Srishti Khanda Extracted Page 142
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-142
Sanskrit Original
अन्यस्तु राष्ट्रपालश्च बद्धमुष्टिः समुष्टिकः । तेषां स्वसारः पंचाग्सन्कंसा कंसवती तथा ॥५९॥ सुरभी राष्ट्रपाली च कंका चेति वरांगनाः। उग्रसेनः सहापत्यो व्याख्यातः कुकुरोद्धवः॥६०॥ भजमानस्य पुत्रोभूद्रथिमुख्यो विदूरथः। राजाधिदेवः शूरश्च विदूरथसुतोऽभवत् ॥६ १॥ राजाधिदेवस्य सुतो जज्ञाते वीरसंमतौ । क्षत्रब्रतेतिनिरतौ शोणाश्वः श्वेतवाहनः॥६ २॥ शोणाश्वस्य सुताः पंच शूरा रणविशारदाः । शमी च राजशर्मा च निमूर्त्त: शत्रुजिच्छुचिः ॥६३॥ शमीपुत्रः प्रतिक्षत्रः प्रतिक्षस्य चात्मजः । प्रतिक्षत्रसुतो भोजो हृदीकस्तस्य चात्मजः ॥ हदीकस्याभवन्पुत्रा दश भीमपराक्रमाः ॥६ ४॥ कृतवर्माग्रजस्तेषां शतधन्वा च सत्तमः । देवार्हश्च सुभानुश्च भीषणश्च महाबलः ॥६५॥ अजातश्च विजातश्च करकश्च करंधमः । देवार्हस्य सुतो विद्वान् जज्ञे कंबलबर्हिषः ॥६६॥ असमौजास्ततस्तस्य समौजाश्च सुतावुभौ । अजातपुत्रस्य सुतौ प्रजायेते समौजसौ॥६७॥ समौजः पुत्रा विख्यातास्रयः परमधार्मिकाः । सुदंशश्च॒ सुवंशश्च कृष्ण इत्यनुनामतः ॥६८॥ अंधकानामिमं वंशं यः कीर्तयति नित्यशः । आत्मनो विपुलं वंशं प्रजामाप्रोत्ययं ततः ॥६९॥ गांधारी चैव माद्री च क्रोष्टोभर्यि बभूवतुः । गांधारीजनयामास सुमित्रं मित्रवत्सलम् ॥७०॥ माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवमीढुषम्। अनमित्रं शिनिं चैव पंचात्र कृतलक्षणाः ॥७१॥ अनमित्रसुतो निघ्नो निध्नस्यापि च द्वौ सुतौ । प्रसेनश्च महावीर्यः शक्तिसेनश्च तावुभौ॥७२॥ स्यमंतकं प्रसेनस्य मणिरत्ममनुत्तमं । पृथिव्यां मणिरत्मानां राजेति समुदाहतम्॥७३॥ हृदि कृत्वा सुबहुशो मणि सोऽथ व्यराजत । मणिरत्नं ययाचेथ राजार्थं शौरिरुत्तमम् ॥७४॥ गोविदश्च न तं लेभे शक्तोपि न जहार सः। कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः ॥७५॥ ु मुष्टि । कंसादि की पांच बहनें थीं--- कंसा, कंसवती, सुरभी, राष्ट्रपाली तथा कङ्का । ये सभी सुन्दर स्रिया थीं । पुत्रों के साथ उग्रसेन का वर्णन मैं पहले कर चुका हूँ । उग्रसेन कुकुर वंश में उत्पन्न हुए थे ॥६०॥ रथियों में प्रधान विदूरथ भजमान के पुत्र थे । विदूरथ के पुत्र राजाधिदेव हुए ॥६१॥ राजाधिदेव के दो पुत्र हुए शोणाश्व तथा श्वेत वाहन । ये दोनों प्रख्यात वीर और क्षत्रिय ब्रत का पालन करने वाले थे ॥६२॥ शोणाश्व के पाँच पुत्र हुए वे सभी शूर वीर तथा युद्ध करने में निपुण थे । उनके नाम थे शमी, राजशर्मा, निमूर्त, शत्रुजित् तथा शुचि ॥६३॥ शमी के पुत्र प्रतिक्षत्र थे और प्रतिक्षत्र के पुत्र भोज हुए और भोज के पुत्र हृदीक हुए । हदीक के दश पुत्र हुए वे भयङ्कर पराक्रमी थे ॥६४॥ उन सबों में बड़े कृतवर्मा और शतधन्वा थे । इनसे अतिरिक्तों के नाम थे-- देवार्ह, सुभानु, भीषण, महाबल, अजात, विजात, करक और करंधम । देवार्ह के विद्वान् पुत्र कम्बल बर्हिष हुए ॥६५-६६॥ असमौजा और समौजा । आनर्त पुत्र के दो पुत्र समान ओज वाले हुए ॥६७॥ समौजा के परम धार्मिक रूप से विख्यात तीन पुत्र हुए सुदंश, सुवंश और अनुकृष्ण ॥६८॥ अंधकों के इस वंश का कीर्तन जो नित्य करता है वह अपने विशाल वंश तथा अनंत प्रजाओं को प्राप्त करता है ॥६९॥ क्रोष्टू की दो पत्नियाँ थीं गांधारी तथा माद्री । गान्धारी ने मित्र वत्सल सुमित्र को जन्म दिया ॥७०॥ माद्री ने पांच पुत्रों को जन्म दिया उनके नाम थे युधाजित्, देव, मीढुष, अनमित्र तथा शिनि। ये पांचो लक्षण सम्पन्न थे ॥७१॥ अनमित्र के पुत्र निघ्न हुए और निघ्न के भी दो पुत्र हुए, प्रसेन तथा शक्तिसेन।।७२॥ प्रसेन के पास स्यमंतक नामक सर्वोत्तम मणि रत्न था । उसको पृथिवी पर विद्यमान सभी मणिरत्नों का राजा कहा गया है ।।७३॥ प्रसेन अपने हृदय पर प्राय: उस मणि को बाँधकर सुशोभित होते थे । भगवान्
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