Srishti Khanda Extracted Page 182

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-182

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Sanskrit Original

प्रपितामहास्तथादित्या इत्येषा वैदिकी श्रुतिः । त्रिविधः पिंडदानाय विधिरुक्तो मयानघ ॥२०४॥ मानुषैः पिंडदानं तु कार्यमत्रागतैस्सदा | पिंडदानं च तत्रैव स्वपुत्रैः कार्यमादरात् ॥२०५॥ सुपुत्रास्ते पितृणां तु भवंति सुखदायकाः । प्रोक्तं तीर्थ मया तुभ्यं दर्शनादपि मुक्तिदम् ॥२०६॥ स्नात्वा तु सलिले तत्र मुच्यते जन्मबंधनात्। विमुक्ते ब्रह्माहत्यायास्तत्र रूद्रयथासुखम् ॥२०७॥ अविमुक्ते मया दत्ते तिष्ठ त्वं भार्यया सह। रुद्र उवाच पृथिव्यां यानि तीर्थानि तेष्वहं विष्णुना सह ॥२०८॥ तिष्ठामि भवतोक्तेन वर एष वृतो मया । अहं देवो महादेव आराध्यो भवता सदा ॥२०९॥ वरं दास्यामि तं चाहं संतुष्टेनांतरात्मना । विष्णोश्चाहं प्रदास्यामि वरांश्च मनसीप्सितान् ॥२१०॥ सुराणां चैव सर्वेषां मुनीनां भवितात्मनाम्। अहं दाता अहं याच्यो नान्यो भाव्यः कथंचन॥२११॥ ब्रह्मोवाच एवं करिष्येऽहं रुद्र यत्वयोक्तं वचः शुभम् । नारायणश्च ते वाक्यं कर्ता सर्व न संशयः ॥२९२॥ विसृज्यैवं तदा रुद्रं ब्रह्मा चांतरधीयत । वाराणस्यां महादेवो गत्वातीर्थ न्यवेशयत् ॥२१३॥ इति श्रापद्ममहापुराण प्रथमे सृष्टिखंडे रुद्रस्य ब्रह्मवध्यानाशश्चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४॥ —— नकमरशा का परित्याग कर देते हैं; वे निश्चित रूप से भक्त हैं । उनके पितृगण वसु हो जाते हैं, पितामह रुद्र हो जाते है॥२०३॥ और उनके प्रपितामह आदित्य हो जाते हैं, यह वेदों के वाक्य बतलाते हैं । हे अनघ ! मैंने तीन प्रकार के पिण्डदान की विधि वतलायी है ॥२०४॥। इस क्षेत्र में आये मनुष्यों को पिण्डदान अवश्य करना चाहिए । पुत्रों को भी अपने पिता का पिण्डदान वहीं आदर पूर्वक करना चाहिए ॥२०५॥ ऐसे सुपुत्र अपने पितरों को सुख देने वाले होते है । मैंने जिस तीर्थ को तुम्हें बतलाया है वह दर्शन करने मात्र से भी मुक्ति प्रदान करने वाला है ॥२०७॥ मैंने तुम्हे अविमुक्त तीर्थ प्रदान किया है, वहाँ पर तुम अपनी पत्नी के साथ निवास करो । रुद्र ने कहा-- पृथिवीं में जितने तीर्थ हैं, उन सवों में में भगवान् विष्णु के साथ आपकी आज्ञा के अनुसार निवास करूँ यह वरदान मैंने आप से माँगा । हे महादेव ! में आपके द्वारा आराध्य देव होऊं ॥२०८-२०९॥ सन्तुष्ट अन्तरात्मा वाला होकर मैं भी आपको वरदान प्रदान करूँगा । में भगवान् विष्णु को भी उनके अभिलाषित वरों को प्रदान करूँगा ॥२१०॥ सभी देवताओं तथा सभी भक्ति प्रवण ऋषियों को वरदान देने वाला मैं ही होऊं । वे मुझसे ही याचना करें । वहाँ कोई दूसरा दाता और याच्य न हो ॥२१९१। ब्रह्माजी ने कहा-- हे रुद्र जो कुछ तुमने कहा है, मैं वहीं करूँगा । भगवान् नारायण भी तुम्हारे वाक्यों का पालन करने वाले होयेंगे ॥२१२॥ इसतरह से रुद्र को विदा करके ब्रह्माजी भी अन्तर्धान हो गये । महादेव भी वाराणसी तीर्थ में जाकर निवास करने लगे । इस तरह श्रीपद्ममहापुण के प्रथम सृष्टिखण्ड के रुद्र की ब्रह्महत्या का नाश नामक चौदहवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीप्राचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ॥१४॥ te

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