Srishti Khanda Extracted Page 165

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-165

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Sanskrit Original

श्रीपडामहापुराण त्याज्यानि तेन चैतानि सत्यमेव वचो हि नः । अस्मदीयेन तपसा नियमैर्विविधैस्तथा ॥३९०॥ ब्रजध्वं चोत्तमं स्थानं मोक्षमार्ग च यं बुधाः । विंदंति भक्तिभावेन तपोयुक्तास्तपस्विनः ॥३९९॥ अक्षेषु निग्रहो यत्र दयाभूतेषु सर्वदा । तत्तपोधर्ममित्युक्तं सर्वा चान्या विडंबना॥३९२॥ ज्ञात्वैतद्धवतासाध्यं गंतव्यं परमं पदम् । यां वै तीर्थकरा याता यां गतिं योगिनो गताः॥३९३॥ एवं वै देवताः पूर्वा विद्याधरमहोरगाः । मनोरथाभिलाषांस्ते चिंतयंतो दिवानिशम्॥३९४॥ यद्येषणा वै युष्माकं संसारविरतौ कृता। परित्यजध्वं दाराणि स्वर्गमार्गार्गलानि च ॥३९५॥ यस्यां योनौ पिता यातस्तां योनिं सेवसे कथम्। आत्ममांसोपमं मांसं कथं खादंति जंतवः ॥३९६॥ ततस्ते दानवा भीष्म ऊचुः सर्वे गुरुं वचः । दीक्षस्व नो महाभाग भ्रूणकानग्रतःस्थितान् ॥३९७॥ तथा कृत्वा स तानाह समयेन पुरोहितः । प्रणामो नान्यदेवेषु कर्तव्यो वः कदाचन ॥३९८॥ एकस्थाने यदा भक्तं भोक्तव्यं करसंपुटे । तत्रस्थाने स्थितं तोयं केशकीटविवर्जितम् ॥३९९॥ तुल्यं प्रिया प्रियं कार्यं नान्यददृष्टिहतं क्वचित्। भोक्तव्यमेतेन विभो आचारेण तथा कुरु ॥४००॥ भवध्वं सहिता यूयं ते तथा मोक्षभागिनः । एवमुक्त्वा स नियमान्कृत्वा तान्दनुपुंगवान् ॥४०९॥ जगाम धिषणो राजन् देवलोकं दिवौकसाम्। आचचक्षे स तत्सर्व दानवानां च कारितम् ॥४०२॥ ततस्ते त्वसुरा जग्मु रनर्मदामभितोवसन् । दृष्ट्वा तान्दानवांस्तत्र प्रह्लादेन विना कृतान्॥४०३॥ देवराजस्ततो हृष्टो नमुचि प्राह वै वचः । हिरण्याक्षं यज्ञहनं धर्मघ्नं वेदनिंदकम् ॥४०४॥ राक्षसं क्रूर कर्माणं प्रधसं विघसं तथा । मुचि चैव तथा बाणं विरोचनमथापि वा ॥४०५॥ है ॥३८९॥ अतएव वे सब त्याज्य हैं यह हमारी सत्य वाणी है । हमारी तथा अनेक प्रकार की तपस्या से ॥३९०॥ हे बिज्ञ पुरुषो ! मोक्ष को तुमलोग प्राप्त करो । तपस्वी पुरुष ही भक्तिभाव से मोक्ष के स्थान को प्राप्त करते हें। ३९ १॥ जिसमें इन्द्रियों को वश में किया जाता है, सभी जीवों पर दया की जाती है, इस प्रकार की ही तपस्या धर्म है । इसके अतिरिक्त सभी धर्म पाखण्ड हैं ॥३९२॥ आप लोगों को इस साध्य का ज्ञान प्राप्त करके परम पद प्राप्त करना चाहिये । जिस गति को तीर्थकरों ने प्राप्त किया, जिस गति को योगियों ने प्राप्त किया ॥३९३॥ उसी को देवता, विद्याधर तथा महान् सर्पगण प्राप्त करने की रात-दिन कामना करते हैं ॥३९४।। यदि आपलोग संसार बंध को विनष्ट करना चाहते हैं तो आपलोग स्वर्गमार्ग के बाधक भूत स्त्रियों का परित्याग कर दें ॥३९५॥ जिस योनि से तुम्हारे पिता की उत्पत्ति हुयी उसी योनि का सेवन तुम लोग क्यों करते हो ? अपने ही मांस के समान दूसरे जीव के मांस को लोग क्यों खाते हैं ?॥३९६॥ हे भीष्म ! उसके बाद वे सभी दानव गुरु से कहे-- हमलोग आपके सामने खड़े हैं, आप हमलोगों को दीक्षा दीजिये ॥३९७॥ उन सबों को दीक्षा प्रदान करके पुरोहित (बृहस्पति) ने कहा तुमलोग कभी किसी दूसरे देवता को प्रणाम मत करना ॥३९८॥ जब एक स्थान पर भोजन रख जाय तो उसे अपने हाथ में ही लेकर खाना । वहीं पर विद्यमान केश (बाल) तथा कीड़ों से रहित जल पीना । मित्र तथा शत्रु दोनों से समान व्यवहार करना, किसी में विषम दृष्टि मत करना । इसी विधि से भोजन करना चाहिए तथा इसी आचार का पालन करो ॥४००॥ तुमलोग एक साथ रहना ऐसा करके मोक्ष के भागी बन जाओगे । इसतरह उन श्रेष्ठ दानवों को नियमोपदेश करके ॥४०१॥ हे राजन् ! बृहस्पति देवताओं के लोक में चले गये ओर उन्होंने जो कुछ दानवो से करवाया वह सब कुछ बतलायें ॥४०२॥ उसके बाद देवता नर्मदा नदी के तट पर गये और वहाँ पर प्रह्लद को छोड़कर दिगम्बर बने हुए दानवों को देखे ॥४०३॥ उसके बाद देवराज ने प्रसन्न होकर नमुचि तथा अन्य

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