Srishti Khanda Extracted Page 166
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-166
Sanskrit Original
महिषाक्षं बाष्कलं च प्रचंडं चंडक तथा । रोचमानं तथात्युग्रं सुषेणं दानवोत्तमम् ॥४०६॥ एतान्दृष्ट्वा तथा चान्यान्दानवेद्रानथाब्रवीत् । इन्द्र उवाच दानवेंद्राः पुरा जाता: कृतं राज्यं त्रिविष्टपे ॥४ ० ७॥ इदानी कथमेवेदं व्रतं वेदविलोपकम् । भवद्भिः कर्तुमारब्धं नग्रमुंडिकमंडलु ॥४०८॥ मयूरध्वजधारित्वं कथं चैवेह तिष्ठथ । दानवा ऊचुः त्यक्तः सर्वासुर भाव ऋषिधर्मे वयं स्थिताः ॥४०९॥ धर्मवृ्विकरं कर्म चरामः सर्वजंतुषु। त्रैलोक्यराज्यमखिलं भुंक्ष्व शक्रब्रजस्व च ॥४१०॥ तथेति चोक्त्वा मघवा पुनर्यातस्त्रविष्टपम् । एवं ते मोहिताः सर्वे भीष्म देवपुरोधसा ॥४११॥ नर्मदासरितं प्राप्य स्थिता दानवसत्तमाः । ज्ञात्वा शुक्रेण ते सर्वे वृत्तांतमनुबोधिताः ॥४ १ २॥ तदा त्रैलोक्यहरणे चक्कुः क्रूरां पुनर्मतिम् ॥४९३॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे अवतारचरितं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥१३॥ > ला हिरण्याक्ष, यज्ञहन, वेदनिदंक धर्मघ्न ॥४०४॥ क्रूर कर्म करने वाले प्रधस नामक राक्षस, विघस, मुचि, बाण, तथा विरोचन ॥४०५॥ महिषाक्ष, वाष्कल, चण्ड तथा प्रचण्ड, रोचमान, उग्र तथा दानव श्रेष्ठ सुषेण ॥४०६॥ को देखकर तथा दूसरे भी दानवा को देखकर इन्द्र ने उन सबों से कहा इन्द्र ने कहा- हे दानवेन्द्र ! आपलोगों ने प्राचीन काल में तो स्वर्ग में राज्य किया था ॥४०७।। इस समय आपलोग इस वेदों का लोप करने वाले व्रत को क्यों कर रहे हैं ? अब तो आप लोग शिर मुड़ाकर एवं कमण्डलु धारण करके नंगे रह रहे हैं ॥४०८॥ यहाँ मयूर ध्वज को धारण करके आपलोग क्यों स्थित हैं ? दानवों ने कहा-- हमलोगों ने सम्पूर्ण आसुर भाव का परित्याग कर दिया है ओर हमलोग ऋषि धर्म को अपना लिए हैं ॥४०९॥ हम सभी जीवों के प्रति धर्म की वृद्धि करने वाले कर्मों को करते हैं । हे इन्द्र ! तुम जाओ सम्पूर्ण त्रैलोक्य का राज्य भोगो ॥४१०॥ उसके बाद इन्द्र भी ठीक है; इसतरह . से कहकर स्वर्ग चले गये । हे भीष्म ! इस प्रकार से उन असुरों को देवगुरु ने मोहित करने का काम किया॥४११॥ नर्मदा नदी के तट पर जाकर सभी श्रेष्ठ दानव रहने लग गये । जब शुक्र ने इन सारी बातों को जाना तो वे जाकर उन सबों को पुन: प्रबोधित किए ॥४१२।! उसके बाद त्रैलोक्य को हरण करने की उनकी (दानवों की) बुद्धि हुयी ॥४१३॥ इसतरह श्रीपद़मामहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के अवतार चरित नामक तेरहवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ॥९३॥ ——
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