Srishti Khanda Extracted Page 140
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-140
Sanskrit Original
वेत्रकीत्वभवद्धार्या अंशोस्तस्यां व्यजायत । सात्वतः सत्वसंपन्नः सात्वतान् कीर्तिवर््दनः ॥२९॥ इमां विसृष्टिं विज्ञाय ज्यामघस्य महात्मनः । प्रजावानेति सायुज्यं राज्ञः सोमस्य धीमतः ॥३०॥ सात्वतान्सत्वसंपन्ना कौसल्या सुषुवे सुतान् । तेषां सर्गाश्च चत्वारो विस्तरेणैव तान् श्ृणु॥३९॥ भजमानस्य सुंजय्यां भाजनामासुतो भवत्। सृंजयस्य सुतायां तु भाजकास्तु ततोऽ भवन् ॥३२॥ तस्य भाजस्य भार्ये द्वे सुषुवाते सुतान्बहुन्। नेमिं च कृकणं चैव वृष्णि परपुरंजयम् ॥३३॥ ते भाजकाः स्मृतायस्माद्धजमानाद्विजज्ञरे । देवावृध: पृथुर्नाम मधूनां मित्रवर्द्धनः ॥३४॥ अपुत्र स्त्वभवद्राजा चचार परमं तपः। पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्पृहन् ॥३५॥ संयोज्य कृष्णमेवाथ पर्णाशायाजलं स्पृशन् । सा तोयस्पर्श नात्तस्य सांनिध्यं निम्नगाह्मगात्॥३६॥ कल्याणं चरतस्तस्य शुशोच निम्नगा ततः । चिंतयाथपरीतात्मा जगामाथ विनिश्चयम् ॥३७॥ भूत्वा गच्छाम्यहं नारी यस्यामेवं विधः सुतः । जायेत तस्मादद्याहं भवाम्यस्य सुतप्रदा ॥३८॥ अथभूत्वा कुमारी सा विभ्रती परमं वपुः । ज्ञापयामास राजानं तामियेष नृपस्ततः॥३९॥ अथ सा नवमे मासि सुषुवे सरितांवरा। पुत्रं सर्वगुणोपेतं बश्नुं देवावृधात्परम् ॥४०॥ अत्र वंशे पुराणज्ञा ब्रुवंतीतिपरिश्रुतम्। गुणान्देवावृधस्याथ कीर्त्तयंतो महात्मनः ॥४९॥ बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः। षष्ठिः शतं च पुत्राणाम् सहस्त्राणि च सप्तति:॥४ २॥ एतेऽमृतत्वं संप्राप्ता बश्रोर्देवावृधादपि । यज्ञदानतपोधीमान्रहमण्यस्सुदृढव्रतः ॥४३॥ गर्भ से उनका पुत्र अंशु का जन्म हुआ ॥२८॥ अंशु की पत्नी का नाम वेत्रकी था । उसके गर्भ से अंशु के पुत्र सात्वत हुए । वे सत्त्व सम्पन्न तथा सात्वतों की कीर्ति को बढाने वाले थे ॥२९॥ महात्मा ज्यामध की इस विसृष्टि (सन्तत्ति को जानकर) कोई भी सन्तान वाला सोम के सायुज्य को प्राप्त करता है ॥३०॥ सात्वत से उनकी सत्त्वगुण सम्पन्न पत्नी कौसल्या ने पुत्रों को उत्पन्न किया उनकी सृष्टि चार प्रकार की हुई उसे विस्तार से सुनो ॥३ १॥ भजमान का सृञ्जयी के गर्भ से भाज नामक पुत्र हुआ । उसके बाद सृञ्जय की पुत्री के गर्भ से उत्पन्न होने वाले भाजक कहलाये।।३ २॥ भाजक की दो पत्नियाँ थी । उन सबों ने बहुत पुत्रों को उत्पन्न किया । उनके नाम थे नेमि, कृकण और वृष्णि । ये शत्रुओं की नगर को जीत लेने वाले हुए ॥३३॥ भजमान से उत्पन्न होने के कारण ये भाजक कहलाये । मधु के मित्रों को बढाने वाले पुत्र देवावृध का दूसरा नाम पृथु था ॥३४॥ उनका कोई पुत्र नहीं था । उन्होंने कठोर तपस्या की । वे चाहते थे कि हमारा पुत्र सर्वगुण सम्पन्न हो ॥३५॥ वे भगवान् कृष्ण का ध्यान करते हुए पर्णाशा नदी के जल को पीते हुए तपस्या करते थे । वह नदी राजा के जल का स्पर्श करने के कारण उनके पास आयी ॥३६॥ कल्याण का आचरण करते हुए राजा के पास आकर वह सोचने लगी । चिन्तन करते-करते उसने निश्चय किया कि ॥३७॥ मैं नारी बनकर उनके पास चलूं जिससे मेरे गर्भ से इस प्रकार का पुत्र होए । अतएव मैं इस राजा को पुत्र प्रदान करने वाली ही रही हूँ ॥३८॥ उसके बाद वह कुमारी बन गयी और अत्यन्त सुन्दर शरीर को धारण कर ली । उसने राजा को अपना परिचय दिया । उसके बाद राजा भी उसे, प्राप्त करना चाहे ॥३ ९॥ उसके बाद नवें महीने में उस श्रेष्ठ नदी ने देवावृध से देवता के समान गुण वाले बभ्रु नामक पुत्र को जन्म दिया । बभ्रु सभी गुणों से युक्त थे ॥४०॥ इस देवावृध के वंश के विषय में पुराणज्ञों को कहते हुए सुना गया है--- वेमहात्मा देवावृध के गुणों का कीर्तन करते हुए कहते हैं ॥४१॥ बश्रु मनुष्यों में श्रेष्ठ हैं और देवावृध देवताओं के समान हैं । देवावृध तथा बश्रु के उपदेश से छिहत्तर हजार मनुष्यों ने मुक्ति प्राप कर ली । बभ्रु से भोज का जन्म हुआ।
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