Srishti Khanda Extracted Page 180

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-180

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

दिव्यव्रतोपचारेण सोहमाराधितस्त्वया । भवता श्रद्धयात्यर्थं ममदर्शनकांक्षया॥१७५॥ व्रतस्था मां हि पश्यंति मनुष्या देवतास्तथा। तदिच्छया प्रयच्छामि वरं यत्प्रवरं वरम् ॥१७६॥ सर्वकामप्रसिद्ष्यर्थं व्रतं यस्मान्निषेवितम्। मनोवाक्कायभावैश्च संतुष्टेनांतरात्मना ॥१७७॥ कं ददामि च वै कामं वद भोस्ते यथेप्सितम्। रुद्र उवाच एष एवाद्य भगवन्सुपर्याप्तो महावरः ॥१७८॥ यददृष्टोसि जगद्ठंद्य जगत्कर्तर्नमोस्तुते। महता यज्ञसाध्येन बहुकालार्जितेन च ॥९७९॥ प्राणव्ययकरेणत्वं तपसा देवदृश्यते । इमं कपालं देवेश न करात्पतितं विभो ॥१८०॥ त्रपाकरा ऋषीणां च चर्यैषा कुत्सिता विभो । त्वत्प्रसादाद्व्रतं चेदं कृतं कापालिकं तु यत्॥९८९॥ सिद्धमेतत्प्रपन्नस्य महाब्रतमिहोच्यताम् । पुण्यप्रदेशे यस्मिंस्तु क्षिपामीदं वदस्व मे ॥१८२॥ पूतो भवामि येनाहं मुनीनां भावितात्मनाम् । ब्रह्मोवाच अविमुक्तं भगवतः स्थानमस्ति पुरातनम् ॥१८ ३॥ कपालोचनं तीर्थ तव तत्र भविष्यति । अहंच त्वं स्थितस्तत्र विष्णुश्नापि भविष्यति ॥१८४॥ दर्शने भवतस्तत्र महापातकिनोपि ये। तेऽपि भोगान्समश्रंति विशुद्धाभवने मम ॥१८५॥ वरणापि असीचापि द्वे नद्यौ सुरवल्लभे । अंतराले तयो: क्षेत्रे वध्या न विशति क्वचित्॥९८६॥ तीर्थानां प्रवरं तीर्थ क्षेत्राणां प्रवरं तव । आदेहपतनाद् ये तु क्षेत्रं सेवंति मानवाः ॥१८७॥ उसी समय शङ्करजी की भक्ति से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी वहाँ आये । प्रणाम करने वाले रुद्र को उठाकर ब्रह्माजी कहे तुम्हारे इस दिव्य ब्रतोंपचार के द्वारा, में तुमसे आराधित हो चुका हूँ, मेरा दर्शन पाने की अभिलाषा से आपने यह श्रद्धा पूर्वक व्रत किया ह ॥। १७४-१७५॥। व्रत करने वाले ही देवता तथा मनुष्य मेरा दर्शन कर पाते हैं । अतएव मैं अपनी इच्छा से तुम्हें वरदान प्रदान करता हूँ ॥१७६॥ चूकि तुमने अपनी सभी कामनाओं की सिद्धि के लिए मन,वाणी तथा शरीर से तथा सन्तुष्ट अन्तरात्मा से मेरा व्रत किया है ॥१७७॥ अब बतलाओं मैं तुम्हारी किस इच्छा को पूर्ण करूं ? जो तुम्हें अभिप्रेत हो उसे तुम बतलाओ । रुद्र ने कहा-- हे भ^वन् ! आपका दर्शन ही महान वर पर्याप्त है ॥१७८॥ हे जगत् कर्ता ब्रह्माजी ! आपने मुझे दर्शन दिया है । आपको नमस्कार है । बहुत काल से अर्जित पुण्य से तथा महान यज्ञ करने से तथा बहुत बड़ी तपस्या से आपका दर्शन मिलता है । हे विभो ! यह कपाल अभी तक मेरे हाथ से नहीं गिरा ॥१८०॥ हमारा यह आचरण ऋषियों के बीच में लज्जास्पद है । आपकी ही कृपा से मैंने यह कपालिक व्रत लिया है ॥१८१॥ आपके शरणागत हूँ, अतएव आप इसे पूरा कर दीजिये । आप यह भीबतलायें कि मैं इसको किस पुण्य स्थान में फेंकू ॥१८२॥ जिससे पवित्र मुनियों के बीच में मैं पवित्र हो जाऊं । ब्रह्माजी ने कहा-- श्रीभगवान् का प्राचीन स्थान अविमुक्तक्षेत्र वाराणसी है ॥१८३॥ वहीं पर तुम्हारा कपाल मोचन तीर्थ होगा । वहाँ पर मैं, तुम तथा विष्णु तीनों निवास करेंगे ॥१८४॥ वहाँ पर महापातकी पुरुष भी यदि आपका दर्शन करेंगे तो वे शुद्ध होकर मेरे लोक में जायेंगे ॥१८५॥ वरुणा तथा अस्सी ये दोनों नदियाँ देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं । उन दोनों नदियों के बीच के क्षेत्र में कोई भी पापी प्रवेश नहीं करता है ॥९८६॥ वह आपका सर्वोत्तम तीर्थ तथा सर्वोत्तम क्षेत्र है । जो मनुष्य जीवन भर उस क्षेत्र में निवास करते हैं ॥१८७॥ वे मरकर हंस विमान पर

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know