Srishti Khanda Extracted Page 179

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-179

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Sanskrit Original

प्रीपद्ममहापुराण इदानीं त्वं महाबाहो ब्रह्मणोक्तं समाचर । भस्म सर्वाणि गात्राणि त्रिकालं घर्षयेस्तनौ ॥९५९॥ शिखायां कर्णयोश्चैव करे चास्थीनि धारय । एवं च कुर्वतो रुद्र कष्टं नैव भविष्यति ॥१६०॥ संदिश्यैवं स भगवांस्ततोंतर््डानमीश्वरः । लक्ष्मीसहायो गतवान् रुद्रस्तं नाभिजज्ञिवान् ॥१६९॥ कपालपाणिर्देवेशः पर्यटन् वसुधामिमाम् । हिमवंतं समैनाकं मेरुणा च सहैव तु॥१६२॥ कैलासं सकलं विध्यं नीलं चैव महागिरिम्। कांची काशीं ताम्रलिप्तां मगधामाविलां तथा ॥१६३॥ वत्सगुल्मं च गोकर्ण तथा चैवोत्तरान्कुरून् । भद्राश्चं केतुमालं च वर्षहैरण्यकं तथा ॥१६४॥ कामरूपं प्रभासं च महेन्द्रं चैवपर्वतम् । ब्रह्महत्याभिभूतोऽसौ भ्रमंस्त्राणं नविंदति॥१६५॥ त्रपान्वितः कपालं तु पश्यन् हस्तगतं सदा | करौ विधुन्वन्बहुशो विक्षिप्तश्च मुहुर्मुहुः ॥१६६॥ यदास्य धुन्वतोहस्तौ कपालं पतते न तु । तदास्यबुद्धिरुत्पन्ना व्रतं चैतत्करोम्यहम् ॥१६७॥ मदीयेनैव मार्गेण द्विजा यास्यंति सर्वतः । ध्यात्वैवं सुचिरं देवो वसुधां विचचार ह ॥१६८॥ पुष्करं तु समासाद्य प्रविष्टोरण्यमुत्तमम् । नानाद्ुमलताकीर्ण नानामृगरवाकुलम्॥ ९६ ९॥ द्रुमपुष्पभरामोदवासितं यत्सुवायुना । बुद्धिपूर्वमिव न्यस्तैः पुष्पै भूषितभूतलम् ॥१७०॥ नानागंधरसैरन्यैः पक्वापक्वैः फलैस्तथा । विवेश तरुबृंदेन पुष्पामोदाभिनंदितः ॥ १७ ९॥ अत्राराधयतो भक्तद्या ब्रह्मा दास्यति मे वरम् । ब्रहाप्रसादात्ंप्राप्तं पौष्करं ज्ञानमीप्सितम् ॥९७२॥ पापघ्नं दुष्टशमनं पुष्टिश्रीबलवर्द्धनम् । एवं वै ध्यायतस्तय रुद्रस्यामिततेजसः ॥१७३॥ आजगाम ततो ब्रह्मा भक्तिप्रीतोऽ थकंजजः । उवाच प्रणतं रुद्रमुत्थाप्य च पुनर्गुरुः ॥१७४॥ है ।।१५८।। अतएव हे महाबाहो ! ब्रह्माजी ने जो कहा है, उसी को आप इस समय करें । आप तीनों कालों में सम्पूर्ण शरीर में भस्म मलें ॥१५९॥ आप शिखा, दोनों कान तथा हाथ में हड्डी धारण करें । हे रुद्र ! ऐसा करने से आपको कष्ट नहीं होगा ॥१६०॥ इस तरह से निर्देश करके भगवान् अन्तर्धान हो गये । वे लक्ष्मीजी के साथ चले गये; किन्तु रुद्र उसे नहीं जान सके ॥१६१॥ हाथ में कपाल लिए शङ्करजी ऐथिवी पर घूमते हुए, हिमालय नामक पर्वत, सुमेरु पर्वत, कैलास पर्वत सम्पूर्ण विन्ध्य पर्वत, महान् नीलगिरि पर तथा काञ्चपुरी, काशीपुरी, ताम्रलिप्तापुरी मगध, वत्सगुल्म तीर्थ, गोकर्ण तीर्थ, उत्तरकुरु (कुरुक्षेत्र) भद्राश्व वर्ष, केतुमाल वर्ष पर अपने हाथ को देखते हुए गये, हिरण्य वर्ष, कामरूप, प्रभास क्षेत्र तथा महेन्द्र पर्वत पर वे गये । किन्तु ब्रह्महत्या से अभिभूत होने के कारण उनको कहीं भी शान्ति नहीं मिली ॥१६२-१६५॥ हाथ में ही सदा कपाल के सटे रहने के कारण वे अत्यन्त लज्जित थे । वे बार-बार प्रायः अपने हाथ को झटकते थे ॥१६६॥ दोनों हाथों के झटकने पर भी कपाल नहीं गिरता था तब उनको इस बात का ज्ञान हुआ कि मैं इस व्रत को करूं ॥१६७॥ सभी ब्राह्मण मेरा ही अनुगमन करेंगे । इसतरह से ध्यान करके शङ्करजी बहुत समय तक पृथिवी पर घूमते रहे ॥१६८॥ वे पुष्कर तीर्थ में जाकर वहाँ के श्रेष्ठ वन में प्रवेश कर गये । वहाँ पर अनेक प्रकार के वृक्ष और लतायें थीं तथा अनेक प्रकार के पक्षी बोलते रहते थे । वृक्षों के पुष्पों की सुगन्धि से युक्त उसे वायु सुगन्धित बना रही थी । लग रहा था की उस वन की भूमि को कोई दूसरा पुष्पों से भूषित कर दिया हो ॥१६९-१७०॥ वह वन कच्चे पके फलों से भरा था । वृक्ष समूह के द्वारा पुष्पों की सुगन्धि से अभिनंदित शङ्करजी उस वन में प्रवेश कर गये ॥१७१॥ यहाँ पर आराधना करने से ब्रह्माजी मुझे वरदान देंगे । ब्रह्माजी की ही कृपा से मुझे पुष्कर का ज्ञान हुआ था ॥१७२॥ यह तीर्थ पाप का नाश करने वाला, पुष्टि को बढाने वाला ऐश्वर्य तथा बल को बढाने वाला है । जब अमित तेजस्वी शङ्करजी इस तरह से ध्यान कर रहे थे ॥१७३॥

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