Srishti Khanda Extracted Page 152

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-152

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Sanskrit Original

ततः काव्यस्तु तान् दृष्ट्वा तूर्णं देवैरभिद्वुतान्। रक्षाकार्येण संहृत्य देवेभ्यस्तान्सुरार्दितान् ॥२०७॥ काव्यं दृष्ट्वा स्थितं देवानूनिर्विशंकास्तु ते जहुः । ततः काव्योनुचिंत्याथ ब्रह्मणो वचनं हितम् ॥२०८॥ तानुवाच ततः काव्यः पूर्ववृत्तमनुस्मरन् । त्रैलोक्यं वो हृतं सर्व वामनेन त्रिभिःक्रमैः ॥२०९॥ बलिर्बद्धो ततोजंभो निहतश्च विरोचनः । महासुरा द्वादशसु संग्रामेषु सुरैर्हताः ॥२९०॥ तैस्तैरुपायैर्भूयिष्ठा निहतास्तुप्रधानतः । केचिच्छिष्टाश्च यूयं वै युद्धं नास्तीति मे मतम् ॥२९९॥ नीतयो वो विधातव्या उपासे कालपर्ययात् । यास्याम्यहं महादेवं मंत्रार्थं विजयावहम् ॥२१२॥ अप्रतीपांस्ततो देवाम्मंत्रान्गराप्यमहेश्वरात् । योत्स्यामहे पुनर्देवैस्ततः प्राप्स्यथ वै जयम् ॥२९३॥ ततस्ते कृत संवादा देवानूचुस्तदासुराः । न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःसन्नाहा रथैर्विना॥२१४॥ वयं तपश्चरिष्यामः संवृतावल्कलैस्तथा । देवास्तेषां वचःश्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं ततः॥२९५॥ ततोन्यवर्तयन्सर्वे विज्वरा मुदिताश्च ते । न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः ॥२९६॥ ततस्तानव्रवीत्काव्य उपाध्वं तपसि स्थिताः । निरुत्सिक्तास्तपो युक्ताः कालं कार्यार्थसाधकम्॥२ ९७॥ पितुराश्रमसंस्था वै मां प्रतीक्षथ दानवाः। तानुद्दिश्यासुरान्काव्यो महादेवं प्रपद्यत ॥२९८॥ शुक्र उवाच मंत्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ। पराभवाय देवानामसुराणां जयाय च॥२१९॥ एवमुक्तो ब्रवीद्देवो व्रतं त्वं चर भार्गव। पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममधः शिराः ॥२२०॥ लगे । देवताओं से मारे जाते हुए दैत्य शुक्राचार्य के शरण में गये ॥२०६॥ उसके वाद शुक्राचार्य ने देखा कि देवता असुरा को खदड़ रहे हँ । देवताओं द्वारा पीडित असुरों को देखकर शुक्राचार्य ने रक्षा करने वाले मंत्रों से उन सबों को एकत्रित किया ॥२०७॥ वहाँ पर शुक्राचार्य को विद्यमान देखकर देवता निश्शङ्क होकर दैत्यों को मारने लगे । उसके बाद शुक्राचार्य ने ब्रह्माजी के हितकारी बातों को स्मरण किया ॥२०८॥ पूर्व कालिक वृतान्त का स्मरण करके दत्या स कहा वामन ने तुमलोग के लिए त्रैलोक्य को तीन डग में ही हरण कर लिया ॥२०९॥ देवताओं ने बलि का बाँध दिया, जम्भ को मार दिया और विरोचन को भी मार दिया । बारह महा संग्रामों में देवताओं ने बड़े-बड़े दत्यो को मार दिया ॥२१०॥ विभिन्न उपायों से देवताओं ने बहुत अधिक प्रधान दैत्यों को मार दिया है । अब तो कुछ हा तुमलोग बचे हो, अतएव युद्ध करना ठीक नहीं है ॥२११।। अब नीति से काम लेना चाहिये । विजयप्रद मन्त्रा को प्राप्त करने के लिए मैं महादेवजी के पास जा रहा हूँ ॥२१२॥ उसके बाद महेश्वर से मन्त्र प्राप्त करके अविरोधी बने देवताओं के साथ हमलोग युद्ध करेगे ॥२१३॥ उसके बाद देवताओं के साथ मित्रता करके असुरों ने दवताआं से कहा हमलोगों ने अपना शस्त्र रख दिया है, कवच तथा रथ से हमलोग रहित हो गये है ॥२१४॥ हेमलाग बल्कल धारण करके तपस्या करेंगे । उन सबों की वाणी सुनकर देवताआं ने उसे सत्य मान लिया ॥२१५॥ उसके बाद प्रसन्नतापूर्वक सभी देवता लौट गये । दैत्यों के शस्त्र परित्याग कर देने पर देवता भी लौट गये ॥२१६॥ उसके बाद शुक्राचार्य ने दैत्यों से कहा कि तुमलोग तपस्या करते हुए उपासना करो । मद रहित तथा तपस्वी होकरकार्य साधक काल को विताओ ।२१७।। दानवों मेरे पिता के आश्रम में रहकर मेरे लौटने की प्रतीक्षा करो । उनअसुरा का कल्याण करने के लिए शुक्राचार्य महादेव (शङ्करजी) के शरण में गये ॥२१८॥ शुक्राचार्य ने कहा-- हे देव जो मन्त्र बृहस्पति को भी नहीं ज्ञात हैं उन मन्त्रों को में आप से प्राप्त करना चाहता हूँ । जिससे कि देवताओं का पराजय और असुरों को विजय प्राप्त हो सके ॥२१९॥ इस प्रकार से कहने पर शङ्करजी ने कहा तुम तपस्या करो ।

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