Srishti Khanda Extracted Page 151

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-151

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Sanskrit Original

देवासुरक्षयकराः प्रजानां च हिताय वै । हिरण्यकशिपू राजा वर्षाणामर्बुदं बभौ ॥१९३॥ द्विसप्तति तथान्यानि नियुतान्यधिकानि तु । अशीतिं च सहस्राणि त्रैलोक्यैश्वर्यवानभूत् ॥१९४॥ पर्यायेण तु राजाभूद्वलिवर्षार्बुदं पुनः । षष्ठि चैव सहस्राणि नियुतानि च विंशतिम् ॥१९५॥ बलिराज्याधिकारे तु यावत्कालश्चकीर्तितः । तावत्कालं तु प्रह्मादोनिर्वृतोह्यसुरैः सह ॥१९६॥ जयार्थमेतेविज्ञेया असुराणां महौजसः । त्रैलोक्यमिदमव्यग्रं महेन्द्रेणानुपाल्यते ॥९९७॥ असम्पन्नमिदं सर्व यावद्वर्षायुतं पुनः। पर्यायेणैव सम्प्राप्ते त्रैलोक्यं पाकशासने ॥१९८॥ ततोसुरान्परित्यज्य यज्ञो देवानगच्छत। यज्ञे देवानथगते दितिजाः काव्यमब्रुवन्॥१९९॥ दैत्या ऊचुः हृतंमघवता राज्यं त्यक्त्वा यज्ञः सुरान् गतः । स्थातुं न शुक्तमो हयत्रतलप्रविशामो रसातलम् ॥२००॥ एवमुक्तो ब्रवीदेतन्विषण्णान् सांत्वयन् गिरा । मा भैष्ट धारयिष्यामि तेजसा स्वेन वोऽसुराः ॥२०१९॥ मंत्राश्मौषध्यश्चैव धरायां यत्तु वर्तते । मयि तिष्ठति तत्सर्वं पादमात्रं सुरेषु वै ॥२०२॥ तत्सर्व प्रदास्यामि युष्मदर्थे धृतं मया । ततो देवास्तु तान् दृष्ट्वा धृतान्काव्येन धीमता ॥२०३॥ अमंत्रयंत देवा वै संविम्नास्तज्जिघृक्षया। काव्यो होष इदं सर्व व्यावर्तयति नो बलात् ॥२०४॥ साधु गच्छामहे तूर्ण यावन्नच्यावयेत वै। प्रसह्य जित्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे ॥२०५॥ ततो देवास्तु संरब्धा दानवानुपसृत्य ह । ततस्ते वध्यमानास्तैः काव्यमेवाभिदुद्रुवुः॥२०६॥ हुए, उन संग्रामों में सभी दैत्य तथा दानव मिलकर देवताओं से युद्ध करते थे ॥१९२॥ ये युद्ध देवताओं तथा देत्यों का विनाश करने वाले तथा प्रजाओं का कल्याण करने के लिए हुए । उसके बाद हिरण्यकशिपु ने एक अरब, बहत्तर लाख तथा अस्सी हजार वर्षो तक त्रैलोक्य के ऐश्वर्य का स्वामी हुआ ॥१९४॥ उसके वाद बलि राजा हुए । उन्होंने भी एक अरब, बीस लाख, साठ हजार वर्षों तक त्रैलोक्य का ऐश्वर्य भोग किया ॥१९५॥ जब तक बलि का त्रैलोक्य पर अधिकार रहा तब तक प्रह्लाद भी असुरों के साथ सुखपूर्वक रहे ॥१९६।॥ महाओजस्वी असुरों पर विजय प्राप्त करने के लिए इन्द्र शान्ति पूर्वक त्रैलोक्य का पालन करते रहे ॥१९७॥ उस समय दश हजार वर्षो तक यह सम्पूर्ण जगत् अस्त-व्यस्त रहा । उसके बाद जब इन्द्र का त्रैलोक्य पर अधिकार हुआ तो ॥१९८॥ यज्ञ असुरों को त्याग कर देवाओं के पक्ष में चले गये । य॒ज्ञ के देवताओं के पास चले जाने पर दैत्यों ने शुक्राचार्य से कहा ॥१९९॥ दैत्यों ने कहा-- इन्द्र ने हमलोगों के राज्य का हरण कर लिया है, यज्ञ भी हमलोगों को छोड़कर देवताओं के पास चला गया । अतएव हमलोग यहाँ पर नहीं रह सकते है अतएव हमलोग रसातल में चले जा रहे हैं ॥२००॥ इसतरह से कहे जाने पर शुक्राचार्य ने उदास देत्यों को सान्त्वना प्रदान करते हुए कहा असुरों ! डरो मत; मैं अपने तेज से तुम सबों की रक्षा करूंगा ॥२०१॥ पृथिवी पर जितने मंत्र तथा औषधियाँ हैं, उन सबों को मैं जानता हू, देवता तो उसके केवल चौथाई भाग को ही जानते हैं ॥२०२॥ वह सब में तुम लोगों को बतला दूँगा, उन सबों को मैने तुम लोगों के ही लिए धारण किया है । उसके बाद देवताओं ने देखा कि असुरों की रक्षा शुक्राचार्य कर रहे हें॥२०३॥ उसके बाद देवता धबरा गये और वे दैत्यों से उन समस्त औषधियों तथा मन्त्रों को छिन लेने की इच्छा से आपस में विचार किए । ये शुक्राचार्य अपने तेजोबल से हमलोगों को त्रैलोक्याधिकार से हटा देना चाहते हैं। २ ०४॥ जब तक शुक्राचार्य हमलोगों को राज्य से गिरा नहीं देते हैं, उससे पहले ही हमलोग बचे हुए असुरों को बल पूर्वक जीतकर उन्हें पाताल में भगा दे रहे हैं ॥२०५॥ उसके बाद देवगण दानवों के पास आकर उन्हें मारने

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