Srishti Khanda Extracted Page 141

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-141

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Sanskrit Original

रूपवांश्च महातेजा भोजोतोमृतकावतीम् । शरकान्तस्य दुहिता सुषुवे चतुरः सुतान् ॥४४॥ कुकुरं भजमानं च श्यामं कंबलबर्हिषम्। कुकुरस्यात्मजो वृष्टिवृष्टे स्तु तनयो धृतिः ॥४५॥ कपोतरोमा तस्यापि तित्तिरिस्तस्य चात्मजः । तस्यासी द्वहुपुत्रस्तु विद्वान्पुत्रो नरिःकिल॥४६॥ ख्यायते तस्य नामान्यच्चंदनोदकदुंदुभिः । अस्यासीदभिजित्पुत्रस्ततो जातः पुनर्वसुः ॥४७॥ अपुत्रो ह्यभिजित्पूर्वमृषिभिःप्रेरितो मुदा । अश्वमेधं तु पुत्रार्थमाजुहाव नरोत्तमः ॥४८॥ तस्य मध्ये विचरतः सभामध्यात्समुत्थितः। अन्धस्तुविद्वान्धर्मज्ञो यज्ञदाता पुनर्वसुः ॥४९॥ तस्यासीत्पुत्रमिथुनं वसोश्चारिजितः किल। आहुकश्चाहुकीचैव ख्यातामतिमतांवर ॥५ ०॥ इमांश्रोदाहरंत्यत्र श्लोकांश्वातिरसात्मकान्। सोपासंगानुकर्षाणां तनुत्राणां वरूथिनाम् ॥५१॥ रथानां मेघघोषाणां सहस्त्राणि दशैव तु । नासत्यवादिनो भोजा नायज्ञा नासहस्त्रदाः ॥५२॥ नाशुचिर्नाप्यविद्वांसो न भोजादधिकोभवत् । आहुकांतमनुप्राप्त इत्येषोन्वयः उच्यते॥५३॥ आहुकश्चाप्यवंतीषु स्वसारं चाहुळीं ददौ । आहुकस्यैव दुहिता पुत्रौ द्वौ समसूयत ॥५४॥ देवकं चोग्रसेनं च देवगर्भसमावुभौ । देवकस्य सुताश्चैव जज्ञिरे त्रिदशोपमाः ॥५५॥ देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः। तेषां स्वसारः सप्तैव वसुदेवाय ता ददौ ॥५६॥ देवकी श्रुतदेवा च यशोदा च श्रुतिश्रवा। श्रीदेवा चोपदेवा च सुरूपा चेति सप्तमी ॥५७॥ नवोग्रसेनस्य सुताः कंसस्तेषां च पूर्वजः । न्यग्रोधस्तु सुनामा च कंकः शंकुः सुभूश्च यः॥५८॥ ० न न Sst OMNES aS SRO वे यज्ञ, दान और तपस्या में धैर्य सम्पन्न और ब्राह्मण भक्त तथा सुदृढ ब्रत वाले थे भोज के शरतकान्त की पुत्री मृतकावती के गर्भ से चार पुत्र हुए उनके नाम थे कुकुर, भजमान, श्यामांक और बलबर्हिष । कुकुर के पत्र वृष्टि थे। और वृष्टि के पुत्र धृति हुए ॥४२-४५॥ धृति के पुत्र कपोतरोमा हुए कपोतरोमा के पुत्र तितिरि हुए । तितिरि के पुत्र नरि हुए । इनके बहुत से पुत्र हुए । नरि विद्वान् थे । नरि के दूसरे नाम चन्दनोदक तथा दुन्दुभि भी थे । चन्दनोदक के पुत्र अभिजित् हुए । उनके पुत्र पुनर्वसु हुए ॥४६-४७।। अभिजित् का पहले कोई पुत्र नही था । उनको ऋषयों ने अश्वमेध याग करने के लिए प्रेरित किया । उन्होने प्रसन्नता पूर्वक पुत्र प्राप्त करने के लिए अश्वमेध याग किया ॥४८॥ जब राजा अपनी सभा में विचरण कर रहे थे उनकी सभा के मध्य से एक पुत्र निकला जो अन्धा, विद्वान्, धर्मज तथा यज्ञ में दान करने वाला था । वसु के दो जुड़वे पुत्र हुए । एक कन्या थी और दुसरा पुत्र, पुत्र का नाम आहुक हुआ और कन्या का नाम आहुकी था ॥४९-५०॥ इनके विषय में निम्नाङ्कित रसमय श्लोक गाये जाते हैं । उपासङ्ग तथा अनुकर्ष से युक्त, कवचधारी सेनाओं तथा मेघ के समान ध्वनि करने वाले दश हजार रथ आहुक के थे । भोज के वंश में ऐसा कोई नहीं हुआ जो मिथ्याभाषी हो, यज्ञ नहीं करता हो तथा सहस्र से कम दान देने वाला हो ॥५१-५२॥ इस वंश में कोई भी अपवित्र रहने वाला अथवा मूर्ख नहीं हुआ ! भोज से बढकर कोई भी राजा नहीं हुआ । भोज का वंश आहुक पर्यन्त ही चला, यह बतलाया जाता है ॥५३॥ आहुक ने अपनी बहन आहुकी का विवाह अवन्तिका राज्य में कर दिया। आहुकी की पुत्री ने दो पुत्रों को जन्म दिया ॥५४॥ उनके नाम देवक और उग्रसेन थे । दोनों देवकुमार के समान थे । देवक के पुत्र देवताओं के समान उत्पन्न हुए ॥५५॥ उनके नाम हैं-- देवावान्, उपदेव, सुदेव, और देवरक्षित । इन सबो की सात बहनें थीं उन सबों का विवाह वसुदेवजी से हुआ ॥५६॥ देवकी, श्रुतदेवा, यशोदा, श्रुतिश्रवा, श्रीदेवा, उपदेवा तथा सुरूपा ये उनके नाम थे ॥५७॥ उग्रसेन के नव पुत्र थे और उन सबों में कंस बड़ा था । दूसरे पुत्रों के नाम थे न्याग्रोध, सुनामा, कंक, शंकु:, सुभू ॥५८॥ राष्ट्रपाल, बद्धमुष्टि और

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