Srishti Khanda Extracted Page 159
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-159
Sanskrit Original
श्रोपद्ममहापुराण नाहमेतं प्रजानामि देवं वा दानवं नरम् । मद्रूषधारिणं राजन्वंचनार्थं तवागतम् ॥३०५॥ ततस्ते दानवाः सर्वे साधु साध्विति वादिनः। पुरोधाः पौर्विकोनोस्तु यो वा को वा भवत्विति॥३०६॥ नानेन कार्यमस्माकं यातु होष यथागतः। सक्रोधमशपत्काव्यो दानवेद्रान्समागतान् ॥३०७॥ त्यक्तो यथाहं युष्माभिस्तथा सर्वाश्चिरादिव। गतश्रीकान् गतप्राणान् पश्येयं दुः खजीविकान्॥३ ०८॥ सुधोरामापदं प्राप्तानचिरादेव सर्वशः। एवमुक्त्वा गतः काव्यो यदृच्छातस्तपोवनम् ॥ ३ ० ९॥ तस्मिन्गते ततः शुक्रेस्थितस्तत्र बृहस्पतिः । पालयन्दानवांस्तत्र किंचित्कालमतिष्ठत ॥३९०॥ ततो बहुतिथेकाले अतिक्रांतेनरेश्वर। संभूय दानवाः सर्वे पर्यपृछंस्तदा गुरुम् ॥३११॥ संसारेस्मिन्नसारे तु किंचिज्ज्ञानं प्रयच्छ नः । येन मोक्षं ब्रजामश्च प्रसादात्तव सुव्रत ॥३९२॥ ततः सुरगुरुः प्राह काव्यरूपी तदा गुरुः । ममाप्येषा मतिः पूर्वं या युष्माभिरुदाहता ॥३१३॥ क्षणं कुर्वतु सहिताश्शुची भूय समाहिताः। ज्ञानं वक्ष्यामि वो दैत्या अहं वैमोक्षदायि यत्॥३ ९४॥ एषा श्रुतिवैदिकी या ऋग्यजुः सामसंज्ञिता । वैश्वानरप्रसादात्तु दुःखदा प्राणिनामिह ॥३९५॥ यज्ञश्राद्ध॑ कृतं क्षुद्रै रैहिकस्वार्थतत्परैः । येत्वमी वैष्णवा धर्माः ये च रुद्रकृतास्तथा ॥३९६॥ कुधर्मा दारसहितै हिंसाप्रायाः कृता हि तैः। अर्द्धनारीश्वरो रुद्रः कथं मोक्षं गमिष्यति॥३९७॥ वृतो भूतगणैर्भूरि भूषितश्चास्थिभिस्तथा । नस्वर्गो नैव मोक्षोऽत्र लोकाः क्लिश्यांति वै तथा॥३१८॥ हिंसायामास्थितो विष्णुः कथं मोक्षं गमिष्यति। रजोगुणात्मको ब्रह्मा स्वां सृष्टिमुपजीवति॥३१९॥ देवर्षयोऽथ येचान्ये वैदिकं पक्षमाश्रिताः। हिंसाप्रायाः सदा क्रूरा मांसादाः पापकारिणः॥३२०॥ बाद बृहस्पति ने प्रह्लाद से कहा ॥३०४॥ हे राजन् ! में यह नहीं जानता हूँ कि यह देवता है या दानव । यह मेरा रूप बनाकर आपलोगों को धोखा देने के लिए आया है ॥३०५॥ इसके बाद सभी दानव बहुत अच्छा ! बहुत अच्छा !! कहने लगे । जो पहले से हैं वे ही हमारे पुरोहित है चाहे वे जो कोई भी हों ॥३०६॥। इस नये पुरोहित से हमलोगों का कोई भी प्रयोजन नहीं है, ये लौट जायँ । इसके बाद शुक्राचार्य ने क्रोध करके सभी दानवेन्द्रो को शाप दे दिया ॥३०७॥ तुमलोगों ने जैसे मेरा परित्याग कर दिया है, उसीतरह से मैं तुम लोगों को श्रीहीन, मरे हुए तथा दुःखी रूप से शीघ्र देखूं ।३०८॥ शीघ्र ही तुमलोगों पर भयङ्कर विपत्ति आ जाय, इसतरह से कहकर शुक्राचार्य अपनी इच्छानुसार तपोवन चले गये ॥३०९॥ शुक्राचार्य के चले जाने पर बृहस्पति वहीं बैठे रहे वे कुछ समय तक दानवों की रक्षा करते रहे ॥३१०॥ उसके बाद कुछ समय बीत जाने पर दानवो ने एकत्र होकर बृहस्पति से पूछा।३११॥ हे सुव्रत ! इस असार संसार के विषय में आप हमलोगों को कुछ ज्ञान दीजिये । जिससे कि हमलोग आपकी कृपा से मोक्ष प्राप्त कर सकें ॥३१२॥ उसके बाद शुक्राचार्य का रूप बनाये हुए बृहस्पति ने कहा आज आपलाग जो पूछ रहे हैं उसके विषय में में भी यही चाहता था ॥३१५३॥ आपलोग थोड़ी देर तक पवित्र मन से सावधान हो जाय; क्योंकि दैत्यों मै आपलोगो को मोक्षप्रद ज्ञान प्रदान करूँगा ॥३१४।। यह जो ऋग यजु: तथा साम नाम की संहिता रूपी संहिता है वह वैश्वानर (अग्नि) की कृपा से प्राणियों को दुःख देने वाली है । ये जो वैष्णव धर्म हें तथा जो रुद्रकृत धर्म हैं, जो वे यज्ञ श्राद्ध इत्यादि क्षुद्र धर्म हैं, उनसे लौकिक कामना की पूर्ति होती है ॥३१६॥ पत्नी के साथ किए जाने वालें हिंसा प्रधान धर्म कुधर्म हैं । अर्द्धनारीश्वर रुद्र कैसे मोक्ष प्राप्त कर सकते हें?।।३ १७॥ वे भूतों के समुदाय से घिरे रहते हैं तथा अस्थियों से अलंकृत रहते हैं । इन सबों से न तो स्वर्ग मिल सकता है, और न मुक्ति हो सकती है, लोग व्यर्थ ही इन सबों के अनुष्ठान में कष्ट उठाते हैं ॥३१८॥ हिंसा करने में लगे रहने
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