Srishti Khanda Extracted Page 144
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-144
Sanskrit Original
तेन मिथ्याप्रवादेन संतप्तोऽयं जनार्दनः । ततस्ते यादवाः सर्वे. वासुदेवमथाब्रुवन्॥९ १॥ अस्माकं मनसि ह्यासौत्प्रसेनस्तु त्वया हतः । एकैकस्यास्तु सुन्दयों दश सत्राजितः सुताः ॥९२॥ सत्योत्पन्नास्सुता स्तस्य शतमेकं च विश्रुताः । विख्याताश्च महावीर्या भंगकारश्च पूर्वजः ॥९३॥ सत्या ब्रतवतीस्वप्राभंगकारस्य पूर्वजा । सुषुवस्ताः कुमारांश्च शिनीवालः प्रतापवान् ॥९४॥ अभंगो युयुधानश्च शिनिस्तस्यात्मजो भवत् । तस्माद्युगंधरः पुत्राशशतं तस्य प्रकीर्तिताः ॥९५॥ अनमित्राह्मयो यो वै विख्यातो वृष्णिवंशजः । अनमित्रात् शिनिर्ज्ञे कनिष्ठो वृष्णिनंदनः ॥९६॥ अनमित्राच्च संजज्ञे वृष्णिवीरो युधाजितः । अन्यौ च तनयौ वीरावृषभश्चित्र एव च ॥९७॥ ऋषभः काशिराजस्य सुतां भार्यामनिंदिताम्। जयंतश्न जयंती च शुभां भार्यामविंदत ॥९८॥ जयंतस्य जयंत्या वै पुत्रः समभवत्ततः। सदा यज्वातिधीरश्च श्रुतवानतिथिप्रियः ॥९९॥ अक्रूरः सुषुवे तस्मात्सुदक्षो भूरि दक्षिणः। रत्मकन्या च शैब्या च अक्रूरस्तामवाप्तवान् ॥१००॥ पुत्रानुत्पादयामास एकादश महाबलान् । उपलंभं सदालंभमुत्कलं चार्य्यशैशवम्॥१ ० ९॥ सुधीरं च सदायक्षं शत्रुघ्नं वारितेजयम्। धर्मदृष्टि च धर्म सृष्टिमौलिं तथैव च॥९०२॥ सर्वे च प्रतिहर्तारो रत्नानां जज्ञिरे च ते। अङ्कूराच्छूरसेनायां सुतौ द्वौ कुलनंदनौ ॥१०३॥ देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसंमतौ। अश्विन्यां त्रिचतुः पुत्राः पृथुर्विपृथुरेव च ॥१०४॥ अश्वग्रीवोश्चबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ । रिष्टनेमिः सुवर्चा च सुधर्मा मृदुरेव च ॥१०५॥ अभूमिर्बहुभूमिश्च श्रविष्ठा श्रवणेस्त्रियौ। इमां मिथ्याभिशप्तिं यो वेद कृष्णस्य बुद्धिमान्॥९ ० ६॥ महाबाहु श्रीभगवान् ने कृतकार्य होकर उस कन्या को पत्नी रूप से स्वीकार कर लिया ॥८९॥ उसके बाद श्रीभगवान् उस मणि को लाकर सत्राजित् को सभी यादवों के समक्ष मैंने इसे ऋक्षराज से प्राप्त किया है यह कहकर दे दिया।९०।। उस अफवाह (प्रवाद) के कारण जर्नादन को कष्ट हुआ । उसके बाद उन सभी यादवों ने कहा कि हम लोगों के मन में हो रहा था कि आपने ही प्रसेन को मारा है । सत्राजित् की एक से बढकर एक सुन्दरी दश पुत्रियाँ थीं ॥९१-९२॥ सत्या उसकी पुत्री थी तथा सत्राजित् के एक सौ एक पुत्र थे । वे विख्यात तथा महाबलवान् थे । उनमें सबसे बड़े भङ्गकार थे ॥९३॥ भङ्गकार से पहले सत्या, व्रतवती तथा स्वप्ना उत्पन्न हुयी थी । उन सबों ने प्रतापी शिनीवाल, अभंग तथा युयुधान को जन्म दिया । युयुधान के पुत्र शिनि हुए । शिनि के पुत्र युगंधर हुए । युगंधर के सौ पुत्र हुए ॥९४-९५॥ वृष्णिवंश में उत्पन्न अनमित्र विख्यात थे । अनमित्र के पुत्र शिनि हुए । वे वृष्णिवंश में सबसे छोटे थे ॥९६॥ अनमित्र के पुत्र वृष्णिवंश के वीर युधाजित् हुए । उनके दूसरे और दो पुत्र थे ऋषभ एव चित्र ॥९७॥ ऋषभ ने काशिराज की सुन्दरी पुत्री से विवाह किया । उनका पुत्र जयन्त हुआ जयन्त ने जयन्ती नाम की सुन्दरी पत्नी को प्राप्त किया ॥९८॥ जयन्ती के गर्भ से जयन्त के पुत्र अक्रूर हुए । वे सदा यज्ञ करते रहते थे । वे धैर्य सम्पन्न, वेदज्ञ तथा अतिथिप्रिय थे ॥९९॥ अक्रूर अधिक दक्षिणा वाले यज्ञां को करते थे । अक्रूर ने कन्यारत्न शैव्या को पत्नी के रूप में प्राप्त किया ॥।१००॥ उन्होंने ग्यारह पुत्रों को उत्पन्न किया । उनके नाम थे उपलम्भ, सदालम्भ, उत्कल, आर्यशैशव, सुधीर, सदायक्ष, शत्रुघ्न, वारिमजय, धर्मदृष्टि, धर्म तथा ृ ष्टिमौलि ॥१०१-१०२॥ वे सबके सब रत्नों को ग्रहण करने वाले थे । अक्रूर के दो पुत्र शूरसेना नामक पत्नी से उत्पन्न हुए ॥१०३॥ उनके नाम थे देववान् तथा उपदेव । ये दोनों देवताओं को प्रिय थे । उनकी अश्विनी नामक पली के गर्भ से बारह पुत्र उत्पन्न हुए उनके नाम हैं पृथु, विपथु ॥१०४॥ अश्वग्रीव, अश्वबाहु, सुपार्थक, गवेषण,
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