Srishti Khanda Extracted Page 178
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-178
Sanskrit Original
सहस्रशीर्षं देवेशं सहस्राक्षं महाभुजम्। जगत्संव्याप्यतिष्ठंतं नमस्ये परमेश्वरम् ॥१४८॥ शरण्यं शरणं देवं विष्णुं जिष्णुं सनातनम्। नीलमेघप्रतीकाशं नमस्ये वारिजेक्षणम् ॥१४९॥ शुद्धं सर्वगतं नित्यं व्योमरूपं सनातनम् । भावाभावविनिर्मुक्तं नमस्ये सर्वगं हरिम् ॥१५०॥ न चात्र किचित्पश्यामि व्यतिरिक्तं तवाच्युत । त्वन्मयं च प्रपश्यामि सर्वमेतच्चराचरम् ॥१५१॥ एवं तु वदतस्तस्य रूद्रध्य परमेष्ठिनः । इतीरितस्तेन सनातनः स्वयं परात्परस्तस्य बभूव दर्शने ॥९ ५ २॥ रथांगपाणि र्गरुडासनो गिरिं विदीपयन्भास्करवत्समुत्थितः । वरं वृणीष्वेति सनातनोऽब्रवीद्वरस्तवाहं वरदः समागतः ॥९५३॥ इतीरिते रुूद्रवरो जगाद ममातिशुद्धिर्भविता सुरेश । न चास्य पापस्य हरंहिचान्यत्संदृश्यतेऽ ग्य च ऋते भवंतम् ॥१५४॥ ब्रह्महत्याभिभूतस्य तनुर्मेकृष्णतां गता । शवगंधश्च मे गात्रे लोहस्याभरणानि मे ॥१५५॥ कथं मे न भवेद्देवमतद्रूपं जनार्दनम् । किंकरोमि महादेव येन मे पूर्विका तनूः॥१५६॥ त्वत्प्रसादेन भविता तन्मेकथय चाच्युत । विष्णुरुवाच ब्रह्मवध्या परा चोग्रा सर्वकष्टप्रदापरा ॥१५७॥ मनसापि न कुर्वीत पापस्यास्य तु भावनाम्। भवता देववाक्येन निष्ठा चैषा निबोधिता ॥१५८॥ तथा अप्रमेय परमात्मा को प्रणाम करता हूँ ॥१४५-१४६॥ सूक्ष्म मूर्त, महामूर्ति, विद्यामूर्ति तथा मूर्तिरहित, सभी देवताओं के रक्षक होने से कवच स्वरूप कमल नयन भगवान् को मैं नमस्कार करता हुँ ॥१४७॥ सहस्त्र शीर्षा देवताओं के स्वामी, हजारों नेत्र वाले, महान भुजाओं वाले, सम्पूर्ण जगत् में व्यापक होकर रहने वाले परमेश्वर श्रीभगवान् को में नमस्कार करता हूँ ॥ १४८॥। शरण्य (सबों के रक्षक) शरण स्वरूप, नीलमेघ के समान शरीर की कान्ति वाले शार्ङ्ग धनुष को धारण करने वाले दिव्यगुणसम्पन्न, जयशील सनातन भगवान् विष्णु को (मैं नमस्कार करता हूँ) ॥१४९॥ शुद्ध स्वरूप, सर्वत्र विद्यमान नित्य आकाश स्वरूप (आकाश में व्यापक) सनातन, भाव तथा अभाव दोनों प्रकार के पदार्थो से भिन्न सर्वत्र व्यापक श्रीहरि को में नमस्कार करता हूँ ॥१५०॥ हे अच्युत ! मैं इस संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं देखता हूँ जो आप से रहित हो, में इस सम्पूर्ण चराचर को आपके द्वारा व्याप्त ही देखता हूँ ॥॥१५१॥ इस तरह से रुद्र के कहने पर उनको परात्पर तत्त्व श्रीभगवान् का दर्शन हुआ ॥१५२॥ हाथ में चक्र धारण करके गरुड पर बैठे हुए श्रीभगवान् जिस तरह सूर्य उदयाचल को प्रकाशित करते हें, उसीतरह उनको श्रीभगवान् का साक्षात्कार हुआ । उन्होंने शङ्करजी से कहा तुम वरदान माँगों में तुमको वर देने के लिए आया हूँ॥१५३॥ इस तरह से कहने पर रुद्र ने कहा-- भगवन् ! मेरी पूर्ण रूप से शुद्धि हो जाय । इस पाप को दूर करने वाला आपको छोड़कर कोई भी दूसरा समर्थ पुरुष नहीं प्रतीत होता है ।।१५४॥ ब्रह्महत्या के कारण निस्तेज बने हुए मेरा शरीर काला हो गया है । मेरे शरीर से शव की दुर्गन्धि आती है, मेरे भूषण लोहे के हो गये हैं।॥१५५॥ हे जनार्दन ! किस उपाय से मेरा पूर्ववत् रूप हो सकेगा ? हे महादेव ! मैं क्या करू ? कि मेरा पहले का ही शरीर हो जाय ॥१५६॥ यह आपकी ही कृपा से सम्भव है, हे अच्युत ! उस उपाय को आप मुझे बतलायें । भगवान् विष्णु ने कहा-- ब्रह्महत्या सबसे बड़ा, उग्र तथा सभी प्रकार के कष्टों को प्रदान करने वाला पाप है ॥१५७॥।! इस पाप को करने की मन से भी भावना नहीं करनी चाहिए । आपने देवताओं के कहने से इस भयङ्कर पाप को किया
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