Srishti Khanda Extracted Page 181

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-181

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Sanskrit Original

c mm 9 श्रोपद्यमहापुराण ते मृता हंसयानेन दिवं यांत्यकुतोभया: । पंचक्रोशप्रमाणेन क्षेत्रं दत्तं मया तव ॥१८८॥ षेत्रमध्याद्यदा गंगागमिष्यति सरित्पतिम् । तदासा महतीपुण्या पुरी रुद्र भविष्यति ॥१८९॥ पुण्या चोदडमुखी गंगा प्राची चापि सरस्वती । उदङ्मुखी योजने द्वे गच्छेते जाह्ववी नदी॥१९०॥ तत्र वै विवुधाः सर्वे मया सह सवासवाः। आगता वासमेष्यंति कपालं तत्र मोचय ॥१९१॥ तस्मिस्तीर्थे तु ये गत्वा पिंडदानेन वैपितृन् । श्राद्धैस्तु प्रीणयिष्यंति तेषां लोकोऽ क्षयो दिवि॥१९२॥ वाराणस्यां महातीर्थे नर: स्मातो विमुच्यते । सप्तजन्मकृतात्पापाद्वमनादेव मुच्यते ॥१९३॥ तत्तीर्थं सर्वतीर्थानामुत्तमं परिकीर्तितम्। त्यजंति तत्र ये प्राणाऱ्प्राणिनः प्रणतास्तव ॥१९४॥ रुद्रत्वं ते समासाद्य मोदंते भवता सह। तत्रापि हि तु यद्दत्तं दानं रुद्रयतात्मना ॥१९५॥ स्यान्महच्च फलं तस्य भविता भावितात्मनः । स्वांगस्फुटित संस्कारं तत्र कुर्वति ये नराः ॥१९६॥ ते रुद्रलोकमासाद्य मोदंते सुखिनः सदा । तत्र पूजा जपो होमः कृतो भवति देहिनाम्॥९९७॥ अनंतफलदः स्वर्गो रुद्रभक्तियुतात्मनः । तत्र दीपप्रदाने तु ज्ञानचक्षुर्भवेन्नरः ॥१९८॥ अव्यंगं तरुणं सौम्यं रूपवंतं तु गोसुतम्। योङ्कयित्वा मोचयति सयाति परमं पदम् ॥१९९॥ पितृभि: सहितो मोक्षं गच्छते नात्र संशयः । अथ किं बहुनोक्तेन यत्तत्र क्रियते नरैः ॥२००॥ कर्मधर्मसमुद्दिश्य तदनंतफलं भवेत् । स्वर्गापवर्गयोहेतुस्तद्धितीर्थम्मतं झुवि ॥२०१॥ स्नानाज्जपात्तथाहोमादनंतफल साधनम् । गत्वा वाराणसीं तीर्थ भक्त्या रुद्र परायणः॥२०२॥ ये तत्र पंचतां प्राप्ता भक्तास्ते नात्रसंशयः । वसवः पितरो ज्ञेया रुद्राश्चैव पितामहाः ॥२०३॥ सवार होकर निर्भय होकर स्वर्गलोक जाते हैं । उस पाँच कोस के वीच का क्षेत्र में तुम्हें दे रहा हूँ ॥१८८॥ उस क्षेत्र के बीच से होकर गङ्गा नदी समुद्र में मिलेगी । हे रुद्र ! उस समय वह पुरी अत्यन्त पुण्यमयी हो जायेगी ॥१८९॥ उत्तर वाहिनी गङ्गा तथा पूर्व वाहिनी सरस्वती नदी ये दोनों अत्यन्त पवित्र हैं । वहाँ पर दो योजन पर्यन्त गङ्गा नदी उत्तर वाहिनी हैं ॥१९०॥ वहीं पर इन्द्र इत्यादि समी देवता तथा में आकर निवास करेंगे । वहीं पर तुम कपाल का मोचन करो ।।१९१॥ उस क्षेत्र में जाकर जो लोग श्राद्ध के द्वारा अपने पितरों को प्रसन्न करेंगे वे लोग मरने के बाद स्वर्ग के अक्षय लोकों में जायेंगे ॥१९२॥ वाराणसी तीर्थ में स्नान करने मात्र से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है, और उसके सात जन्मों के पाप उस तीर्थ में जाने मात्र से विनष्ट हो जाते हें ॥१९३॥ उस तीर्थ में जो कोई भी तुम्हारा भक्त प्राणी अपने प्राणों का परित्याग करेंगे वे ॥१९४॥ रुद्रत्व को प्राप्त करके आपके साथ आनन्दानुभव करेंगे । हे रुद्र ! वहाँ पर यदि कोई जितेन्द्रिय रहकर दान करता है ॥१९५॥ तो उसके कारण उसको महान फल की प्राप्ति होती हैं । वहाँ पर जो मनुष्य स्वांग स्फुटित संस्कार करते हैं ॥१९६॥ वे सुख पूर्वक रुद्रलोक मे जाकर आनन्दानुभव करते हैं । वहाँ पर रुद्रभक्त मनुष्यों द्वार की गयी पूजा, जप तथा होम ॥१९७॥ अनन्त फल प्रदान करता है । वहाँ पर दीपदान करके मनुष्य ज्ञानचक्षु हो जाता है ॥१९८॥ जो व्यक्ति सीधा, युवक तथा सौम्य रूप वाले सांड को त्रिशूल से दाग कर छोड़ देता है, वह परमपद को प्राप्त करता हैं ॥१९९॥ वह अपने पितरों के साथ मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई भी सन्देह नहीं है बहुत अधिक कहने से क्या लाभ है ? मनुष्यों द्वारा वहाँ धर्म के उद्देश्य से जो कोई भी कर्म किया जाता हैं, वह अनन्त फल प्रदान करने वाला होता है । वह भूलोक में स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले तीर्थ के रूप में प्रख्यात है ॥२००-२०१॥ वहाँ पर स्नान, जप तथा होम करने से अनन्त फल की प्राप्ति होती है । जो रुद्रभक्त व्यक्ति वाराणसी तीर्थ में जाकर ॥२०२॥ अपने पाँच भौतिक शरीर

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