Srishti Khanda Extracted Page 154

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-154

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

ततस्तं स्तभितं दृष्ट्वा इंद्रं देवाश्च मूढवत् । प्राद्रवंत ततो भीता इंद्रं दृष्ट्वा वशीकृतम् ॥२३६॥ गतेषु सुरसंघेषु विष्णुरिंद्रमभाषत । विष्णुरुवाच मां त्वं प्रविश भद्रं ते रक्षिष्ये त्वां सुरोत्तम ॥२३७॥ एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरंदर: । विष्णुसंरक्षितं दृष्ट्वा देवी क्रुद्धा वचो5ब्रवीत्॥२३८॥ एष त्वां विष्णुना सार्ध दहामि मघवन् बलातू। मिषतां सर्वभूतानां दृश्यतां मे तपोबलम् ॥२३९॥ तयाभिभूतौ तौ देवाविंद्रविष्णू बभूवतुः । कथं मुच्येय सहितो विष्णुरिंद्रमभाषत ॥२४०॥ इद्रोब्रवीज्जहि होनां यावन्नौ न दहेत्प्रभो । विशेषेणाभिभूतोस्मि जहीमां जहि माचिरम् ॥२४१॥ ततस्समीक्ष्य विष्णुस्तां स्त्रीवधेकृच्छ्मास्थितः । अभिध्याय ततः शक्रमापन्नं सत्वरं प्रभुः॥२४२॥ ततः स त्वरया युक्तः शीघ्रकारीभयान्वितः । ज्ञात्वा विष्णुस्ततस्तस्याः क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम्॥२४३॥ अथ क्रुद्धश्चक्रमादाय शिरश्चिछेद वै भयात्। तं दृष्ट्वा स्त्री वधं घोरं चुक्रोध भृगुरीश्वरः ॥२४४॥ ततोहि शप्तो भृगुणा विष्णुर्भार्यावधे कृते। भरगुरुवाच यत्तया जानताधर्ममवध्या स्त्री निषूदिता ॥२४५॥ तस्मात्त्वं सप्त कृत्वो हि मानुषेषूपयास्यसि। ततस्तेनाभिशापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः ॥२४६॥ लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह । अथ व्याहत्य विष्णुं स तदादाय शिरः स्वयम्॥२४७॥ समानीय ततः कायं पाणौ गृह्योदमब्रवीत् । असुरों को देखकर क्रोध करके उन देवी ने कहा तुमलोगों को मैं निद्रा से मोहित कर दे रही हूँ ॥२३४॥ सभी सामग्रियों को एकत्रित करके ख्याति देवी ने निद्रा की सृष्टि कर दी । हे तपस्वियों योग के बल से ख्याति देवी ने देवताआं को स्तम्भित कर दिया ॥२३५॥ उसके बाद इन्द्र को स्तम्मित देखकर सभी देवता किं कर्तव्य विमूढ हो गये । इन्द्र को वशीकृत देखकर सभी देवता वहाँ से भाग चले ॥२३६॥ देवताओं के चले जाने पर विष्णु ने इन्द्र से कहा विष्णु ने कहा-- हे सुरोत्तम ! तुम मुझ में प्रवेश कर जाओ । तुम्हारा कल्याण हो । मैं तुम्हारी रक्षा करूंगा।२३७॥ इस तरह से कहने पर इन्द्र भगवान् विष्णु में प्रवेश कर गये । विष्णु के द्वारा संरक्षित इन्द्र को देखकर ख्याति देवी ने क्रोध करके कहा ॥२३८॥ इन्द्र अभी-अभी मैं तुमको विष्णु के साथ जला देती हूँ । में यह काम सबों को समक्ष करूंगा तुमलोग मेरी तपस्या के बल को देखो ॥२३९॥ ख्याति देवी के द्वारा इन्द्र और विष्णु दोनों देवता अभिभूत हो गये । इन्द्र ने विष्णु से कहा अब हमलोग कैसे मुक्त हों 2॥२४०॥ इन्द्र ने भगवान् विष्णु से कहा हे प्रभो ! जब तक यह हम दोनों को जला न दे उससे पहले ही आप इसको मार दीजिये । में विशेष रूप से अभिमूत हो गया हूँ, आप इसे शीघ्र ही मार दीजिये ॥२४१॥ उसके बाद भगवान् विष्णु स्री वध से होने वालेपाप का विचार किये । उसके बाद इन्द्र को आपद् ग्रस्त विष्णु ने देखा ॥२४२॥ उसके बाद भयभीत होकर उन्होंने शीघ्रता से जान लिया कि ख्याति देवी क्रूर कर्म (अभिचार कर्म) करना चाहती हें ॥२४३॥ और भयवश उन्होंने चक्र से ख्याति देवी के शिर को काट दिया । स्त्री का भयङ्कर वध देखकर महर्षि भृगु क्रुद्ध हो गये ॥२४४॥ पत्नी का वध करने के कारण महर्षि भृगु ने विष्णु को शाप दे दिया । भृगु महर्षि ने कहा-- तुम धर्म के जानकार हो स्त्री अवध्य होती है, फिर भी तुमने उसे मार दिया ॥२४५॥ अतएव तुम को सात बार मनुष्य योनि में जाना होगा ।

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know