Srishti Khanda Extracted Page 161

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-161

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

श्रीपद्यमहापुराण जातकौतूहलास्तत्र विविक्तास्तु भवार्णवात् । दानवा ऊचुः दीक्षयस्व गुरोसर्वानपरपन्नान्भक्तितः स्थितान् ॥३३५॥ येन वै न पुनमोहं व्रजायमस्तवशासनात् । सुविरक्ताः स्म संसारे शोकमोहप्रदायिनि ॥३३६॥ उद्धरस्व गुरो सर्वन्किशाकर्षणकूपतः । कस्य देवस्य शरणं गच्छामो ब्राह्मणोत्तम ॥३३७॥ दैवतं च प्रपन्नानां प्रकाशय महामते । स्मरणेनोपवासेन ध्यानधारणया तथा ॥३३८॥ पूजोपहारे च कृते अपवर्गस्तुलभ्यते। विरक्तास्स्म कुटुंबे तु भूयो नात्र यतामहे ॥३३९॥ एवं चैव गुरुछन्नस्तैरुक्तो दनुपुंगवैः । चिंतयामास तत्कार्यं कथयमेतत्करोम्यहम् ॥३४०॥ कथमेते मया पापाः कर्तव्या नरकौकसः । विडंबनाच्छुतेर्वाह्मा त्रैलोक्ये हास्यकारिणः ॥३४९॥ इत्युक्त्वा धिषणो राजंश्चितयामास केशवम् । तस्य तच्चितितं ज्ञात्वा मायामोहं जनार्दनः ॥३४२॥ समुत्पाद्य ददौ तस्य प्राह चेदं बृहस्पतिम् । मायामोहोयमखिलांस्तान्दैत्यान्मोहयिष्यति ॥३४३॥ भवता सहितः सर्वान्विदमार्गबहिष्कृतान्। एवमादिश्य भगवानंतरद्दानं जगाम ह॥३४४॥ तपस्यभिरतान्सोऽथ मायामोहो गतोऽसुरान्। तेषां समीपमागत्य बृहस्पतिरुवाच ह ॥३४५॥ अनुग्रहार्थ युष्माकं भत्तत्र्या प्रीतस्त्विहागतः। योगी दिगम्बरो मुण्डो बर्हिपत्रधरो ह्ययम् ॥३४६॥ इत्युक्ते गुरुणा पश्चान्मायामोहोऽब्रवीद्वचः। भो भो दैत्याधिपतयः प्रब्रूत तपसि स्थिताः ॥३४७॥ ऐहिकार्थ तु पारक्यं तपसः फलमिच्छथ । दानवा ऊचुः पारक्यधर्मलाभाय तपश्चर्या हि नो मता ॥३४८॥ प्रकार का धर्म है, उससे कौन सा परमार्थ होगा 2॥३३३॥ हे दानवेन्द्र ! आप ही बतलायें इसके बाद मैं आपलोगों को बतलाता हुँ । बृहस्पति की पारमार्थ युक्त वाणी को सुनकर ॥३३४॥ उसके विषय में दैत्यों में उत्कण्ठा उत्पन्न हो गयी वे संसार सागर से उदासीन हो गये । दानवों ने कहा-- हे गुरो ! आप हम सबों को दीक्षा दीजिए; हमलोग आपके शरणागत हैं और भक्ति सम्पन्न हैं ॥३३५॥ जिससे की आपकी आज्ञा में रहकर हमलोग कभी भी अज्ञान ग्रस्त नहीं हो सकें । इस शोक तथा मोह प्रदान करने वाले संसार के विषय में हमलोग विरक्त हो गये हैं ॥३३६॥ हे गुरो ! आप हम सबों के इसके केशाकर्षण कूप रूपी संसार से उद्धार करें । हे ब्राह्मणोत्तम ! हमलोग किस देवता के शरण में जायँ ॥३३७॥ इस तरह से उन श्रेष्ठ दानवों के द्वारा कहे जाने पर नकली गुरु बृहस्पति विचारने लगे कि मैं इस कार्य को कैसे सम्पन्न करूँ ?।।३४०॥ इन पापियों को में किसतरह नरकगामी बनाऊं ? पाखण्ड करने पर तो ये वेदबाह्य त्रैलोक्य में वेदों की हँसी करेंगे ॥३४१॥ हे राजन् ! इसतरह से सोचकर बृहस्पति ने भगवान् केशव का ध्यान किए । उनकी अभिलाषा को जानकर भगवान् जनार्जदन ने मायामोह को उत्पन्न करके उन्हें दे दिया और कहा यह मायामोह सम्पूर्ण दैत्यों को मोहित कर देगा ॥३४३॥ आपके साथ यह सबों को वेदमार्ग से बहिष्कृत बना देगा । इसतरह से कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये ॥३४४।। इसके बाद मायामोह तपस्या करने वाले दानवों के पास गया । उन सबों के समीप आकर बृहस्पति ने कहा ॥३३५॥ आपलोगों की प्रीति से प्रसन्न होकर आपलोगों पर कृपा करने के लिए ये दिगम्बर तथा मुण्डी एवं मयूर पंख को धारण करने वाले योगी आये हैं ॥३४६॥ बृहस्पति के द्वारा इस तरह से कहे जाने पर मायामोह ने कहा हे तपस्यारत दैत्याधिपतियों ! आप लोग बतलायें॥३४७॥

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know