Srishti Khanda Extracted Page 147
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-147
Sanskrit Original
| भीतोहं देव कंसस्य ततस्त्वेतदव्रवीमि ते । मम पुत्रा हतास्तेन श्रेष्ठाः षड्भीमविक्रमाः ॥१३८॥ वसुदेववचः श्रुत्वा रूपं संहरदच्युतः । अनुज्ञाप्य तु तं शौरिर्नदगोपगृहेऽनयत् ॥१३९॥ दत्वा तं नंदगोपाय रक्ष्यतामिति चाब्रवीत् । अतस्तु सर्वकल्याणं यादवानां भविष्यति ॥१४०॥ अयं तु भर्गो देवक्या यावत्कंसं हनिष्यति । तावत्पृथिव्यां भविता क्षेमो भारावहःपरम् ॥९४१॥ ये वै दुष्टास्तु राजानस्तांस्तु सर्वान्हनिष्यति । कौरवाणां रणे भूते सर्वक्षत्रसमागमे ॥९४२॥ सारथ्यमर्जुनस्यायं स्वयं देवः करिष्यति । निः क्षत्रियां धरां कृत्वा भोक्ष्यते शेषतां गताम् ॥१४३॥ सर्व यदुकुलं चैव देवलोकं नयिष्यति । भीष्म उवाच क एष वसुदेवस्तु देवकी का यशस्विनी ॥९४४॥ नंदगोपश्च कश्चैव यशोदा का महाव्रता। या विष्णुंपोषितवती यां समातेत्यभाषत॥१४५॥ या गर्भ जनयामास या चैनं समवर्द्वयत् । पुलस्त्य उवाच पुरुषः कश्यपश्चासावदितिस्तत्प्रिया स्मृता ॥१४६॥ कश्यपो ब्रह्मणोंशस्तु पृथिव्या अदितिस्तथा । नंदो द्रोणस्समाख्यातो यशोदाथ धराभवत् ॥९४७॥ अथकामान्महाबाहुर्देवक्याः समपूरयत् । ये तया कांक्षिताः पूर्वमजात्तस्मान्महात्मनः ॥१४८॥ अचिरं स महादेवः प्रविष्टो मानुषीं. तनुम्। मोहयन्सर्वभूतानि योगाद्योगी समाययौ॥९४९॥ नष्टे धर्मे तथा यज्ञे विष्णुर्वृष्णिकुले विभुः | कर्तु धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम् ॥१५०॥ को देखकर वसुदेवजी ने कहा हे प्रभो ! आप अपने इस रूप को उपसंहत कर लीजिये ॥१५३७॥ हे भगवन् ! मैं कंस से भयभीत हूँ इसीलिए ऐसा कह रहा हूँ । कंस ने भयङ्कर पराक्रम वाले मेरे छह पुत्रों को मार दिया है ॥१३८॥ वसुदेवजी की वाणी सुनकर भगवान् अच्युत ने अपने रूप को उपसंहत कर लिया । श्रीभगवान् से निवेदन करके शौरि उनको नन्दगोप के घर लाये ॥१३९॥ उनको नन्दगोप को सौपकर उन्होंने कहा आप इसकी रक्षा करें । इसके द्वारा सभी यादवों का कल्याण होगा ॥१४०॥ यह देवकी का पुत्र जब कंस को मार देगा तब तक यह पृथिवी के भार को दूर करने वाला और कल्याण करने वाला पृथिवी पर रहेगा ॥१४१॥ जो दुष्ट राजा पृथिवी पर हैं, उन सबों ` को यह मार देगा जिसमें सभी क्षत्रियों का समागम होगा उस कौरवों का युद्ध होने पर ।।१४२॥ ये श्रीभगवान् स्वयं अर्जुन के सारथी होंगे । सम्पूर्ण पृथिवी को क्षत्रिय रहित बनाकर बची हुयी पृथिवी का भोग करेंगे ॥१४३॥ यह सम्पूर्ण यदुकूल को स्वर्ग ले जायेंगे । भीष्मजी ने पूछा-- ये वसुदेव कौन हैं ? तथा यशस्विनी देवकी कौन हैं ? जिन्होंने भगवान् विष्णु का पालन-पोषण किया ? जिसे आपने भगवान् श्री की समाता (माता के सदृश) कहा है ? जिस (देवकी ने) भगवान् को पुत्र रूप में उत्पन्न किया है जिस यशोदा ने उनका पालन किया वे कौन है ? पुलस्त्य महर्षि ने कहा- पुरुष (वसुदेव जी) कश्यप महर्षि हैं और देवकी उनकी प्रिय पत्नी अदिति हैं ॥१४६॥ कश्यप महर्षि ब्रह्माजी के अंश हैं और अदिति पृथिवी के अंश हैं । द्रोण ही नंद हैं और यशोदा पृथिवी हैं ॥१४७॥ महाबाहु श्रीभगवान् ने देवकी की इच्छा को पूर्ण किया । वह पहले जो चाहती थी उसी के कारण श्रीभगवान् उनके पुत्र बने।। १४८॥ श्रीभगवान् अपनी योगमाया का आश्रयण लेकर सभी जीवों को मोहित करते हुए शीघ्र ही मानव शरीर में प्रवेश कर गये ।॥।१४९।। जब धर्म नष्ट हो गया था तथा यज्ञ भी नष्ट हो गये थे, उस समय भगवान् विष्णु धर्म
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