Srishti Khanda Extracted Page 168
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-168
Sanskrit Original
सुष्ठिखण्ड १४३ ततस्स प्रणतो भूमौ दृष्टो देवेन विष्णुना । विष्णुरुवाच पौत्रो हि मे भवारूद्र कं ते कामं करोम्यहम् ॥९९॥ पुलस्त्य उवाच दृष्टवा नारायणं देवं भिक्षा देहीत्युवाच ह। कपालं दर्शयित्वाऽग्रे प्रज्वलंस्तेजसोत्कटम् ॥९२॥ कपालपाणि संप्रेक्ष्य रुद्रं विष्णुरचिन्तयत् । कोन्यो योग्यो भवेद्भिक्षुर्भिक्षादानस्य सांप्रतम् ॥१३॥ योग्योयमिति सङ्कल्प्य दक्षिणं भुजमर्पयत्। तद्विभेदातितीक्ष्णेन शूलेन शशिशेख्ररः ॥१४॥ प्रावर्तत ततोधारा शोणितस्य विभो भुंजात्। जांबूनदरसाकारा वह्विज्वालेव निर्मिता ॥१५॥ निपपात कपालांतश्शम्भुना सा प्रभिक्षिता। ऋज्वी वेगवती तीव्रा स्पृशंती त्वांबरं जवात् ॥१६॥ पंचाशद्योजना दैर्ध्याद्विस्तराइशयोजना । दिव्यवर्ष सहस्रं सा समुवाह हरे भुजात्॥९७॥ इवत कालमीशोऽसौ भिक्षां जग्राह भिक्षुकः । दत्ता नारायणेनाथ कपाले पात्र उत्तमे॥९८॥ ततो नारायणः प्राह शंभु परमिदं वचः। संपूर्णं वा नवापात्रं ततोवै परमीश्वरः॥१९॥ सतोयांबुदनिर्घोषं श्रुत्वा वाक्यं हरेर्हरः । शशिसूर्याग्रिनयनः शशिशेखरशोभितः ॥२०॥ कपाले दृष्टिमावेश्य त्रिभिनेत्रैर्जनार्दनम्। अंगुल्या घटयन्प्राह कपालं परिपूरितम् ॥२१॥ शरुत्वा शिवस्य तां वाणी विष्णुर्धारां समाहरत् । पश्यतोऽथ हरेरीशः स्वांगुल्यारुधिरं तदा ॥२२॥ दिव्यवर्षसहस्रं च दृष्टिपातैर्ममंथ सः । मथ्यमाने ततो रक्ते कलिलं बुड्दे क्रमात् ॥२३॥ बभूव च ततः पश्चात्किरीटी सशरासनः। बद्धतूणीरयुगलो वृषस्कंधोङ्गलित्रवान् ॥२४॥ 9| कद पृदिवी पर गिरकर प्रणाम करते हुए शङ्करजी को भगवान् विष्णु ने देखा । भगवान् विष्णु ने कहा-- हे रुद्र! मेरे पोत हो । तुम्हारी कौन सो इच्छा मैं पूरी करूँ ॥११॥ शङ्करजी ने भगवान् नारायण को देखकर कहा--- मुझे प्रदान करें । यह उन्होंने देदीप्यमान उस कपाल को दिखाकर कहा ॥१२॥ रुद्र को कपाल पाणि देखकर भगवान् विष्णु ने विचार किया इस समय भिक्षा प्रदान करने के लिए दूसरा योग्य भिक्षु कौन हो सकता है?॥१३॥ रङ्गरजी को योग्य समझकर भगवान् ने उन्हें अपनी दाहिनी भुजा प्रदान कर दी । उसको शङ्करजी ने अपने अत्यन्त क्ष्ण त्रिशूल से काट दिया ॥१४॥ उसके कारण श्रीभगवान् की भुजा से खून की धारा बह चली । उसका आकार सुवर्ण के पानी के समान था और मनो वह अग्नि की ज्वाला से निर्मित हो ॥१५॥ शंभु के द्वारा माँगी गयी वह धारा उस कपाल के भीतर गिरने लगी वह धारा ऋज्वी, वेगपूर्ण, तीब्र गति से तथा अपने वेग से आकाश को छू रही वा।१६॥ उसकी लम्वाई पचास योजन और चौड़ायी दश योजन थी । वह देवताओं के हजार वर्ष पर्यन्त श्रीहरि की नुजा से प्रवाहित होती रही ॥१७॥ इतने समय तक शङ्करजी उस भिक्षा को ग्रहण किए और भगवान् नारायण ने उसे कपाल नामक उत्तम पात्र में प्रदान किया ॥१८॥ उसके बाद भगवान् नारायण ने शङ्करजी से पूछा तुम्हारा पात्र भरा या नहीं ? उसके बाद जल भरे मेघ की ध्वनि के समान गम्भीर श्रीहरि के वाक्य को सुनकर चन्द्रमा रूपी मुकुट से सुशोभित तथा सूर्य, चन्द्रमा एवं अग्नि रूपी नेत्र वाले शङ्करजी अपने तीनों नेत्रों से भगवान् जर्नादन को देखते हुए अङ्गुली से छूकर कहे कपाल भर गया ॥१९-२१॥ शिवजी की वाणी को सुनकर भगवान् विष्णु ने उस धारा को रोक लिया । श्रीमगवान् के सामने ही शङ्करजी ने अपनी अङ्गुलि से उस रक्त को देवताओं के एक हजार वर्ष पर्यन्त अपनी दृष्टि पात के द्वार मंथन किया मथे जाते हुए उस रक्त में क्रमश: कलिल तथा बुलबुले निकलने लगे ॥२२-२३॥ त“ FF) न
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