Srishti Khanda Extracted Page 175

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-175

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Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण करोत्क्षिपI्तकपालेन ननर्त च महेश्वरः । शिखरस्थेन सूर्येण कैलास इव पर्वतः ॥९१३॥ छिन्नेवक्त्रे ततो देवा हृष्टास्तं वृषभध्वजम्। तुष्टुवु ् विविधैस्तोत्रे देवदेवं कपर्दिनम् ॥११९४॥ देवा ऊचुः नमः कपालिने नित्यं महाकालस्य कालिने । ऐश्वर्यज्ञानयुक्ताय सर्वभागप्रदायिने ॥९ ९ ५॥ नमो हर्षविलासाय सर्वदेवमयाय च । कलौ संहारकर्ता त्वं महाकालः स्मृतो हासि ॥९१६॥ भक्तानामार्तिनाशस्त्वं दुःखांतस्तेन चोच्यसे । शंकरोप्याशु भक्तानां तेन त्वं शङ्करः स्मृतः ॥११७॥ छिन्नं ब्रह्मशिरो यस्मात््वंकपालं विभर्षि च । तेन देवकपाली त्वं स्तुतोह्यद्यप्रसीद नः ॥११८॥ एवं स्तुतः प्रसन्नात्मा देवान्प्रस्थाप्य शङ्करः । स्वानि धिष्ण्यानि भगवांस्तत्रैवासीन्मुदान्वितः ॥१९९॥ विज्ञाय ब्रह्मणो भावं ततोवीरस्य जन्म च । शिरोनीरस्य वाक्यात्तु लोकानां कोपशांतये ॥१२०॥ शिरस्यंजलिमाधाय तुष्टावाथ प्रणम्य तम् । तेजोनिधिरपरं ब्रह्म ज्ञातुमित्थं प्रजापतिम् ॥१२१॥ निरुक्तसूक्तरहस्यै ऋग्यजुः सामभाषितैः । रुद्र उवाच अप्रमेय नमस्तेस्तु परमस्य परात्मने ॥१२२॥ अद्भुतानां प्रसूतिस्त्वं तेजसां निधिरक्षयः। विजयाद्विश्रभावस्त्वं सृष्टिकर्ता महाद्युते ॥१२३॥ ऊद््ध्ववक्त्र नमस्तेस्तु सत्वात्मक धरात्मक । जलशायिन् जलोत्पन्न जलालय नमोस्तु ते ॥१२४॥ शङ्कुरजी के हाथ में सट गया । वह उसी तरह से लग गया था जिस तरह ग्रह मण्डल के बीच में कोई दूसरा चन्द्रमा आकर बैठ जाय ॥११२॥ हाथ में सटे हुए कपाल के साथ शङ्करजी उसी तरह से नृत्य करने लगे जैसे शिखर पर विद्यमान सूर्य के साथ कैलास पर्वत नृत्य कर रहा हो ॥११३॥ उस मुख के कट जाने पर देवगण प्रसन्न होकर कपर्दी भगवान् शङ्करजी की अनेक स्तोत्रो से स्तुति किए ॥११४॥ देवताओं ने कहा-- महाकाल के भी काल स्वरूप, कपाली शङ्करजी को नित्य ही नमस्कार है, सबों को उनका भाग प्रदान करने वाले ऐश्वर्य तथा ज्ञान से युक्त शाङ्करजी को नमस्कार है ॥११५॥ हर्ष तथा विलास से युक्त, सर्वदेव स्वरूप शङ्करजी को नमस्कार है । कलियुग का संहार करने वाले आप महाकाल कहे जाते हैं ॥११६। भक्तों के दुःख को विनष्ट करने वाले होने के कारण आप दुःखान्त शब्द से अभिहित किए जाते हैं । भक्तों का शीघ्र कल्याण करने वाले होने के कारण आप शङ्कर कहे गये हें ॥११७॥ आपने ब्रह्माजी के शिर को काट दिया; इसलिए आप कपाल धारण करते हैं । हे देव ! इसीलिए कपाली शब्द से आपकी स्तुति की गयी है आप प्रसन्न हो जाइये ॥११८॥ इस तरह देवताओं द्वारा स्तुति कर लिए जाने पर शङ्करजी ने देवताओं को उनके घर भेज दिया और स्वयं वहीं पर प्रसन्नता पूर्वक स्थित रहे ॥११९॥ ब्रह्माजी के भाव तथा उनसे वीर की उत्पत्ति को जानकर शङ्करजी ने शिर को दूर करके लोकों को कोप को शान्त करने के लिए अपने शिर से अंजलि लगाकर ब्रह्माजी को प्रणाम किया और तेजोनिधि परंब्रह्म को जानने के लिए, निरुक्त, ऋक, यजुष्, एवं साम रहस्यों के सूक्तों से प्रजापति ब्रह्माजी की स्तुति करने लगे । रूद्र ने कहा-- हे अप्रमेय आपको नमस्कार है परम परमात्मा स्वरूप आपको नमस्कार है ॥१२०-१२१॥ आप अद्भुत वस्तुओं को उत्पन्न करने वाले तथा तेजों के अक्षय निधि हैं । विजयी होने के कारण विश्व स्वरूप है, हे महाद्युते आप जगत् की सृष्टि करने वाले हैं ॥१२२-१२३॥ हे ऊर्ध्ववक्त्र आपको नमस्कार है । हे सत्वगुण स्वरूप ! पृथिवी स्वरूप, जल में शयन करने वाले, जल से उत्पन्न होने वाले, तथा जल के भीतर उसकी अधिष्ठातृ देवता रूप से निवास करने _न

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