Srishti Khanda Extracted Page 171

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-171

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Sanskrit Original

यस्य कर्णेति वै नाम लोकः सर्वो वदिष्यति । मत्प्रसादादस्य विष्णो विप्राणां भावितात्मनः ॥५६॥ अदेयं नास्ति वैलोके वस्तुकिंचिच्च केशव | एवंप्रभावं चैवैनं जनये वचनात्तव ॥५७॥ एवमुक्त्वा सहस्रांशु देवं दानवघातिनम्। नारायणं महात्मानं तत्रैवांतर्दधे रविः ॥५८॥ अदर्शनं गते देवे भास्करे वारितस्करे। वृद्धश्रवसप्येवमुवाच प्रीतमानसः ॥५९॥ सहस्रनेत्र रक्तोत्थो नरोऽयं मदनुग्रहात् । स्वांशभूतो द्वापरांते योक्तव्यो भूतले त्वया ॥६०॥ यदा पांटुर्महाभागः पृथां भार्यामवाप्स्यति । माद्रीं चापि महाभाग तदारण्यं गमिष्यति ॥६१॥ तस्याप्यरण्यसंस्थस्य मृगः शापं प्रदास्यति। तेन चोत्पन्न वैराग्यः शतश्वृंग॑ गमिष्यति ॥६२॥ पुत्रानभीप्सन् क्षेत्रोत्थान्भार्या स प्रवदिष्यति । आनीप्संती तदा कुंती -भत्तरें सा वदिष्यति ॥६३॥ नाहं मर्त्यस्य वैराजन् पुत्रानिच्छे कथंचन। दैवतेभ्यः प्रसादाच्च पुत्रानिछे नराधिप ॥६४॥ प्रार्थयंत्ये त्वया शक्र कुंत्यै देयोनरस्ततः। वचसा च मदीयेन एवं कुरु शचीपते॥६५॥ अथाब्रवीत्तदाविष्णुं देवेशो दुःखितो वचः। अस्मिन्मन्वंतरेतीते चतुर्विशतिके युगे॥६६॥ अवतीर्य रघुकुले गृहे दशरथस्य च। रावणस्य वधार्थाय शांत्यर्थं च दिवौकसाम् ॥६७॥ | रामरूपेण भवता सौतार्थमटता वने । मत्पुत्रो हिंसितो देव सूर्यपुत्रहितार्थिना ॥६८॥ | वालिनामप्लवंगेद्रः सुग्रीवार्थे त्वया यतः । दुःखेनानेन तप्तोहं गृहामि न सुतं नरम् ॥६९॥ | अगृहुमानं देवेंद्र कारणांतरवादिनम्। हरिः प्रोचे शुनासीरं भुवो भारावतारणे ॥७०॥ | अवतारं करिष्यामि मर्त्यलोके त्वहं प्रभो। सूर्यपुत्रस्य नाशार्थं जयार्थमात्मजस्य ते ॥७१॥ । . १४६ श्रीपद्यमहापुराण ooo सूर्य ने कहा मैं कानीन बलवान पुत्र को उत्पन्न करूंगा । उसको लोक में लोग कर्ण शब्द से अभिहित करेंगे । हे विष्णो ! ब्राह्मण भक्त इस कर्ण के लिए मेरी कृपा से ।।५६॥ संसार की कोई भी वस्तु अदेय नहीं होगी । इसतरह । के प्रभाव से युक्त रूप से में इसको आपकी आज्ञानुसार उत्पन्न करूँगा ॥५७॥ इसतरह से दैत्यों के विनाशक भगवान् । नारायण से कहकर सूर्य अन्तर्धान हो गये ॥५८॥ जलशोषक सूर्य के अन्तर्हित हो जाने पर श्रीभगवान् ने प्रसत्रता | पूर्वक इन्द्र से उसी प्रकार से कहा ॥५९॥ हे सहरनेत्र इन्द्र ! इस रक्तज नर को मेरी कृपा से आप अपने अंश से | युक्त करके भूलोक में भेजेंगे ॥६०॥ जब महाभाग पाण्डु पृथा तथा माद्री को पत्नी रूप से प्राप्त कर लेंगे तो वे महाभाग वन में जायेंगे ॥६१॥ वन में रहते समय उनको मृग शाप दे देगा । उसके कारण उनके मन में वैराग्य उत्पन्न हो जायेगा और वे शतश्रृंग पर्वत पर चले जायेंगे ॥६२॥ उस समय वे पुत्रों को प्राप्त करने की कामना से अपनी पत्नी को क्षेत्रज पुत्र को उत्पन्न करने के लिए कहेंगे । उसको नहीं चाहने वाली कुन्ती अपने पति से कहेगी कि राजन् ! मैं किसी भी प्रकार मनुष्य से पुत्र नहीं प्राप्त करना चाहती हूँ, राजन् ! मैं देवताओं की कृपा से पुत्रों को प्राप्त करना चाहती हूँ ॥६३-६४॥ उसके वाद जब कुन्ती प्रार्थना करे तो आप नर को पुत्र रूप में प्रदान कर देंगे! हे इन्द्र ! मेरी आज्ञा से आप इस काम को अवश्य करेंगे ॥६५॥ उसके बाद इन्द्र ने दुःखी होकर भगवान् विष्णु | से कहां-- इस मन्वन्तर के बीत हुए चौबीसवें युग में ॥६६॥ रघुकुल के महाराज दशरथ के घर में अवतार लेक | आपने रावण का वध करने के लिए तथा देवताओं को शान्ति प्रदान करने के लिए ॥६७॥ सीता का अन्वेषण करने के लिए वन में घूमते हुए आपने सूर्य पुत्र (सुग्रीव) का कल्याण करने के लिए मेरे पुत्र (बालि) का वध कर दिया॥६८॥ आपने सुग्रीव के लिए वालि नामक वानर राज को मार दिया । उसी दु:ख से दुःखी मैं नर नामक पुत्र को नहीं स्वीकार करता हूँ ॥६९॥ दूसरे कारण के बताने वाले तथा नर को नहीं स्वीकार करने वाले इन्द्र से श्रीभगवान

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