Srishti Khanda Extracted Page 157
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-157
Sanskrit Original
देवि इंदीवरश्यामे वरार्हे वामलोचने । एवं वृणोषि कामांस्त्वं ददे वै वल्गुभाषिते ॥२७५॥ एवं भवतु गच्छाव गृहं मे मत्तकाशिनि । ततः सगृहमागम्य जयंत्या सह चोशना ॥२७६॥ तया सहावसद्देव्या शतवर्षाणि भार्गवः । अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संशितव्रतः ॥२७७॥ कृतार्थमागतं ज्ञात्वा शुक्रं सर्वे दितेस्सुताः। अभिजम्मुर्गृहं तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः॥२७८॥ गता यदा न पश्यंति मायया संवृतं गुरुम्। लक्षणं तस्य चाबुद्ध्वा नाद्यागच्छति नो गुरुः॥२७९॥ एवं ते स्वानि धिष्ण्यानि गताः सर्वे यथागताः । ततो देवगणास्सर्वे गत्वांगिरसमब्रुवन् ॥२८०॥ दानवालये तु भगवान् गत्वा तत्र च तां चमूम् । मोहयित्वात्मवशगां क्षिप्रमेव तथा कुरु ॥२८९॥ धिषणस्तान्सुरानाह एवमेव व्रजाम्यहम् । तेन गत्वा दानवेद्रः प्रह्लादो वै वशीकृतः ॥२८२॥ शुक्रो भूत्वा स्थितस्तत्र पौरोहित्यं चकार सः । स्थितो वर्षशतं साग्रमुशना तावदागतः ॥२८३॥ दनुपुत्रैस्ततो दृष्टः सभायां तु बृहस्पतिः । उशना एक एवात्र द्वितीयः किमिहागतः ॥२८४॥ सुमहत्कौतुकं चात्र भविता विग्रहो दृढम् । किं वदिष्यति लोकोऽयं द्वारि योऽयं व्यवस्थितः॥२८५॥ सभायामास्थितो योऽयं गुरुः किं नो वदिष्यति । एवं ` प्रजल्पतां तेषां दनूनां कविरागतः ॥२८६॥ स्वरूपधारिणं तत्र दृष्ट्वासीनं बृहस्पतिम्। उवाच वचनं क्रुद्धः किमर्थं त्वमिहागतः ॥२८७॥ शिष्यान्मोहयसे मे त्वं युक्तं सुरगुरोस्तव । मूढास्ते त्वां न जानंति त्वन्माया मोहिता भ्रुवम्॥२८८॥ तन्न युक्तं तव ब्रह्मन्परशिष्यप्रधर्षणम् । ब्रज त्वं देवलोकं स्वं तिष्ठधर्ममवाप्स्यसि ॥२८९॥ हो ॥२७४॥ हे देवि ! हे नीलकमल की शोभा वाली ! हे वामलोचने ! तुम्हारी इस मनोहर वाणी से प्रसन्न होकर मैं तुम्हारी इस कामना की पूर्ति कर रहा हूँ ॥२७५॥ हे मत्तकाशिनि ! अब हम दोनो हमारे घर चलें । उसके बाद शुक्राचार्य जयन्ती के साथ घर आये ॥२७६॥ वे उस जयन्ती के साथ सौ वर्षों तक निवास किए । प्रख्यात तपस्वी अपनी माया के प्रभाव से सबों से अदृश्य रहते थे ॥२७७॥ दैत्यों ने जब यह जाना कि शुक्राचार्य कृतार्थ होकर आ गये हें तो वे उनका दर्शन करने की इच्छा से उनके घर गये ॥२७८। वहाँ जाकर भी जब माया से तिरोहित शुक्राचार्य को वे नहीं देख पाये और न तो उनका कोई लक्षण जान पाये तो उन सबों ने सोचा कि हमारे आचार्य आज नहीं आ पाये हैं ॥२७९॥ इसतरह वे जैसे आये थे उसी तरह अपने-अपने घर लौट गये । उसके बाद सभी देवता जाकर बृहस्पति को इस बात को बतलाये ॥२८०॥ देवों ने कहा आप दैत्यों के घर जाकर दैत्यों को इस प्रकार मोहित करें कि वे आपके वशवर्ती होकर आप से प्रेम करने लग जायँ ॥२८ १॥ बृहस्पति ने देवताओं से कहा ठीक है, ऐसा ही होगा । मैं जा रहा हुँ । वे प्रह्लाद के घर जाकर उनको अपने वशवर्ती बना लिए ॥२८२॥ वे शुक्राचार्य बनकर वहाँ पर पौरोहित्य का काम करने लगे । वहाँ वे सौ वर्ष तक बने रहे । उसके बाद वहाँ शुक्राचार्य गये॥२८३॥ दैत्यों ने उनको देखकर जाना कि ये बृहस्पति हैं । एक शुक्राचार्य तो यहाँ पहले से विद्यमान हैं ही दूसरे शुक्राचार्य कहाँ से आ गये ॥२८४॥ यह तो अत्यन्त कौतूहल का विषय है । यहाँ पर झगड़ा होगा । यह जो द्वार पर खड़ा है इसको लोग क्या कहेंगे ?।२८५॥ सभा में जो हमारे गुरु बैठे हैं, वे इसको क्या कहेंगे ? इसतरह से जब दानव आपस में बातें कर रहे थे उसी समय शुक्राचार्य आ गये ॥२८६॥ शुक्राचार्य का रूप बनाये हुए बृहस्पति से क्रोध करके शुक्राचार्य ने कहा-- तुम यहाँ पर किसलिए आये हो ?॥२८७॥ तुम अपनी माया से मेरे शिष्यों को मोहित कर रहे हो ? वे मूर्ख इमीलिए तुमको नहीं पहचाने हैं ॥२८८॥ हे ब्रह्मन् ! दूसरे के शिष्यों को धोखा देना ठीक नहीं है, तुम देवलोक चले जाओ ऐसा करने से तुम्हें पुण्य मिलेगा ॥२८९॥ मेरा शिष्य कच था उसको श्रेष्ठ
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