Srishti Khanda Extracted Page 153

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-153

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Sanskrit Original

>या यया लाक 6 5 १२८ श्रीपद्ममहापुराण यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मंत्रानवाप्स्यसि । तथेति समनुज्ञाप्य शुक्रस्तु भृगुनंदनः ॥२२९॥ पादौ संस्पृश्य देवस्य बाढमित्यब्रवीहृचः। व्रतं चराम्यहं देव त्वयादिष्टोऽद्यवै प्रभो ॥२२२॥ आदिष्टो देवदेवेन कृतवान् भार्गवो मुनिः । तदा तस्मिन् गते शुक्रो असुराणां हिताय वै॥२२३॥ मंत्रार्थे तनुते काव्यो ब्रह्मचर्य महेश्वरात् । तद्वुदध्वानीतिपूर्वं वै राजन्यास्तु तदासुखम्॥२२४॥ अस्मिंश्रिद्रे तदामषद्दिवास्तानाभिदुद्रुवुः । दंशिताः सायुधाः सर्वे बृहस्पति पुरःसराः ॥२२५॥ दृष्ट्वा सुरगणा देवाम्प्रगृहीतायुधान्पुनः । उत्पेतुस्सहसा सर्वे संत्रस्तास्तान्वचो ब्रुवन् ॥२२६॥ दैत्या ऊचुः न्यस्तशस्त्रा बयं देवा आचायें ब्रतमास्थिते। दत्वाभवंतस्स्त्वभयं संप्राप्ता नो जिघांसया ॥२२७॥ अनमर्षा वयं सर्वे त्यक्तशस्तराश्च संस्थिता: । चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः ॥२२८॥ रणे विजेतुं देवांश्च न शक्ष्यामः कथंचन। अयुद्धेन प्रपत्स्यामः शरणं काव्यमातरम् ॥२२९॥ ज्ञापयामः कृच्छ्मिदं यावन्नाभ्येति नो गुरुः । निवृत्ते च तथा शुक्रे योत्स्यामो दंशितायुधाः॥२३०॥ एवमुक्त्वा च तेन्योन्यं शरणं काव्यमातरम् । प्रापद्यत ततो भीतास्तेभ्योऽदादभयं तु सा ॥२३९॥ न भेतव्यं न भेतव्यं भयं त्यजत दानवाः । मत्सन्निधयौ वर्ततां वो न भीर्भवितुर्महति ॥२३२॥ तयाभिरक्षितांस्तांश्च दृष्ट्वा देवास्तदाऽ सुरान्। अभिजग्मुः प्रसह्मैतानविचार्यबलाबलम् ॥ २३ ३॥ ततस्तान्बध्यमानांस्तु देवेर्दृष्टवासुरांस्तदा । देवी क्कुद्धाब्रवीद्देवान्निद्रया मोहयाम्यहम् ॥२३४॥ संभृत्य सर्व संभारान्निद्रां सा व्यसृजत्तदा । तस्तंभ देवी च बलाद्योगयुक्ता तपोधना ॥२३५॥ नीचे शिर करके एक हजार वर्ष तक कण के धूमका पान करो ॥२२०॥ यदि तुम पान कर सकोगे तो तुम मन्त्रों को प्राप्त कर सकोगे । उसके बाद भृगुनन्दन शुक्राचार्य ने कहा ऐसा ही मैं करूंगा ॥२२१॥ उन्होंने भगवान् शङ्कर के दोनों चरणों का स्पर्श करके ठीक है, ऐसा कहकर कहा-- हे देव ! मैं व्रत कर रहा हूँ ॥२२२॥ तदनंतर भागर्व मुनि उसी तरह से तप करने लगे जैसा शङ्करजी ने आदेश दिया था । शुक्राचार्य असुरों का कल्याण करने के लिए चले गये ॥२२३॥ महेश्वर से मन्त्र को प्राप्त करने के लिए शुक्राचार्य तपस्या कर रहे हैं, इस नीतिमय बात को जानकर देवता अशान्त हो गये ॥२२४॥ इस दोष को जानकर क्रोधवश देवता क्रोध करके बृहस्पति के साथ आयुध धारण करके दैत्यों पर आक्रमण कर दिए ॥२२५॥ असुरों ने जब देखा कि देवता पुन: आयुध धारण किए हुए हैं तो वे भयभीत होकर सहसा खड़ा हो गये ॥२२६॥ दैत्यों ने देवताओं से कहा--- देवाताओं ! हमारे आचार्य तपस्या कर रहे हैं, हमलोगों ने शस्रों का परित्याग कर दिया हैं । आपलोगों ने हमलोगों को अभय प्रदान किया है, फिर भी हमलोगों को मारने की इच्छा से आप आये हैं ॥२२७॥ हम सभी आमर्ष रहित हें, शस्रों का परित्याग कर दिए हैं। वल्कल तथा कृष्ण मृगचर्म धारण किए है, हमलोग परिग्रह रहित हैं ॥२२८॥ हमलोग युद्ध में देवताओं को किसी भी प्रकार नहीं जीत सकते हैं । युद्ध रहित होकर शुक्राचार्य की माता के शरणागत हैं ॥२२९॥ हम तब तक यह व्रत करेंगे जब तक हमारे गुरु लौट नहीं आते हैं । गुरु के आ जाने पर ही हमलोग आयुध धारण करके युद्ध कर सकेंगे।२३०॥ इसतरह से कहकर वे परस्पर में बातें करके शुक्राचार्य की माता के शरण में चले गये और शुक्राचार्य की माता ने उन्हें अभय प्रदान किया ॥२३१॥ दानवों डरो मत ! डरो मत ! भय त्याग दो । मेरे सन्निकट में रहने पर तुमलोगों को भय नहीं करना चाहिए ॥२३२॥ शुक्राचार्य की माता के द्वारा असुरों को सुरक्षित देखकर देवताओं ने बलाबल का विचार किए बिना असुरों पर आक्रमण कर दिया ॥२३३॥ उसके बाद देवताओं द्वारा मारे जाते हुए

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