Srishti Khanda Extracted Page 172
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-172
Sanskrit Original
सारथ्यं च करिष्यामि नाशं कुरुकुलस्य च । ततो हृष्टोभवच्छक्रो विष्णुवाक्येन तेन ह ॥७२॥ प्रतिगृह्ण नरं दृष्टः सत्यं चास्तु वचस्तव। एवमुक्त्वा वरं देवः प्रेषयित्वा च्युतः स्वयम् ॥७३॥ गत्वा तु पुंडरीकाक्षो ब्रह्माणं प्राह वै पुनः । त्वया सृष्टमिदं सर्व त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥७४॥ आवां कार्यस्य करणे सहायौ च तव प्रभो। स्वयं कृत्वा पुनर्नाशं कर्तु देव न बुध्यसे ॥७५॥ कृतं जुगुप्सितं कर्म शंभुमेतं जिघांसता । त्वया च देवदेवस्य सृष्टः कोपेन वै पुमान् ॥७६॥ शुद्यर्थमस्य पापस्य प्रायश्चित्तं परं कुरु । गृह्णन् वह्नि त्रयं देवअग्निहोत्रमुपाहर ॥७ ७॥ पुण्यतीर्थे तथा देशे वने वापि पितामह। स्वपत्न्या सहितो यज्ञं कुरुष्वास्मत्परिग्रहात् ॥७८॥ सर्वे देवास्तथादित्या रुद्राश्नापि जगत्पते। आदेशं तेकरिष्यंति यतोस्माकं भवान्प्रभुः ॥७९॥ एकोहि गार्हपत्योम्नि दक्षिणाग्नि द्वितीयक:। आहवनीयस्तृतीयस्तु त्रिकुंडेषु प्रकल्पय ॥८ ०॥ वर्तुले त्वर्चयात्मानम्मामथोधनुराकृतौ । चतुः कोणे हरं देवं ऋग्यजुः सामनामभिः ॥८ १॥ अग्नीनुत्पाद्य तपसा परामृद्धिमवाप्य च । दिव्यं वर्षसहस्रं तु हुत्वाग्नीन् शमयिष्यसि ॥८ २॥ अप्निहोत्रात्परं नान्यत्पवित्रमिह पठ्यते । सुकृतेनाग्निहोत्रेण प्रशुद्भ्यंति भुवि द्विजाः ॥८३॥ पंथानो देवलोकस्य ब्राह्मणैर्दशितास्त्वमी। एकोग्रिः सर्वदाधायों गृहस्थेन द्विजन्मना॥८४॥ विनाग्निना द्विजेनेह गार्हस्थ्यन्नतुल भ्यते । भीष्म उवाच योसौ कपालादुत्पन्नोनरो नाम धनुर्द्धरः ॥८ ५॥ ने कहा पृथिवी का भार उतारने के लिए ॥७०॥ मैं पृथिवी पर अवतार ग्रहण करूँगा और सूर्य के पुत्र का नाश करने क लिए तथा तुम्हारे पुत्र को विजय दिलाने के लिए ॥७१॥ कुरुकुल का नाश करने के लिए तुम्हारे पुत्र के सारथिका काम में करूंगा । भगवान् की उस वाणी को सुनकर इन्द्र प्रसन्न हो गये ॥७२॥ वे नर को लेकर कहे आपकी वाणी सत्य हो । इसतरह से वरदान देकर भगवान् ने इन्द्र को भेज दिया ॥७३॥ उसके बाद भगवान् पुण्डरीकाक्ष ब्रह्माजी के पास जाकर उनसे कहे-- आपने इस सम्पूर्ण चराचरात्मक त्रैलोक्य की सृष्टि की है ॥७४॥ आपके कार्य करने मे शङ्कर और हम दोनों सहायक हैं । स्वयं सृष्टि करके आप उसका नाश नहीं करना चाहेंगे ॥७५॥ शम्भु को मारना चाहकर आपने यह निन्दित काम किया है । क्रोध करके आपने स्वेदज पुरुष की सृष्टि कर दी ॥७६॥ अतएवइस पाप को शुद्धि के लिए आप प्रायश्चित करें । आप तीनों अग्नियों के लिए अग्निहोत्र का वहन करें ।।७७।। इस तरह से हे पितामह ! आप किसी पवित्र तीर्थ में अथवा पवित्र देश में, या वन में अपनी पत्नी के साथ मेरी कृपा से यज्ञ करे ॥७८॥ वहाँ पर आप हमारे स्वामी होंगे वहाँ पर आदित्य तथा रुद्र आदि सभी देवता आपकी आज्ञा का पालन करेगे ॥७९॥ आप तीन कुण्डों में गार्हपत्याग्नि, दक्षिणाग्नि तथा आहवनीयाग्नि इन तीनों अग्नियों की कल्पना करें ॥८०॥ आप वृत्त कुण्ड में अपनी अर्चना करें, धनुषकृति कुण्ड में मेरी अर्चना करें तथा चतुष्कोण कुण्ड में शङ्करजी की आराधन ऋग्, यजुः तथा सामवेद के मन्त्रों से करें ॥८ १॥ तपस्या के द्वारा अग्नियों को उत्पन्न करके तथा सर्वोत्कृष्ट समृद्धि को प्राप्त करके हजार दिव्य वर्ष, पर्यन्त होम करके आप अग्नियो को शान्त करेंगे ॥८ २॥ इस विषय में अग्निहोत्र से बढकर किसी भी दूसरे साधन को पवित्र नहीं बतलाया गया है । अच्छी तरह से किए गये अग्निहोत्र के द्वारा ब्राह्मणों की अत्यधिक शुद्धि होती है ॥८ ३॥ ब्राह्मणों ने इसे ही देवलोक का मार्ग बतलाया है । गृहस्थ ब्राह्मणों को सर्वदा एक अग्नि को धारण किए रहना चाहिए ॥८४॥ ब्राह्मण अग्नि के बिना गार्हस्थ्य को नहीं
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