Srishti Khanda Extracted Page 150
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-150
Sanskrit Original
पुलस्त्य उवाच तेषां जयनिमित्तं वै संग्रामा: स्यु: सुदारुणाः ॥१७८॥ अवतारा दशद्दौच शुद्धा मन्वंतरे स्मृताः । नामधेयं समासेन शृणु तेषां विवक्षितम् ॥१७९॥ प्रथमो नारसिंहस्तु द्वितीयश्चापि वामनः । तृतीयस्तु वराहश्च चतुर्थोमृतमंथनः ॥१८०॥ संग्रामः पंचमश्चैव सुधोरस्तारकामयः । षष्ठो ह्याडीवकाख्यश्च सप्तमस्त्रेपुरस्तथा ॥१८ १॥ अष्टमश्चांधकवधो नवमो वृत्रघातनः । ध्वजश्च दशमस्तेषां हालाहलस्ततः परम् ॥१८२॥ प्रथितोद्वादशस्तेषां घोरः कोलाहलस्तथा । हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नरसिंहेन सूदितः ॥१८३॥ वामनेन बलिर्बद्धत्रैलोक्याक्रमणे पुरा । हिरण्याक्षो हतो इंद्वे प्रतिवादे तु दैवतैः ॥१८४॥ दंष्टया तु वराहेण समुद्रस्थो द्विधा कृतः । प्रह्लादो निर्जितोयुद्ध इंद्रेणामृतमंथने ॥१८५॥ विरोचनस्तु प्राह्नादिर्नित्यमिंद्रवधोद्यतः । इंद्रेणैव च विक्रम्य निहतस्तारकामये॥१८६॥ अशक्कुवत्सु देवेषु त्रिपुरं सोढुमासुरम् । मोहयित्वाऽमृते पीते गोरूपेणासुरारिणा ॥१८७॥ नासन्जीवयितुं शक्या भूयो भूयो मृताऽसुराः । निहता दानवाः सर्वे त्रैलोक्ये त्र्यंबकेण तु ॥१८८॥ असुराश्च पिशाचाश्च दानवाश्चांधके वधे। हतादेवमनुष्यैस्ते पितृभिश्चैव सर्वशः॥१८९॥ संपृक्तो दानवै वृत्रो घोरे कोलाहले हतः। तदाविष्णुसहायेन महेन्द्रेण निपातितः ॥१९०॥ हतस्ततो महेन्द्रेण मायाछन्नस्तु योगवित् । वञ्रेणक्षणमाविश्य विप्रचित्तिः सहानुगः ॥१९१॥ दैत्याश्च दानवाश्चैव संयुताः कृत्स्नतस्तु ते। एते दैवाऽसुरावृत्ताः संग्रामा द्वादशैव तु ॥१९२॥ एक मन्वन्तर में शुद्ध अवतार बारह कहे गये हैं, उन सबों के विवक्षित नामों को तुम संक्षेप में सुनो ॥१७९॥ भगवान् का पहला नरसिंहावतार हुआ, दूसरा वामनावतार हुआ । तीसरा वराहावतार हुआ और चौथा अवतार अमृत मंथन के समय हुआ ॥१८०॥ पाँचवाँ अत्यन्त भयङ्कर तारकामय संग्रामावतार हुआ । छठा अवतार आडी और वक का हुआ । सातवाँ त्रिपुरावतार हुआ ॥१८१॥ आठवाँ अवतार अंधकासुर को मारने वाला हुआ और नवाँ अवतार वत्रासुर को मारने वाला हुआ । दशवाँ अवतार ध्वजरूप से हुआ और ग्यारहवां हालाहल का अवतार हुआ ॥१८१-१८२॥ बारहवाँ अवतार कोलाहल रूप से प्रख्यात है । हिरण्यकशिपु नामक दैत्य को नरसिंह ने मार दिया ॥१८३॥ प्राचीन काल में वामन ने त्रैलोक्य क्रमण के अवसर पर बलि को बाँध दिया । देवताओं के साथ युद्ध में हिरण्याक्ष मारा गया ॥१८४॥ समुद्र में विद्यमान हिरण्याक्ष को वराह ने अपने दाँत से दो भागों में चीर दिया । अमृत मंथन के समय इन्द्र ने प्रह्लाद को परास्त कर दिया ॥१८५॥ प्रह्ाद का पुत्र विरोचन सदा इन्द्र का वध करने के लिए तैयार रहता था वह इन्द्र के साथ युद्ध करके तारकामय में मारा गया ॥१८६॥ देवता त्रिपुर नामक असुर का सामना करने में असमर्थ थे । उस समय भगवान् विष्णु ने असुरों को मोहित करके तथा गौ का रूप धारण करके सम्पूर्ण अमृत कुण्ड को ही पी लिया ॥१८७॥ उसके कारण जो असुर मर जाने के वाद बार-बार शुक्राचार्य के द्वारा जीवित कर दिए जाते थे, वे पुन: उन सबों को जीवित नहीं कर सके । फलतः त्र्यम्बक (श्रीशङ्करजी) ने त्रैलोक्य के समस्त दानवों को मार दिया ॥१८८॥ अन्धकासुर के मार दिए जाने के दाद देव मनुष्यों तथा पितरों ने सम्पूर्ण अमुरों, पिशाचो तथा दानवों को मार दिया ॥१८९॥ दानवों के साथ वृत्रासुर भी कोलाहल नामक भयङ्कर स्थान में माण गया । वहाँ पर भगवान् विष्णु की सहायता से इन्द्र ने वृत्रासुर को मार दिया ॥१९०॥ उसके वाद मायावी तथा योगवेत्ता अपने सहायकों के साथ विप्रचित्ति को इन्द्र ने वज्र से मार दिया ॥१९१॥ ये बारह ही देवासुर संग्राम
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