Srishti Khanda Extracted Page 143

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-143

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Sanskrit Original

श्रीपडामहापुराण बिले शब्दं स शुश्राव कृतं सत्वेन केनचित्। ततः प्रवश्यि सबिलं प्रसेनो ह्यक्षमासदत् ॥७६॥ ऋक्षः प्रसेनं च तथा ऋक्षं चापि प्रसेनजित् । आसाद्य युयुधाते तौ परस्परजयेच्छया ॥७७॥ हत्वा ऋक्षः प्रसेनं च ततस्तं. मणिमाददात् । प्रसेनं तु हतं श्रुत्वा गोविंदः परिशंकितः ॥७८॥ सत्राजित्रा तु तद्भ्रत्रा यादवैश्च तथापरैः । गोविंदेन हतो नूनं प्रसेनो मणिकारणात् ॥७९॥ प्रसेनस्तु गतोऽरण्यं मणिरत्नेन भूषितः। तं दृष्ट्वा निजघानाथ नत्यजन्तं स्यमंतकम् ॥८०॥ जघानैवाप्रदानेन शत्रुभूतं च केशवः । इति प्रवादस्सर्वत्र ख्यातस्सत्राजिता कृतः ॥८९॥ अथ दीर्घेण कालेन मृगयां निर्गतः पुनः । यदृच्छया च गोविंदो बिलाभ्याशमथागमत्॥८ २॥ ततश्शब्दं यथापूर्व स चक्रे ऋक्षराडबली । शब्दं शरुत्वा तु गोविंदः खड्गपाणिः प्रविश्य च॥८ ३॥ अपश्यज्जांबवंतं च ऋक्षराजं महाबलम् । ततस्तूर्णं हषीकेशस्तमृक्षमतिरंहसा ॥८४॥ जांबवंतं स जग्राह क्रोधसंरक्तलोचनः । दृष्ट्वा चैनं तथा विष्णुं कर्मभिर्वैष्णवीं तनुम् ॥८५॥ तुष्टाव ऋक्षराजोऽपि विष्णुसूक्तेन सत्वरम् । ततस्तु भगवांस्तुष्टो वरेण समरोचयत् ॥८ ६॥ जाम्बवानुवाच इष्टं चक्रप्रहारेण त्वत्तो मे मरणं शुभम्। कन्या चेयं मम सुता भर्त्तारं त्वामवाप्रुयात् ॥८७॥ योऽयं मणिः प्रसेनात्तु हत्वा चैवाप्तवानहम्। स त्वया गृह्यतां नाथ मणिरेषोऽत्र वर्त्तते॥८८॥ इत्युक्तो जांबवंतं वै हत्वा चक्रेण केशवः। कृतकार्यो महाबाहुः कन्यां चैवाददौ तदा ॥८९॥ ततः सत्राजिते चैतन्मणिरत्नं स वै ददौ। यल्लब्धमृक्षराजाच्च सर्वयादवसन्निधौ॥९०॥ श्रीकृष्ण उस मणि रत्न को अपने राजा उग्रसेन के लिए माँगे ॥७४॥ समर्थ होकर भी भगवान् श्रीकृष्ण न तो उसे प्राप्त कर सके और न उसको छीने ही । एक बार प्रसेन उस मणि से अलंकृत होकर आखेट करने गये ॥७५॥ प्रसेन ने वहाँ पर एक बिल (गुफा) में किसी जीव की ध्वनि को सुना । प्रसेन उस बिल में प्रवेश कर गये और वहाँ उन्हें एक ऋक्ष मिला ॥७६॥ ऋक्ष प्रसेन को तथा प्रसेन ऋक्ष को प्राप्त करके परस्पर एक दूसरे को जीत लेने की इच्छा से युद्ध करने लगे ॥७७॥ ऋक्ष ने प्रसेनजित् को मारकर उस मणि को ले लिया । प्रसेन को मरा हुआ सुनकर गोविन्द के विषय में शङ्का हुयी ॥७८॥ प्रसेन के भाई सत्राजित् तथा दूसरे यादव कहने लगे कि निश्चित रूप से गोविन्द ने मणि के लिए प्रसेन को मार दिया ॥७९॥ प्रसेन मणिरत्न को धारण करके वन में गये थे । उसको देखकर जब प्रसेन मणि नहीं दे रहे थे तो गोविन्द ने उन्हें मार दिया ॥८०॥ मणि नहीं देने के कारण शत्रु बने हुए प्रसेन को केशव ने मारा । इस तरह का सत्राजित् के द्वारा फैलाया गया प्रवाद सर्वत्र फैल गया ॥८ १॥ दीर्घकाल के बाद मृगया के लिए गये हुए भगवान् गोविन्द उस बिल (गुफा) के पास गये । उस समय भी बलवान् ऋक्षराज ने उसी तरह से आवाज किया । उस शब्द को सुनकर गोविन्द हाथ में तलवार लेकर उस गुफा में प्रवेश कर गये॥८३॥ वहाँ पर उन्होंने महाबलवान् ऋक्षराज जाम्बवान् को देखा । उसके बाद हृषीकेश भगवान् श्रीकृष्ण ने क्रोध से आँखें लाल करके जाम्बवान् को पकड़ लिया ॥८४॥ कर्म के द्वारा वैष्णव शरीर धारण किए भगवान् विष्णु को देखकर॥८५॥ जाम्बवान् ने शीघ्र ही उनकी विष्णु सूक्त से स्तुति की । उससे प्रसन्न होकर भगवान् ने भी जाम्बवान् से वरदान माँगने के लिए कहा ॥८६॥ जाम्बवान् ने कहा-- मैं आपके चक्र के प्रहार से मरना चाहता हूँ । मेरी यह सुन्दरी पुत्री आपको अपने पति रूप से प्राप्त करे ॥८७॥ प्रसेनजित् को मारकर जिस मणि को मैने प्राप्त किया था वह मणि यहाँ पर विद्यमान हैं उसको आप ले लें ॥८८॥ इसतरह से कहे जाने पर भगवान् ने जाम्बवान् को चक्र से मार दिया और

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