Srishti Khanda Extracted Page 156

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-156

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Sanskrit Original

ब्रचचर्यानुकूलाभिरुपास्य बहुला: समाः । पूर्णे धूमव्रते तस्मिन् घोरे वर्षसहस्रके ॥२६२॥ वरेण छंदयामासशिवः प्रीतो भवत्तदा। महेश्वर उवाच एतद्व्रतं त्वयैकेन चीर्णं नान्येन केनचित् ॥२६३॥ तस्माद्वै तपसा बुद्धा श्रुतेन च बलेन च । तेजसा च सुराम्सर्वास्त्वमेकोभिभविष्यसि ॥२६४॥ यच्चकिंचिन्मयि ब्रह्मन् विद्यते भृगुनंदन । प्रतिदास्यामि तत्सर्वं त्वया वाच्यं न कस्यचित्॥२६५॥ कि भाषितेन बहुना अवध्यस्त्वं भविष्यसि । तान्दत्वा तुवरांस्तस्मै भार्गवाय पुनः पुनः ॥२६६॥ प्रजेशत्वं धनेशत्वमवध्यत्वं च वै ददौ । एतान् लब्ध्वा वरान्काव्यः संप्रहृष्टतनूरुहः ॥२६७॥ एवमाभाष्य देवेशमीश्वरं नीललोहितम् । प्रज्ञान्वितस्ततस्तस्मै प्राञ्जलिः प्रणतो भवत् ॥२६८॥ ततः सोंतर्हिते देवे जयंतीमिदमब्रवीत् । कस्य त्वं स॒भगे का वा दुःखिते मयि दुःखिता॥२६९॥ महता तपसा युक्ता किमर्थ मां जिगीषसि । अनया संस्थिता भक्त्या प्रश्रयेण दमेन च॥२७०॥ स्नेहेन चैव सुश्रोणि प्रीतोस्मि वरवर्णिनि । किमिच्छसि वरारोहे कस्ते कामः समुद्यतः॥२७१॥ तं ते संपादयाम्यद्य यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् । एवमुक्ता ब्रवीदेनं तपसा ज्ञातुमर्हसि ॥२७२॥ चिकीर्षितं हि मे ब्रह्यंस्त्वं वे वद यथातथम् । एवमुक्तो ब्रवीदेनां दृष्ट्वादिव्येन चक्षुषा ॥२७३॥ मया सहत्वं सुश्रोणिशतवर्षाणि भामिनि। सर्वभूतैरदृश्यांतः संप्रयोगमिहेच्छसि ॥२७४॥ देने वाली तपस्या कर रहे थे । वे अत्यन्त दुर्बल हो गये थे । इसके बाद जैसा कि इन्द्र ने कहा था उसी के अनुसार वह कार्य करने लगी ॥२६०॥ वह शुक्राचार्य के मनोऽनुकूल वाणी से उनकी स्तुति करती थी तथा उनसे मनोहर बातें करती थी । समयानुसार शरीर को सुखप्रद प्रकार से उनके शरीर को दबाती थी ॥२६१॥ त्रतच्या के द्वारा वह उनकी अनेक वर्षो तक उपासना करती रही । इसतरह से एक हजार वर्ष का जब धूमत्रत समाप्त हो गया ॥२६२॥ तो शिवजी प्रसन्न होकर शुक्राचार्य से वरदान माँगने के लिए कहे । महेश्वर ने कहा-- इस ब्रत को केवल तुमने किया है, दूसरा कोई इसे आज तक नहीं कर सका है ॥२६३॥ अतएव तुम अकेले ही देवताओं को अपनी तपस्या, बुद्धि, ज्ञान, बल तथा तेज से अभिभूत कर दोगे ॥२६४॥ हे भृगुनन्दन ! जो कुछ भी मंत्र मेरे पास है उसे में तुम्हें दे रहा हूँ उसे किसी दूसरे को आप मत बतलाइयेगा ॥२६५॥ बहुत कहने से क्या लाभ है ? तुम अबध्य हो जाओगे । शुक्राचार्य को उन समस्त वरदानों को बार-बार प्रदान करके ॥२६६॥ वे शुक्राचार्य को प्रजेशत्व, धनेशत्व तथा अबध्य होने का भी वरदान दे दिये । इन समस्त वरदानों को प्राप्त करके शुक्राचार्य अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥२६७॥ इसतरह से कहकर नील लोहित शङ्करजी को बुद्धिमान् शुक्राचार्य हाथ जोड़कर उनके समक्ष प्रणत हो गये ॥२६८॥ जब शङ्करजी अन्तर्धान हो गये तो शुक्राचार्य ने जयन्ती से कहा सुन्दरि ! तुम कौन हो ? तुम मेरे दुखी: होने पर दुःखी होती हो ॥२६९॥ तुम अपनी इस महान तपस्या से मुझको क्यों जीतना चाहती हो ? । हे सुन्दरि ! तुम्हारी इस निरन्तर भक्ति पूर्वक सेवा दम (इन्द्रियों के निग्रह) तथा स्नेह से मैं प्रसन्न हो गया हूँ । हे वरारोहे ! तुम कया चाहती हो ? तुम्हारी कौन सी कामना है ?॥२७१॥ यदि वह अत्यन्त दुष्कर भी होगी तो भी उसे मैं पूरा करूंगा शुक्राचार्य के इस तरह से कहने पर जयन्ती ने कहा आप अपनी तपस्या के द्वारा मेरी कामना को जान लें ॥२७२॥हे ब्रह्मन् ! आप ही ठीक-ठीक बतलाइये कि मैं क्या चाहती हूँ । इसतरह से कहने पर अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर शुक्राचार्य ने कहा ॥२७३॥ हे सुन्दरि ! हे भामिनि ! तुम सौ वर्षा तक अदृश्य रहकर मेरे साथ रमण करना चाहती

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