाले कमल को वेद पाठक ऋषिंगण पुष्कर तीर्थ कहते हें ॥२०॥ इसतरह से विचार करते हुए ब्रह्माजी के मन में यह बात आयी कि सर्वप्रथम मैं पृथिवी पर चलूं ॥२१॥ सर्वप्रथम वे उस स्थान पर आकर उस उत्तम वन में प्रवेश किए । वह वन अनेक प्रकार के वृक्षों, लताओं तथा उनके पुष्पो से सुशोभित था ॥२२॥ वहाँ पर अनेक प्रकार के पक्षी बोल रहे थे तथा वहाँ पर अनेक प्रकार के मृग थे । वह वन वृक्षों के पुष्प समूह की सुगन्धि से देवताओं तथा असुरों को सुगन्धित बना रहा था॥२३॥ समझ-बुझकर पुष्पो से सजायी गयी के समान वहाँ की भूमि थी । अनेक प्रकार के गन्धों एवं रसों से युक्त देखने में सुन्दर, ध्राण, दृष्टि तथा मन को आकृष्ट करने वाले छहो ऋतुओं में उत्पन्न होने वाले, कच्चे पके फलों के रस की सुगन्धि से युक्त था वह वन वहाँ के सूखे पत्ते, घास फल तथा काष्ठों को जो वहाँ पर होते थे, उनको वायु कृपा करके बाहर फेंक देने का काम करते थे । अनेक प्रकार के पुष्प समूह के गन्ध को लेकर ॥२४-२६॥ शीतल वायु चलती थी और

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