Srishti Khanda Extracted Page 163
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-163
Sanskrit Original
रागादिदुष्टमत्यर्थं भ्राम्यते भवसंकटे । नानाप्रकारं वचनं स तेषां मुक्तियोजितम् ॥३६३॥ तथा तथा वदद्धर्म तत्यजुस्ते यथा यथा । केचिद्विनिंदां वेदानां देवानामपरे नृप ॥३६४॥ यज्ञकर्मकलापस्य तथाचान्ये द्विजन्मनाम् । नैतद्युक्तिसहं वाक्यं हिंसा धर्माय जायते ॥३६५॥ हवीष्यनलदग्धानि फलान्यर्हति कोविदाः । निहतस्य पशोर्यज्ञे स्वर्गप्राप्तिर्यदीष्यते ॥३६६॥ स्वपिता यजमानेन किं वात्र न हन्यते। तृप्तये जायते पुंसो भुक्तमन्येन चेद्यदि ॥३६७॥ दद्याच्छाद्धं प्रवसतो नवहेयुः प्रवासिनः । यज्ञैरनेके देवत्वमवाप्येंद्रेण भुज्यते ॥३६८॥ शम्यादि यदि चेत्काष्ठं तद्वरं पत्रभुक् पशुः । जना श्रब्धेयमित्येतदवगम्य तु तद्दचः॥३६९॥ उपेक्ष्य श्रेयसे वाक्यं रोचतां यन्मयेरितम् । नह्याप्तवादा नभसो निपतंति महासुराः ॥३७०॥ युक्तिमद्दचनं ग्राह्य मयान्यैश्च भवद्विधैः। दानवा ऊचुः तत्ववादे वयं सर्वे प्रपन्नास्तव भक्तितः ॥३७९॥ कुरुष्वानुग्रहं चाद्य प्रसन्नोसि यदि प्रभो । संभारानाहरामोऽद्य दीक्षा योय्यांश्च सर्वशः ॥३७२॥ प्रसादात्तव येनाशु मोक्षो हस्तगतो भवेत् । ततस्तानब्रवीत्सर्वान्मायामोहोऽ सुरांस्तदा ॥३७३॥ प्रपन्नः शासनं होष मदीयो गुरुरम्र्यधीः। दीक्षां दास्यति युष्माकं निदेशान्मम सत्तमः ॥३७४॥ दूषित धर्म है । यह सम्पूर्ण जगत् विज्ञानमय हे ऐसा जानो ॥३६१॥ आपलोग मेरी बाणी को जानें; जिसे विज्ञ पुरुषां ने कहा है । इस जगत् का कोई भी आधार नहीं है तथा जगत् श्रान्तिज्ञानमय है ॥३६२॥ रागादि दोषों से दूषित होने के कारण ही मनुष्य सङ्कटमय संसार में भ्रमण कर रहा है । उसने मुक्ति सम्बन्धी अनेक प्रकार के बचनों से दैत्यों को समझाया ॥३६३॥ वह जैसे-जैसे धर्म का उपदेश देता था वैसे-वैसे असुरों ने त्रयीधर्म का त्याग कर दिया। हे राजन् ! कुछ असुर वेदों की निन्दा करने लगे कुछ देवताओं की निन्दा करने लगे ॥३६४॥ कुछ बजञों के कर्मकलाप की निन्दा करने लगे तथा दूसरे असुर ब्राह्मणों की निन्दा करने लगे । वे सब कहने लगे कि हिंसा धर्मकारिणी होती है, यह युक्ति-युक्त कथमपि नहीं हैं ॥३६५॥ जो हविष्य आग में जल जाता है उससे विज्ञो को पुण्य रूपी फल की प्राप्ति होती है, यह युक्तियुक्त नहीं है । यज्ञ में मारे जाने वाले पशु को स्वर्ग की प्राप्ति होती है इसे कौन मानेगा ?॥३६६॥ यदि ऐसी बात है तो यजमान अपने पिता को ही क्यों नहीं मार देता है कि उसको स्वर्ग मिल जाय । यदि दूसरे के खा लेने से दूसरों की तृप्ति हो जाती है तो फिर परदेश जाने वाले का घर पर ही श्राद्ध कर देना चाहिये; वह अपने लिए पाथेय क्यों ले जाता है ? अनेक यज्ञों को करके इन्द्र ने इन्द्र का पद प्राप्त किया यह भी श्रद्धेय नहीं है ॥३६७-३६८॥ यदि शमी आदि काष्ठ श्रेष्ठ हैं तो उससे श्रेष्ठ उसका पत्ता खा लेने वाला पशु ही श्रेष्ठ होगा । इन सारी बातों को तुम लोग अश्रद्धेय जानो ॥३६९॥ इन सारी बातों की उपेक्षा करके तुम लोग हमारी बात को मानो । महाअसुरों आप्त वाक्य कोई आकाश से नहीं गिरते हैं ॥३७०॥ युक्ति-युक्त ही बात को स्वीकार करना चाहिए, वह बात चाहे हमारी हो अथवा आपलोगों के समान दूसरे लोगों की हो । दानवों ने कहा-- आपकी तत्त्विक बातों को हमलोग भक्ति-पूर्वक स्वीकार करते हैं ॥३७१॥ हे प्रमो ! यदि आप प्रसन्न हैं तो हमलोगों पर कृपा करें हमलोग दीक्षा के योग्य सभी सामग्रियों को ला रहे हैं ॥३७२॥ जिससे कि आपकी कृपा से हमलोगों को शीघ्र मुक्ति मिल जाय । उसके बाद मायामोह ने सभी असुरों से कहा ॥३७३॥ हमारे प्रसन्न गुरु का ही आपलोग प्रसन्नता पूर्वक शासन स्वीकार करें । वे ही आपलोगों को दीक्षा देंगे ॥३७४॥ मायामोह ने बृहस्पति से कहा हे ब्रह्मन!
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