Srishti Khanda Extracted Page 158

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-158

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Sanskrit Original

शिष्योहि मे कचः पूर्व हतो दानवपुंगवैः। विद्यार्थी तनयो ब्रह्मास्तवायोग्यागतिस्त्विह ॥२९०॥ श्रुत्वा तु तस्य तद्वाक्यं स्मितं कृत्वा वददुरुः | संति चोराः पृथिव्यां ये परद्रव्यापहारिणः ॥२९९॥ एवं विधानदृष्टाश्च रूपदेहापहारिणः । वृत्रघातेन चेद्रस्य ब्रह्महत्या पुराभवत् ॥२९२॥ लोकायतिकशाख्रेण भवता सा तिरस्कृता । जानामि त्वांगिरसं देवाचार्य बृहस्पतिम् ॥२९३॥ मद्रूपधारिणं प्राप्तं सर्वे पश्यत दानवाः । एष वो मोहनायालं प्राप्तो विष्णु विचेष्टितैः ॥२९४॥ तदेनं शृंखलैर्बद्ध्वा क्षिपेत लवणार्णवे । पुनरेवाब्रवीच्छुक्रः पुरोधायं दिवौकसाम् ॥२९५॥ मोहिता नूनमेतेन क्षयं यास्यथ दानवाः। भो अहं दानवेद्रेह वंचितोऽस्मि दुरात्मना ॥२९६॥ किमर्थ भवता त्यक्तः कृतश्चान्यः पुरोहितः । देवाचार्योगिरः पुत्र एष एव बृहस्पति:॥२९७॥ बचितोऽसि न संदेहो हितार्थ तु दिवोकसाम्। त्यजस्वैन महाभाग शत्रुपक्षजयावहम् ॥२९८॥ अनुशिष्यभयाद्यातः पूर्वमेवमहं प्रभो । जलमध्येस्थितः पीतो महादेवेन शंभुना॥२९९॥ उदरस्थस्य मे जातं साग्रं वर्षशतं किल । उदराच्छुक्ररूपेण शिश्रेनाहं विसर्जितः॥३००॥ वरदः प्राह मां देवश्शुक्रेष्टं वरं वृणु । मया वृतो वरं राजन् देवदेवः पिनाकधृत् ॥३०९॥ मनसा चिंतिताह्मर्था मानसे येस्थितावरा:ः । भवंतु मयि ते सर्वे प्रसादात्तव शङ्कर ॥३०२॥ एवमस्त्विति देवेन प्रेषितोऽस्मि तवांतिकम्। तावदत्राभवच्चायं पुरोधास्ते बृहस्पतिः ॥३०३॥ दृष्टः सत्यं दानवेंद्र मयोक्तं त्वं निशामय। बृहस्पतिस्तदा वाक्यं प्रह्वादं प्रत्यभाषत ॥३ ० ४॥ दानवों ने मार दिया । हे ब्रह्मन ! तुम्हारा पुत्र मेरा शिष्य था अतएव आपका यहाँ आना उचित नहीं है ॥२९०॥ शुक्राचार्य की बातों को सुनकर बृहस्पति ने कहा संसार के सभी चोर तो दूसरों के द्रव्य को चुराते हैं ॥२९ १॥ तुम्हारे जैसे रूप तथा शरीर को चुराने वाले चोर नहीं देखे गये । वृत्रासुर को मारने से प्राचीन काल में इन्द्र को ब्रह्महत्या लग गयी ॥२९२॥ आपने तो चार्वाक शास्त्र के द्वारा उसको तिरस्कृत कर दिया । में आपको पहचानता हुँ, आप देवताआं के आचार्य बृहस्पति हैं ॥२९३॥ आप मेरा रूप धारण करके यहाँ आये हैं । दानवों तुम लोग भी देख लो। यह विष्णु के ही समान आपलोगों को मोहित करने के लिए यहाँ आया है ॥२९४॥ इसलिए इसको लोहे की वेणी में बाँधकर क्षार समुद्र में फेंक देना चाहिए । उसके बाद भी शुक्राचार्य ने कहा कि यह देवताओं का पुरोहित हे॥२९५॥ हे दानवों ! इसके द्वारा मोहित होने के कारण आपलोगों का नाश हो जायेगा । हे दानवेन्द्र ! इस दुष्ट ने मुझ को भी धोखा दिया है ॥२९६॥ आपलोगों ने मेरा त्याग करके इसको पुरोहित क्यों बना लिया ? यह देवताआं के आचार्य अङ्गिरा महर्षि का पुत्र बृहस्पति है ॥२९७॥ इसमें कोई सन्देह नहीं है कि देवताओं का कल्याण करने के लिए इसने आपलोगों के साथ छल किया है । हे महाभाग ! इसका आपलोग परित्याग कर दें यह शत्रु पक्ष को विजयी बना देने वाला है ॥२९८॥ हे राजन् ! इन सबों के शिष्यों के भय से प्राचीन काल में में जल में प्रवेश कर गया था । वहाँ पर महादेव ने मुझे पी लिया ॥२९९॥ मैं शङ्करजी के उदर में सौ वर्षों तक पड़ा रहा उसके बाद शङ्करजी ने अपने पेट से मुझको अपने शिशन (लिङ्ग) के मार्ग से शुक्र के रूप में निकाल दिया ॥३००॥ इसके बाद वरदान देने वाले शङ्करजी ने मुझसे कहा-- शुक्र तुम अपना अभीष्ट वर माँगो । उसके बाद मैने देवाराध्य शङ्कर्जी से वरदान माँगा ।।३०१॥ हे शङ्करजी मेरे मन में जो अभिलाषा है, वे सबके सब आपकी कृपा से मुझे वरदान के रूप में प्राप्त हो जायँ ॥३०२॥ शङ्करजी ने कहा ऐसा ही हो, यह कहकर उन्होंने मुझे आपलोगों के पास भेजा इसी बीच में यह बृहस्पति आपलोगों का पुरोहित बन गया ॥३०३॥ हे दानवेंद्र ! आप मेरी सत्य बातों को सुनें । उसके

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