Srishti Khanda Extracted Page 149
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-149
Sanskrit Original
भीष्म उवाच सप्तर्षयः कुबेरश्च यक्षोमणिधरस्तथा ॥१६७॥ सात्यकिर्नारदश्चैव शिवो धन्वंतरिस्तथा। आदिदेवस्तथा विष्णुरेभिस्तु सह दैवतैः ॥१६८॥ किमर्थं सह संभूताः सुरसम्भूतयः क्षितौ। भविष्याः कति वा चास्य प्रादुर्भावा महात्मनः ॥१६९॥ सर्वक्षेत्रेषु सर्वेषु किमर्थमिह जायते । यदर्थमिह संभूतो विष्णुर्वृष्ण्यंधके कुले॥१७०॥ पुनः पुनर्मनुष्येषु तन्मे त्वं ब्रूहि पृच्छतः । पुलस्त्य उवाच शृणु भूप प्रवक्ष्यामि रहस्यातिरहस्यकम्। यथादिव्यतनुर्विष्णुर्मानुषेष्विह जायते ॥१७१॥ युगांते तु परावृत्ते कालेप्रशिथिले प्रभुः । देवासुरमनुष्येषु जायते हरिरीश्वरः॥१७२॥ 'हिरण्यकशिपुर्दैत्यख्रैलोक्यस्य प्रशासिता। बलिनाधिष्ठिते चैव पुनलोकत्रये क्रमात् ॥१७३॥ सख्यमासीत्परमकं देवानामसुरैः सह। युगाख्यादशसंपूर्णा आसीदव्याकुलं जगत् ॥१७४॥ निदेशस्थायिनश्चापि तयोरदेवासुरास्स्वयं । बद्धो वलिर्विमरदोयं सुसंवृत्तः सुदारुणः ॥९७५॥ देवानामसुराणां च घोरः क्षयकरोमहान्। कर्तु धर्मव्यवस्था च जायते मानुषेष्विह ॥९७६॥ भृगोः शापनिमित्तं तु देवासुरकृते तदा । भीष्म उवाच कथं देवासुरकृते हरिर्देहमवाप्तवान् ॥९७७॥ दैवासुरं यथावृत्तं तन्मेकथय सुब्रत । Hid Rs ES DESPISES HSS प्रणेता भगवान् विष्णु ही थे और वे ही उन सबों के स्वामी थे ॥१६६॥ उनके प्रशासन में रहकर सभी यादव समृद्धि प्राप्त किए । भौष्मजी ने कहा-- सप्तर्षिगण, कुबेर, मणिधर नामक यक्ष ॥१६७॥ सात्यकि, नारद, शिवजी, धन्वन्तरि, तथा देवताओं के साथ आदिदेव विष्णु ये सब किसलिए पृथिवी पर एक ही साथ अवतीर्ण हुए ? अथवा श्रीभगवान् के भविष्यत् काल में कितने अवतार होने वाले हैं ?।१६८-१६९॥ वे सभी योनियों में तथा सभी स्थानों में किसलिए अवतीर्ण होते हैं वे किसलिए. वृष्णि वंश के अंधक वंश में अवतरित हुए ॥१७०॥ वे बार-बार मनुष्यों में क्यों अवतार लेते हैं ? इसे आप मुझे बतलायें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे राजन् ! आप सुनें । में अत्यन्त रहस्यमय बात बतलाता हूँ. । जिसके कारण दिव्य शरीर वाले भगवान् विष्णु मनुष्य रूप से अवतार लेते हैं॥ १७१॥ युग के अन्त में जब धर्म अत्यन्त शिथिल हो जाता है उस समय श्रीभगवान् देव, असुर तथा मनुष्य रूप से अवतरित होते हैं ॥१७२॥ जब महाबलवान् हिरण्यकशिपु नामक दैत्य त्रैलोक्य का प्रशासक था । वह क्रमशः त्रैलोक्य का अधिष्ठाता हो गया ॥१७३॥ उस समय देवताओं की दैत्यों से अत्यन्त मित्रता थी । दश युगों तक सम्पूर्ण जगत् शान्ति पूर्वक था ॥१७४॥ उसी के प्रशासन में देवता और असुर दोनों रहते थे । उस समय जब यह समाचार फैल गया कि भगवान् ने बलि को बाँध दिया ॥१७५॥ इस समाचांर के कारण देवताओं तथा असुरों का बहुत बड़ा विनाश हुआ । उसी समय महर्षि भृगु के शाप के कारण देवताओं तथा असुरों के लिए धर्म की व्यवस्था करने के लिए भगवान् मनुष्य रूप से अवतार लेते हैं ॥१७६॥ भीष्मजी ने कहा-- देवताओं तथा असुरों के लिए भगवान् ने क्यों शरीर धारण किया ॥ १७७॥ हे सुब्रत देवासुर संग्राम कैसे हुआ ? उसे आप मुझे बतलायें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- विजय प्राप्त करने के ही लिए देवताओं और असुरों का भयङ्कर संग्राम होता हे ॥१७८॥
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