Srishti Khanda Extracted Page 183

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-183

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Sanskrit Original

पन्द्रहवा अध्याय भीष्म उवाच किं कृतं ब्रह्मणा ब्रहाग्रेष्य वाराणसी पुरीम्। जनार्दनेन किं कर्म शंकरेण च यन्मुने ॥१॥ कथं यज्ञः कृतस्तेन कस्मिस्तीर्थे वदस्व मे। के सदस्या ऋत्विजश्च सर्व्तान्प्रब्रवीहि मे ॥२॥ के देवास्तर्पितास्तेन एतन्मे कौतुकं महत् । पुलस्त्य उवाच श्रीनिध।न पुरं मेरोः शिखरे रत्मचित्रितम् ॥३॥ अनेकाश्चर्यनिलयं बहुपादपसंकुलम्। विचित्रधातुभिश्चित्रं स्वच्छस्फटिकनिर्मलम् ॥४॥ लतावितानशोभाढ्यं शिखिशब्दविनादितम्। मृगेन्द्ररववित्रस्तगज यूथसमाकुलम् ॥५॥ निर्झरांबुप्रपातोत्थ शीकरासारशीतलम्। वाताहततरुत्रातप्रसन्नापानचित्रितम् ॥६॥ मृगनाभिवरामोदवासिताशेषकाननम् । लतागृहरतिश्रान्तसुप्तविद्याधराध्वगम् ॥७॥ प्रगीतकिन्नरव्रातमधुरध्वनिनादितम् । तस्मिन्ननेक विन्यासशोभिताशेषभूमिकम् ॥८॥ वैराजं नाम भवनं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । तत्र दिव्यांगनोद्रीतमधुरध्वनिनादिता ॥९॥ पारिजाततरूत्पन्नमंजरीदाममालिनी । रत्नरश्मिसमूहोत्थबहुवर्णविचित्रिता ॥१०॥ विन्यस्त स्तभकोटिस्तु निर्मलादर्शशोभिता । अप्सरोतृत्यविन्याससविलासोल्लासलासिता ॥९९॥ सुमेरु पर्वत पर वैराज भवन की कान्तिमती सभा में ब्रह्माजी के चिन्ता करने के पश्चात् पृथिवी पर जाकर ब्रह्माजी का वृक्षो को वर प्रदान करने के प्रसङ्ग में वहाँ पर निवास करने का वर्णन, विष्णु के साथ सभी देवों का प्रथिवी पर जाना, ब्रह्माजी का देवताओं को उपदेश, पुष्कर तीर्थ की उत्पत्ति तथा वहाँ पर निवास विधि का वर्णन, तीन प्रकार की भक्तियों तथा पुष्कर तीर्थ में मरने तथा निवास करने का फल, ब्राह्मणों का लक्षण तथा आश्रम धर्म का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- हे मुने ! शङ्करजी को वाराणसी में भेजकर ब्रह्माजी ने तथा भगवान् विष्णु ने कौन सा कर्म किया ?।।१।। आप बतलायें कि ब्रह्माजी ने किस तीर्थ में कौन सा यज्ञ किया ? उस याज्ञ के सदस्य कौन थे ? तथा ऋत्विकृगण कौन हुए ? इन सारी बातों को आप मुझे बतलायें ॥२॥ मुझे यह भी उत्कण्ठा है कि उस यज्ञ के आराध्य देवता कौन थे ? पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- सुमेरु पर्वत के शिखर पर रत्नों से जटित श्रीनिधान पुरी है।।३।। वह अनेक आश्चर्यो तथा बहुत वृक्षों से व्याप्त है अनेक धातुओं से सुशोभित, स्वच्छ स्फटिक मणि के कारण वह पुरी निर्मल बनी हुयी है ॥४॥ लताओं की शोभा से सम्पन्न उस नगरी में मयूरों की ध्वनि सुनायी देती रहती है । वहाँ पर सिंहों की ध्वनि से भयभीत बना हुआ हाथियों का समूह रहता है ॥५॥ झरनों से बहने वाले जल के कणों से शीतल वायु से आन्दोलित, वृक्ष समूह से सुशोभित ॥६॥ उस नगरी के वन कस्तूरी की सुगन्धि से सुगन्धित हैं ।रीतिक्रीडा से श्रान्त विद्याधरं का समूह वहाँ के लतागृह में शयन करतां है ॥७।। वह नगरी किन्नरों के गायन ध्वनि से निनादित होती रहती है । वहाँ की सम्पूर्ण भूमि अनेक प्रकार के सजावटों से सुशोभित होती रहती है।॥८॥ वहाँ पर वैराज नामक ब्रह्माजी का भवन है । उस भवन में दिव्याङ्गनाओं की ध्वनि से निनादित ॥९॥ पारिजात वृक्ष की मञ्जरियों की माला से युक्त, रत्नों की कान्तिसमूह से जन्य अनेक वर्णो से विचित्रित ॥१०॥ स्तम्भों

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