Srishti Khanda Extracted Page 146
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-146
Sanskrit Original
अनुजाताभवत्कृष्णा सुभद्रा भद्रभाषिणी । विजयो रोचमानस्तु वर्धमानश्च देवल: ॥१२२॥ एते सर्वे महात्मान उपदेव्यां प्रजज्ञिरे। अगावहं महात्मानं बृहद्देवी व्यजायत॥९२३॥ बृहद्देव्यां स्वयं जज्ञे मन्दको नामनामतः । सप्तमं देवकी पुत्रं रेमंतं सुषुवे सुतम् ॥१२४॥ गवेषणं महाभागं संग्रामेष्वपराजितम्। श्रुतदेव्या विहारे तु वने विचराता पुरा ॥१२५॥ वैश्यायां स मधाच्छौरिः पुत्रं कौशिकमग्रजम् । श्रुतंधरा तु राज्ञी तु सौरगंधपरिग्रहः ॥१२६॥ पुत्रं च कपिलं चैव वसुदेवात्मजो बली । जनाना च विषादोभूत्प्रथमः सधनुर्द्रः ॥१२७॥ सौभद्रश्राभवश्चैव महासत्वौ बभुवतुः । देवभागसुतश्चापि प्रस्तावः स बुध: स्मृतः ॥१२८॥ पण्डितं प्रथमं बाहुदेवश्रवसमुत्तमम्। इक्ष्वाकुकुलतो यस्य मनस्विन्या यशस्विनी ॥१२९॥ निवृत्तशत्रुः शत्रुध्नः श्रद्धा तस्मादजायत । गंडूषायामपत्यानि कृष्णस्तुष्टः शतं ददौ॥१३०॥ स चंद्रं तु महाभागं वीर्यवंतं महाबलम् । रंतिपालश्च रतिश्च नंदनस्य सुतावुभौ ॥१३९॥ शमीकपुत्राश्चत्वारो विक्रांताः सुमहाबलाः । विरजश्च धनुश्चैव व्योमस्तस्य ससृंजयः॥१३२॥ अनपत्योभवद्व्योमः सृंजयस्य धनंजयः । यो जायमानो भोजत्वं राजर्षित्वमवाप्तवान् ॥१३३॥ कृष्णस्य जन्माभ्युदयं यः कीर्तयति नित्यशः । शृणोति वा नरो नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥१३४॥ अथ देवो महादेवः पूर्व कृष्णः प्रजापतिः । विहारार्थं स देवोऽसौ मानुषेष्वप्यजायत॥ १ ३ ५॥ देवक्यां वसुदेवेन तपसा पुष्करेक्षणः । चतुर्बाहुस्तु संजातो दिव्यरूपो जनाश्रयः ॥१३६॥ श्रीवत्सलक्षणं देवं दृष्ट्वा देवैः सलक्षणम् । उवाच वसुदेवस्तं रूपं संहर वै प्रभो ॥१३७॥ के गर्भ से पहले तो महाबाहु पजापति ने जन्म लिया ॥१२१॥ उसके बाद वमुदेवजी की मधुरभाषिणी पुत्री सुभद्रा का जन्म हुआ । सुभद्रा का जन्म भगवान् कृष्ण के जन्म के बाद हुआ । विजय, रोचमान, वर्धमान तथा देवल ॥१२२॥ ये समी उपदेवी के पुत्र थे । महात्मा अगावहन को बृहद् देवी ने जन्म दिया ॥१२३॥ बृहद्देवी के गर्भ से स्वयं मन्दक उत्पन्न हुए । देवकी ने रेमन्त को जन्म दिया ॥१२४॥ अपने पति के साथ वन में विचरण करती हुयी ् रृतदेवी के गर्भ से गवेषण का जन्म हुआ जो कभी युद्ध में पराजित होने वाले नहीं थे ॥१२५॥ शूरपुत्र शौरि ने वैश्या के गर्भ से कौशिक नामक पुत्र को उत्पन्न किया । वसुदेवजी के वलवान् पुत्र सौरगन्ध ने श्रुतंधरा नामक रानी के गर्भ से कपिल नामक पुत्र को उत्पन्न किया । वह लोगों के विषाद स्वरूप प्रथम धनुर्धर हुआ ॥१२६-१२७॥ सौभद्र (अभिमन्यु) तथा अभव ये दोनों महाबलवान् हुए । देवभाग का पुत्र प्रस्ताव हुआ जो बुध कहा गया . है॥१२८॥ प्रख्यात पण्डित बाहुदेवश्रवा नामक पुत्र को सौरगन्ध ने इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न यशस्विनी पत्नी के गर्भ से उत्पन्न किया ॥१२९॥ उनके पुत्र शत्रुरहित शत्रुघ्न थे तथा उनकी पुत्री श्रद्धा थी । प्रसन्न होकर कृष्ण ने गण्डूषा नामक पत्नी के गर्भ से सौ पुत्रों को उत्पन्न किया ॥१३०॥ उन पुत्रों में चन्द्र तथा महाबलवान् वीर्यवान् भी थे । नन्दन के दो पुत्र हुए रन्तिपाल और रन्ति ॥१३१॥ शमीक के चार महाबलवान् तथा पराक्रमी पुत्र हुए, उनके नाम है-- विरज, धनु, व्योम तथा संजय ॥१३२॥ व्योम को कोई पुत्र नहीं हुआ । सुंजय के पुत्र धनञ्जय हुए । वे उत्पन्न होते ही भोज तथा राजर्षि हो गये ।।१३३॥ जो व्यक्ति कृष्ण के जन्म की कथा को प्रतिदिन पढ़ता है, अथवा सुनता है, उसके सभी पाप विनष्ट हो जाते हैं ॥१३४॥ उसके बाद महान देव जो पहले कृष्ण प्रजापति थे वे ही श्रीभगवान् मनुष्य रूप में अवतीर्ण हुए ॥१३५॥ देवकी के गर्भ से वसुदेव के पुत्र के रूप में कमलनयन, प्रजाओं (जीवों) के आश्रय स्वरूप दिव्य रूप वाले भगवान् चतुर्भुज रूप से अवतीर्ण हुए ॥१३६॥ श्रीव्रत्स चिह्न से सुशोभित श्रीभगवान्
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