Srishti Khanda Extracted Page 162
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-162
Sanskrit Original
अस्माभिरियमारब्धा किं वा तत्रविवक्षितम् । दिगंबर उवाच कुरुध्वं मम वाक्यानि यदि मुक्तिमभीप्सथ ॥३४९॥ आर्हतं सर्वमेतच्च मुक्तिद्वारमसंवृतम् । धर्माद्विमुक्तेरहोयं नैतस्मादपरः परः ॥३५०॥ अत्रैवावस्थिताः स्वर्ग मुक्तिं चापि गमिष्यथ। एवं प्रकारैर्बहुभिर्मुक्तिदर्शनवर्जितैः ॥३५ ९॥ मायामोहेन ते दैत्याः वेदमार्गबहिष्कृताः । धर्मायैतदधर्माय सदेतदसदित्यपि॥३५२॥ विमुक्तये त्विदं नैतद्विमुक्ति संप्रयच्छति। परमार्थोयमत्यर्थं परमार्थो नचाप्ययम् ॥३५३॥ कार्यमेतदकार्य हि नैतदेतत्स्फुटं त्विदम् । दिग्वाससामयं धर्मो धर्मोऽयं बहुवाससाम् ॥३५४॥ इत्यनेकार्थवादांस्तु मायामोहेन ते यतः । उक्तास्ततोऽखिला दैत्याः स्वधर्मास्त्याजिता नृप॥३ ५५॥ अर्हध्वं मामकं धर्म मायामोहेन ते यतः । उक्तास्तमाश्रिता धर्ममार्हतास्तेन ते भवन् ॥३५६॥ त्रयीमार्ग समुत्सृज्य मायामोहेन ते सुराः । कारितास्तन्मया ह्यासंस्तथान्ये तत्प्रबोधिताः॥३५७॥ तैरप्यन्ये परे तैश्च॒ तैरन्योन्यैस्तथा परे। नमोऽर्हते चेति सर्वे संगमे स्थिरवादिनः ॥३५८॥ अल्पैरहोभिः संत्यक्ता तेर्दैत्यैः प्रायशस्त्रयी । पुनश्च रक्तांबरधृन्मायामोहोजितेक्षणः ॥३ ५ ९॥ सोन्यानप्यसुरान्गत्वा ऊचेऽन्यन्मधुराक्षरम् । स्वर्गार्थं यदि वो वाञ्छा निर्वाणार्थाय वा पुनः॥३६०॥ तदलं पशुघातादिदुष्टधमैं र्निबोधत । विज्ञानमयमेतद्वै त्वशेषमधिगच्छत ॥३६९॥ बुध्यध्वं मे वचःसम्यग्बुधैरेवमिहोदितम्। जगदेतदनाधारं भ्रांतिज्ञानानुतत्परम्॥३६ २॥ कि आपलोग इस तपस्या से लौकिक फल प्राप्त करना चाहते हैं अथवा परलौकिक ? दानवों ने कहा-- हमलोगों को परलौकिक फल की प्राप्ति के ही लिए तपस्या अभिमत है ॥३४८॥ परलौकिक फल की प्राप्ति के लिए हमलोग तपस्या कर रहे है; इस विषय में आप क्या कहना चाहते हैं ? दिगम्बर ने कहा-- यदि तुमलोग मुक्ति प्राप्त करना चाहते हो तो मेरी बात मानो ॥३४९॥ आर्हतमत (जैन मत) ही एक मात्र मुक्ति देने वाला है । यह धर्म से विमुक्ति के योग्य मत हैं इससे बढ़कर कोई दूसरा धर्म नहीं है ॥३५०॥ इस मत को ही अपनाकर तुमलोग स्वर्ग तथा मुक्ति को प्राप्त करोंगे । इस प्रकार की मुक्ति तथा दर्शन से रहित अनेक ॥३५१॥ वाक्यों के द्वारा दैत्यों को मायामोह ने वेद बहिष्कृत बना दिया । यह धर्मकारक है । यह अधर्म कारक है । यह सत् है यह असत् भी है॥३५२॥ यह मुक्तिप्रद है और मुक्तिप्रद नही भी है । यह सर्वोत्कृष्ट परमार्थ है यह परमार्थ नहीं भी है । यह करने योग्य है यह नहीं करने योग्य भी है । यह स्पष्ट भी है, यह स्पष्ट नहीं भी है । यही दिगम्बरों का धर्म है, यह अनेक वस्नो को धारण करने वालों का भी है ॥३५३-३५४॥। इसतरह अनेकार्थवाद (सप्तभङ्गीनय) के द्वारा मायामोह 'ने उन दैत्यों को मोहित कर दिया । हे राजन् ! उसके कारण दैत्यों ने अपने धर्म का परित्याग कर दिया ॥३५५॥ चूकि मायामोह ने दैत्यों से कहा कि तुमलोग मेरे धर्म का सम्मान करो, उसी के कारण वे सब आर्हत मतावलम्बी होगये ॥३५६॥ मायामोह ने असुरों से त्रयी धर्म का परित्याग करवा दिया । उसके बाद उन असुरों ने दूसरे असुरों को उसे बतलाया और दूसरों ने दूसरों को उसे बतलाया । इसतरह से एकत्रित होने पर नमोर्हते इसतरह से कहने वाले वे हुए ॥३५७-३५८॥। उन दैत्यों ने थोड़े ही दिनों में प्रायः त्रयीधर्म का परित्याग कर दिया, उसके बाद वह मायामोह लाल वस्त्र धारण करके ॥३५९॥ दूसरे असुरों के पास जाकर मधुर वाणी में कहा यदि आपलोग स्वर्ग अथवा निर्वाण प्राप्त करना चाहते हैं ॥३६०॥ तब तो पशुमारणमय त्रयीधर्म को अपनाना व्यर्थ है । यह तो दोष
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