Srishti Khanda Extracted Page 174

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-174

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

गच्छाम: शरणं शम्भुं निस्तेजसो स्य तेजसा। देवा ऊचुः नमस्ते सर्वसत्वेश महेश्वर नमो नमः ॥९००॥ जगद्योने परं ब्रह्म भूतानां त्वं सनातनः । प्रतिष्ठा सर्वजगतां त्वं हेतुर्विष्णुना सह ॥१०१॥ एवं संस्तूयमानोऽसौ देवर्षिपितृदानवैः । अंतर्हित उवाचेदं देवाः प्रार्थयतेप्सितम् ॥१० २॥ देवा ऊचुः प्रत्यक्षदर्शनं दत्वा देहि देव यथेप्सितम् । कृत्वा कारुण्यमस्माकं वरश्चापि प्रदीयताम् ॥१० ३॥ यदस्माकं महद्वीर्यं तेज ओजः पराक्रमः । तत्सर्वं ब्रह्मणा ग्रस्तं पंचमास्यस्य तेजसा ॥१ ० ४॥ विनेशुः सर्वतेजांसि त्वत्प्रसादात्पुनः प्रभो । जायते तु यथापूर्वं तथा कुरु महेश्वर ॥१०५॥ ततः प्रसन्नवदनो देवैश्चापि नमस्कृतः । जगाम यत्र ब्रह्मासौ रजोहंकारमूढधीः ॥१०६॥ स्तुबंतो देवदेवेशं परिवार्य समाविशन्। ब्रह्मा तमागतं रुद्रं न जज्ञे रजसावृतः ॥९०७॥ सूर्यकोटिसहस्तराणां तेजसा रंजयन् जगत् । तदादृश्यत विश्वात्मा विश्वसृग्विश्वभावन: ॥९०८॥ सपितामहमासीनं सकलं देवमंडलम् । अभिगम्य ततो रुद्रो ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्॥१०९॥ अहोतितेजसावक्त्रमधिकं देवराजते। एवमुक्त्वा ड्रहासं तु मुमोच शशिशेखरः ॥१९०॥ वामांगुष्ठनखाग्रेण ब्रह्मणः पंचमंशिरः । चकर्त कदलीगर्भ नरः कररुहैरिव॥१९१२॥ विच्छिन्नं तु शिरः पश्चाद्धवहस्ते स्थितं तदा । ग्रहमंडलमध्यस्थो द्वितीय इव चंद्रमाः ॥१९२॥ दर्शन करने के लिए अथवा उनसे मिलने के लिए उनके पास जाने में समर्थ नहीं होते थे ॥९८॥ अपने को अभिभूत मानने वाले निस्तेज बने सभी देवताओं ने अपने कल्याण के साधना का विचार किया ॥९९॥ सभी देवताओं ने शम्भु की शरणागति की क्योंकि वे सभी निस्तेज हो गये थे । देबतओं ने शङ्करजी की स्तुति करते हुए कहा-- हे सभी जीवों के स्वामिन् महेश्वर ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥१००॥ हे जगत् के कारण स्वरूप परंबह्म ! आप सभी जीवों की सनातन प्रतिष्ठा हैं । आप विष्णु भगवान् के साथ जगत् के कारण हें ॥१०१॥ देवताओं, पितरों, देवर्षियों तथा मनुष्यों के द्वारा इस तरह से स्तुति किए जाते हुए शङ्करजी अन्तर्धान रहकर ही कहे कि देवताओं आपलोग अपना अभीप्सित बतलायें ॥१५०२॥ देवताओं ने कहा-- आप प्रत्यक्ष दर्शन देकर हमारे अभिप्रेत अर्थ को प्रदान करें । हमलोगों पर कृपा करके आप हमलोगों को वरदान भी प्रदान करें ॥१०३॥ हमलोगों का जो महान् वीर्य तेज, ओज और पराक्रम है, उसको ब्रह्माजी ने अपने पाञ्चवें मुख के तेज से ग्रस्त कर लिया है ॥१०४॥ सभी तेज विनष्ट हो गये हैं, अतएव आप अपनी कृपा से उसे पूर्ववत् बना दें ॥१०५॥ उसके बाद देवताओं से नमस्कृत शङ्करजी वहाँ गये जहाँ पर रजोगुण जन्य अहङ्कार से मूढ बने ब्रह्माजी विद्यमान थे ॥१०६॥ देवदेव शङ्करजी की स्तुति करते हुए सभी देवता भी वहाँ गये, किन्तु रजोगुण से युक्त होने के कारण ब्रह्माजी आये हुए रुद्र को नहीं जान सके ॥१०७॥ वे अपने करोड़ों हजार सूर्य के तेज के समान तेज के द्वारा जगत् को प्रकाशित कर रहे थे । उसके बाद विश्व की सृष्टि करने वाले विश्वभावन ब्रह्माजी दिखायी दे रहे थे ॥१०८॥ शङ्करजी बैठे हुए ब्रह्माजी तथा देवताओं के पास जाकर कहे कि हे देव ! अत्यन्त तेजस्वी मुख अत्यधिक सुशोभित होता है । यह कहकर शङ्करजी ने अट्टहास किया ।।१०९-११०॥। उन्होंने अपने बायें हाथ के अङ्गूठे के नख से उस पाँचवे शिर को उस तरह से काट दिया जिस तरह कोई आदमी अपने नख से केले के परतों को फाड़ देता है ॥१११॥ उसके बाद वह शिर

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know