Srishti Khanda Extracted Page 138
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-138
Sanskrit Original
तेरहवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच क्रोष्टो: श्रृणु त्वं राजेंद्र वंशमुत्तमपूरुषम् । यस्यान्ववाये संभूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वृहः ॥९॥ क्रोष्टोरेवाभवत्पुत्रो वृजिनीवान्महायशा: । तस्य पुत्रोभवत्स्वातिः कुशंकुस्तत्सुतोभवत् ॥२॥ कुशंकोरभवत्पुत्रो नाम्ना चित्ररथोस्य तु । शशबिंदुरिति ख्यातश्रक्रवर्ती बभूव ह ॥३॥ अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतस्तस्य पुरा भवत् । शशबिंदोस्तु पुत्राणां शतानामभवच्छतम् ॥४॥ धीमतां चारुरूपाणां भूरिद्रविणतेजसाम् । तेषां शतप्रधानानां पृथुसाह्णा महाबलः ॥५॥ पृथुश्रवाः पृथुयशाः पृथुतेजाः पृथृद्धवः । पृथुकीर्तिः पृथुमतो राजानः शशबिंदवः॥६॥ शंसंति च पुराणज्ञाः पृथुश्रवसमुत्तमम् । ततश्चास्याभवत्पुत्रः उशना शत्रुतापनः ॥७॥ पुत्रश्चेशनसस्तस्य शिनेयुर्नाम सत्तमः। आसीत् शिनेयोः पुत्रो यः स रुक्मकवचो मतः॥८॥ निहत्यरुक्मवचो युद्धे युद्धविशारदः। धन्विनो विविधै बणिरवाप्य पृथिवीमिमाम् ॥९॥ अश्वमेघेऽददाद्राजा ब्राह्मणेभ्यश्च दक्षिणाम्। जज्ञे तु रुक्मकवचात्परावृत्परवीरहा ॥९०॥ तत्पुत्रा जज्ञिरे पंच महावीर्यपराक्रमाः । रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः परिंघो हरिः ॥११॥ परिघं च हरिं चैव विदेहेस्थापयत्पिता। रुक्मेषुर भवद्राजा पृथुरुक्मस्तथाश्रयः ॥ १ २॥ ताभ्यांप्रव्राजितो राज्याज्ज्यामघो वसदाश्रमे । प्रशांतश्चाश्रमस्थस्तु ब्राह्मणेन विबोधितः ॥१३॥ क्रोष्टु के वंश का विस्तृत वर्णन, स्यमन्तक मणि का संक्षिप्त चरित्र, पाण्डवों की उत्पत्ति का वर्णन, कृष्ण जन्म का वर्णन, दैत्यों के उत्कर्ष के लिए शुक्राचार्य की तपस्या, ख्याति देवी का वध करने वाले विष्णु को भृगु महर्षि का शाप, जयन्ती द्वारा शुक्राचार्य की सेवा, बृहस्पति द्वारा दैत्यों का मोहन, शुक्र द्वारा दैत्यों को शाप, दैत्यों द्वारा त्रैलोक्य हरण का प्रयास पुलस्त्य महर्षि ने कहा--- राजन् ! अब तुम क्रोष्टु के उत्तम पुरुष वाले वंश का वर्णन सुनो । उसी वंश में वृष्णि वंश का उत्थान करने वाले भगवान् विष्णु का श्रीकृष्ण रूप से अवतार हुआ था ॥१॥ क्रोष्टु के पुत्र महायस्वी वृजिनीवान् हुए । वृजिनीवान् के पुत्र स्वाति हुए और उनके पुत्र कुशङ्क॒ हुए ॥२॥ कुशङ्क के पुत्र चित्ररथ हुए वे शशविन्दु के नाम से विख्यात चक्रवर्ती राजा हुए ॥३॥ इस वंश के विषय में यह श्लोक गाया गया है । शशविन्दु के दश हजार पुत्र हुए ।॥४।। वे सबके सब बुद्धिमान्, सुन्दर, बहुत अधिक सम्पत्ति तथा तेज से सम्पन्न थे । उनमें सौ प्रधान थे । उनमें भी पाँच, जिनके नाम के साथ पृथु शब्द जुड़ा हुआ है वे महाबलवान् थे ॥५॥ उनके नामथे-- पृथुश्रवा, पृथुयशा, पृथुतेजा, पृथुद्धवा तथा पृथृकीर्ति । ये शशविन्दु के वंश में पृथुशब्द से युक्त राजा हुए ॥६॥ पुराणज्ञों का कहना है कि उन सबों में पृथुश्रवा सवोत्तम थे । उसके बाद उनके पुत्र अपने शत्रुओं को सन्तप्त करने वाले उशना हुए ॥७॥ उशना के उत्तम पुत्र शिनेयु हुए । शिनेयु के पुत्र रुक्म कवच हुए ॥८॥ युद्ध करने में निपुण रुक्म कवच ने युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं का वध करके अश्वमेघ यज्ञ किया और उसमें उन्होने ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में इस पृथिवी को ही दे दिया ॥९-१०॥ रुक्मकवच के पाँच महावीर पुत्र हुए । उनके नाम है-- रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, परिघ एवं हरि ॥११॥ पिता रुक्मकवच ने परिघ तथा हरि को विदेह राज्य में स्थापित किया । उसके बाद रुवमेषु हुआ और पृथुरुक्म उसके अधीन हो गया ॥१२॥ उन दोनों ने मिलकर ज्यामब को राज्य से
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