Srishti Khanda Extracted Page 139
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-139
Sanskrit Original
जगामधनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी । नर्मदा तट एकाकी केवलं वृत्तिकर्शितः ॥१४॥ ऋक्षवंत॑ गिरिं गत्वा मुक्तमन्यैरुपाविशत् । ज्यामघस्याभवद्धार्या शैब्या परिणता सती ॥१५॥ अपुत्रोप्यभवद्राजा भार्यामन्यामचिंतयन् । तस्यासीद्विजयो युद्धे तत्र कन्यामवाप्य सः ॥१६॥ भार्यामुवाच संत्रासात्स्नुषेयं ते शुचिस्मिते । एवमुक्त्वा ब्रवीदेनं कस्य केयं स्नुषेति वै ॥१७॥ राजोवाच यस्ते जनिष्यते पुत्रस्तस्य भार्या भविष्यति । तस्याः सा तपसोग्रेण कन्यायाः संप्रसूयत॥१८॥ पुत्रं विदर्भ सुभगं शैब्यापरिणता सती। राजपुत्र्यां तु विद्वांसौ स्नुषायां क्रथकौशिकौ॥९९॥ लोमपाद तृतीयं तु पुत्रं परमधार्मिकम् । पश्चाद्विद्भोऽ जनयच्छुरं रणविशारदम्॥२०॥ लोमपादात्मजो बश्चुर्धृतिस्तस्य तु चात्मजः। कौशिकस्यात्मजश्चेदिस्तस्माच्चैद्यनृपाः स्मृताः ॥२१॥ क्रथो विदर्भपुत्रो यः कुंतिस्तस्यात्मजो भवत्। कुंतेर्धृष्टस्ततो जत्ञेधृष्टात्सृष्टः प्रतापवान् ॥२२॥ सृष्टस्य पुत्रो धर्मात्मा निवृत्तिः परवीरहा । निवृत्तिपुत्रो दाशाहों नाम्ना स तु विदूरथः ॥२३॥ दाशार्हपुत्रो भीमस्तु भीमाज्जीमूत उच्यते । जीमूतपुत्रो विकृतिस्तस्य भीमरथः सुतः॥२४॥ अथ भीमरथस्यापि पुत्रो नवरथः किल । तस्य चासीहृशरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः ॥२५॥ तस्मात्करं भस्तस्माच्च देवरातो बभूव ह । देवक्षत्रोऽ भवद्राजा देवरातान्महायशाः॥२६॥ देवगर्भसमो जज्ञे देवक्षत्रस्य नंदनः । मधुर्नाममहातेजा मधोः कुरुवशः स्मृतः॥२७॥ आसीत्कुरुवशात्पुत्रः पुरुहोत्रः प्रतापवान्। अंशुर्जज्ञेय वैदर्भ्या द्रवंत्यां पुरुहोत्रतः ॥२८॥ निकाल दिया और ज्यामघ जाकर वनों में रहने लगे । ब्राह्मणों के द्वारा उपदेश प्राप्त करके ज्यामघ आश्रम में शन्तिपूर्वक रहने लगे ॥१३॥ इसके बाद वे ध्वज से युक्त रथ पर चढकर धनुष धारण करके अकेले ऋक्ष पर्वत पर चले गये दूसरों से परित्यक्त होकर वहीं वे रहने लगे । ज्यामघ की सती पत्नी शैव्या थी ॥ १४-१५॥ पुत्रहीन होने पर भी ज्यामघ किसी दूसरी पत्नी को नहीं प्राप्त करना चाहे । एक युद्ध में ज्यामघ विजयी हो गये । वहाँ उन्होंने एक कन्या को देखा ।।१६।। उसके बाद वे अपनी पत्नी से डरते हुए कहे हे सुन्दरि ! यह तुम्हारी पुत्रबधू है । यह किसीकी पुत्र वधू है ॥१७॥ पत्नी के इस तरह पूछने पर राजा ने कहा-- तुम्हारा जो पुत्र उत्पन्न होगा उसीकी यह पत्नी होगी । उस कन्या के उग्र तप के प्रभाव से रानी ने पुत्र को जन्म दिया ॥१८॥ शैव्या ने अपने सुन्दर पुत्र विदर्भ का विवाह उस कन्या से कर दिया । उस राजकुमारी के गर्भ से दो पुत्र हुए क्रथ तथा कौशिक ॥१९॥ विदर्भ के तीसरे पुत्र का नाम लोमपाद हुआ । लोमपाद अत्यन्त धार्मिक हुए । विदर्भ ने युद्ध करने में निपुण लोमपाद को सबसे बाद में पैदा किया ॥२०॥ लोमपाद के पुत्र बभ्रु हुए और बच्नु के पुत्र धृति हुए । कौशिक के पुत्र चेदि हुए, उन्हीं के वंश में चैद्यराज गण हुए ॥२१॥ विदर्भ के पुत्र जो क्रथ थे उनके पुत्र कुन्ति हुए । कुन्ति के पुत्र धृष्ट हुए और धृष्ट के प्रतापी पुत्र सृष्ट हुए ॥२२॥ सृष्ट के धर्मात्मा तथा शत्रुओं को मारने वाले पुत्र निवृत्ति हुए । निवृत्ति के पुत्र दाशार्ह हुए और वे विदूरथ के नाम से प्रसिद्ध हुए ॥२३॥ दाशार्ह के पुत्र भीम हुए और भीम के पुत्र जीमूत कहे जाते हैं । जीमूत के पुत्र विकृति हुए और विकृति के पुत्र भीमरथ हुए ॥२४॥ उसके बाद भीमरथ के पुत्र नवरथ हुए! नवरथ के पुत्र दशरथ थे और दशरथ के पुत्र शुकनि हुए ॥२५॥ उनके पुत्र करम्भ हुए और करम्भ के पुत्र देवरात हुए । देवरात के पुत्र महायशस्वी देवक्षत्र हुए ॥२६॥ देवक्षत्र का पुत्र देवकुमार के समान हुआ । उसका नाम मधु हुआ । मधु के पुत्र कुरुवश हुए ॥२७॥ कुरुवश के प्रतापी पुत्र पुरुहोत्र हुए । पुरुहोत्र उनकी प्रिया पत्नी वैदर्भी के
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