Srishti Khanda Extracted Page 160
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-160
Sanskrit Original
सुरास्तु मद्यपानेन मांसादा ब्राह्मणास्त्वमी । धर्मेणानेन कः स्वर्ग कथं मोक्ष गमिष्यति॥३२९॥ दच्च यज्ञादिकं कर्म स्मार्त श्राद्धादिकं तथा। तत्र नैवापवर्गोऽस्ति यत्रैषा श्रूयते श्रुतिः ॥३२२॥ यज्ञ कृत्वा पशुं हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् । यद्येवं गम्यते स्वर्गो नरकः केन गम्यते॥३२३॥ यदि भुक्तमिहाऱ्येन तृप्तिरन्यस्य जायते । दद्यात््रवसतः श्राद्धं न स भोजनमाहरेत् ॥३२४॥ आकाशगामिनो विप्रा: पतिता मांस भक्षणात्। तेषां न विद्यते स्वर्गो मोक्षो नैवेह दानवाः ॥३२५॥ जातस्य जीवितं ज॑तोरिष्टं सर्वस्य जायते । आत्ममांसोपमं मांसं कथं खादेत पंडितः॥३२६॥ योनिजास्तु कथं योनिसेवंते जंतवस्त्वमी। मैथुनेन कथं स्वर्ग यास्यंते दानवेश्वर h मृद्धस्मना यत्र शुद्धिस्तत्र शुद्धिस्तु का भवेत् ॥३२७॥ बिपरीततमं लोकं पश्य दानव यादृशम्। विण्मूत्रस्य कृतोत्सर्गे शिश्चपाने तु शोधनम्॥३२८॥ न संभारोस्ति वदने मृदा तोयेन वा पुनः । भुक्ते वा भोजने राजन्कथंनपानशिश्रयोः ॥३२९॥ क्रियते शोधनं तद्ठद्विपरीता स्थितिस्त्वियम् । यत्र प्रक्षालनं प्रोक्तं तत्र तेनैव कुर्वते ॥३३०॥ तारां बृहस्पतेर्भार्या हृत्वा सोम: पुरागतः । तस्यां जातो बुधः पुत्रो गुरूर्जग्राह तां पुनः ॥३३९॥ गौतमस्य मुने: पत्मीमहल्यां नाम नामतः । अगृद्धात्तां स्वयं शक्रः पश्यधर्मोयथाविधः ॥३३२॥ एतदन्यच्च जगति दृश्यते पापदायकम् । एवं विधो यत्र धर्मः परमार्थो मतस्तु कः ॥३३३॥ वदस्व दानवेंद्र त्वं वद भूयो वदामि ते। गुरोस्तु गदितं श्रुत्वा परमार्थान्वितं वच: ॥३३४॥ वाले विष्णु को मोक्ष कैसे सम्भव हे ? रजोगुणमय ब्रह्मा अपनी सृष्टि को ही अपनी जीविका बनाये हैं ॥३१९॥ वेदिक पक्ष को अपनाने वाले जितने ऋषि हैं वे सबके सब हिंसा करने वाले, क्रूर, मांसभक्षी तथा पापी हें ॥३२०॥ देवगण मदिरा का पान करते है और ये ब्राह्मण मांस खाते हें । इस धर्म से कौन सा स्वर्ग अथवा मोक्ष मिलेगा?।।३ २ १॥ स्मार्त जो ये यज्ञ इत्यादि तथा श्राद्ध इत्यादि धर्म हैं जिनका श्रुति विधान करती है, उनसे स्वर्ग नही मिल सकता है ॥३२२॥ यज्ञ करके, पशुओं को मारकर तथा खून का कीचड़ बनाकर यदि कोई स्वर्ग जाता है तो फिर नरक कौन जाते हैं ?॥३२३॥ यदि यहाँ पर भोजन कर लेने से दूसरे की तृप्ति हो जाती है तो विदेश जाने वाले का श्राद्ध कर देना चाहिए उसको अपने साथ भोजन नहीं ले जाना चाहिए ॥३२४॥ आकाश में जाने वाले ब्राह्मणों का मांस खाने के कारण पतन हो गया दानवों उन सबों को न स्वर्ग मिला न मोक्ष मिला ॥३२५॥ संसार में उत्पन्न सबलोगों को समान रूप से अपना मांस प्रिय होता है, उस मांस को कोई पण्डित (ज्ञानी) व्यक्ति केसे खा सकता है ?॥३२६॥ हे दानवेश्वर योनि से उत्पन्न होने वाले जीव क्यों योनि का सेवन करते हैं । मैथुन से कैसे स्वर्ग प्राप्त हो सकता है ? जहाँ पर मिट्टी तथा भस्म से शुद्धि होती है, वहाँ पर कौन सी शुद्धि हो सकती है ? हे दानवों! इस अत्यन्त विपरीत लोक को आप देंखे, यहाँ मल-मूत्र के परित्याग करने पर तथा स्त्री प्रसङ्ग के द्वारा संशोधन होता है ॥३२८॥ जल और मिट्टी से शुद्धि करने में कोई सामग्री तो जुटानी नही हैं । हे राजन् ! भोजन के बाद मदिरा और स्त्री प्रसङ्ग का सेवन क्यों न किया जाय ॥३२९॥। इसीतरह से शुद्धि की जाती है और यहाँ तो इसके ठीक विपरीत स्थिति है । जहाँ पर प्रक्षालन बतलाया गया हे वहाँ प्रक्षालन नहीं किया जाता है ॥३३०॥। प्राचीन काल में चन्द्रमा ने बृहस्पति की पत्नी का हरण कर लिया । तारा के गर्भ से चन्द्रमा का पुत्र बुध उत्पन्न हुआ, उसके बाद भी बृहस्पति ने तारा को रख लिया ॥३३१॥ गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या को स्वयं इन्द्र ने अपना लिया, इसतरह का तो यह वैदिक धर्म है ॥३३२॥ इन सबों के अतिरिक्त भी संसार में पापप्रद ही दिखायी देता है । जहाँ पर इस
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