Srishti Khanda Extracted Page 155

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-155

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

भुगुरुवाच एषा त्वं विष्णुना देवि हता संजीवयाम्यहम् ॥२४८॥ यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोपि वा। तेन सत्येन जीवस्व यदि सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥२४९॥ ततस्तां प्रोक्ष्य शीताद्धि जीव जीवेति सोऽब्रवीत्। ततोभिव्याहृते तस्मिन्देवी संजीविता तदा ॥२५०॥ ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव । साधुसाध्विति दृष्ट्वैव वचस्तां सर्वतोऽ ब्रुवन् ॥२५१॥ एवं प्रत्याहता तेन देवी सा भृगुणा तदा । मिषतां दैवतानां हि तदद्भुतमिवाभवत् ॥२५२॥ असंभ्रांतेन भृगुणा पत्नी संजीविता पुनः । दृष्ट्वा चेंद्रोनालभत शर्म काव्यभयात्पुनः ॥२५३॥ प्रजागरे तत श्रेंद्रो जयंतीमिदमब्रवीत् । संधिकामोभ्यधाद्वाक्यं स्वां कन्यां पाकशासनः॥२५४॥ इन्द्र उवाच एष काव्योहयनिंद्राय व्रतं चरति दारुणम् । तेनाहं व्याकुलः पुत्रि कृतो मतिमता दृढम् ॥२५५॥ तैस्तैर्मनोनुकू लैश्च उपचारैरतन्द्रिता। आराध्य तथा पुत्रि यथातुष्येत स द्विजः ॥२५६। गच्छ त्वं तस्य दत्तासि प्रयत्नं कुरु मत्कृते। एवमुक्ता जयंती सा वचः संगृह्य वै पितुः ॥२५७॥ अगच्छद्यत्र घोरं स तपोह्यारभ्य तिष्ठति । तं दृष्ट्वा च पिब॑तं सा कणधूममधोमुखम् ॥२५८॥ यक्षेण पात्यमानं च कुंडधारेण पावनम् । दृष्ट्वा तं यतमानं तु देवीकाव्यमवस्थितम् ॥२५९॥ शत्रूपघातेश्राम्यन्तं दुर्बलस्थितिमास्थितम् । पित्रा यथोक्तं वाक्यं साकाव्ये कृतवती तदा॥२६०॥ गीर्भिश्चैवानुकूलाभिः स्तुवन्तीवल्गुभाषिणी । गात्रसंवाहनैः काले सेवमाना त्वचः सुखैः ॥२६१॥ PE re र य खोनन उसी शाप के कारण धर्म के नष्ट हो जाने पर तथा संसार का कल्याण करने के लिए भगवान् बार-बार मनुष्य शरीर धारण करते हैं इसतरह से भगवान् विष्णु को शाप देकर वे स्वयं ख्याति देवी के शिर को उठा लिए ॥२४६-२४७॥ उसे उन्होंने ख्याति देवी के शरीर के साथ जोड़कर हाथ में उसे लेकर कहा भृगु महर्षि ने कहा-- हे देवि ! विष्णु के द्वारा मारी गयी तुमको मैं जिला रहा हूँ ॥२४८॥ यदि मैं सम्पूर्ण धर्मों को जानता हूँ तथा मैंने अनुष्ठान किया हैं यदि मैं यह सत्य बोलता हूँ तो उस सत्य के बल से जीवित हो जाओ ॥२४९॥ उसके बाद ख्याति देवी को ठण्डे पानी से पोंछ कर महर्षि ने कहा जी जाओ, जी जाओ । इसतरह से महर्षि के कहने पर ख्याति देवी जीवित हो गयां ॥२५०॥ उसके पश्चात् सबलोगों ने देखा कि ख्याति देवी जैसे सोये से जग गयी हें । उसे देखकर सबलोग बहुत अच्छा ! बहुत अच्छा ! कहने लगे ॥२५१॥ इस तरह से देवताओं के सामने ही महर्षि भृगु ने ख्याति देवी को जीवित कर दिया, यह अत्यद्भुत जैसा कार्य था ॥२५२॥ बिना किसी अधिक प्रयास के महर्षि भृगु ने अपनी पत्नी को जीवित कर दिया, इस बात को देखकर इन्द्र शुक्राचार्य के भय से भयभीत हो गये ॥२५३॥ सबेरा होने पर इन्द्र ने जाकर संधि करने की इच्छा से अपनी पुत्री जयन्ती से कहा ॥२५४॥ इन्द्र ने कहा-- शुक्राचार्य अत्यन्त सावधानी पूर्वक व्रत कर रहे हैं । उन बुद्धिमान शुक्राचार्य की तपस्या से मैं घबरा गया हूँ ॥२५५॥ हे पुत्रि! तुम उनके पास जाकर उनके मनोऽनुकूल सेवाओं से उनकी ऐसी आराधना करो कि वे प्रसन्न हो जायँ ॥२५६॥ मैंने तुमको उन्हें प्रदान कर दिया । तुम मेरे लिए प्रयास करो । इसतरह से कहने पर जयन्ती पिता की बात मानकर॥२५७॥ वहाँ गयी जहाँ पर शुक्राचार्य घोर तपस्या कर रहे थे । उसने देखा कि शुक्राचार्य नीचे मुख करके कण के धुएँ को पी रहे हैं ॥२५८॥ उस पवित्र धुएँ को यक्ष कुण्ड की धारा से गिर रहा था, उस तरह से उनको तपस्या करते हुए देखकर जयन्ती वहीं स्थित हो गयी ।।२५९॥ शत्रु का नाश करने के लिए शुक्राचार्य श्रान्त कर

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know