Srishti Khanda Extracted Page 137
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-137
Sanskrit Original
यस्माद्वनं प्रदग्धं ते विश्रुतं मम हेहय । तस्मात्तेदुष्कृतं कर्म कृतमन्यो हनिष्यति ॥१३०॥ छित्वा बाहुसहस्रं ते प्रमथ्य तरसा बली । तपस्वी ब्राह्मणस्त्वां वै वधिष्यति सभार्गवः ॥१३१॥ तस्य रामोथहंतासीन्मुनिशापेन धीमतः। तस्य पुत्रशतं त्वासीत्पंच तत्र महारथाः ॥१३२॥ कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो महाबलाः । शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टो वैकृष्ण एव च ॥१३३॥ जयद्ध्वजः स वैकर्ता अवन्तिश्च रसापतिः । जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजंघो महाबलः ॥१३४॥ तस्यपुत्राश्शतान्येव तालजंघा इति स्मृताः। तेषां पंच कुलान्यासन्हैहयानां महात्मनाम्॥१३५॥ वीतिहोत्राश्च संजाता भोजाश्चावंतयस्तथा । तुंडकेराश्च विक्रांतास्तालजंघाः प्रकीर्तिताः ॥१३६॥ वीतिहोत्रसुतश्ापि अनंतो नाम वीर्यवान् । दुर्जयस्तस्य पुत्रस्तु बभूवामित्रकर्षणः ॥१३७॥ सद्भवेन महाराजः प्रजाधर्मेण पालयन्। कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रधृत् ॥१३८॥ येन सागरपर्यंता धनुषानिर्जिता मही । यस्तस्य कीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानवः ॥१३९॥ न तस्य वितनाशः स्यान्नष्टं च लभते पुनः । कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिहधीमतः ॥ यथा यष्टा यथा दाता स्वर्गलोके महीयते ॥१४०॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे यदुवंशकीर्तनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२॥ — होकर वसिष्ठ महर्षि ने शाप दिया था कि ॥१२८-१२९॥ तुमने मेरे प्रख्यात वन को जला दिया है अतएव तुम अपराधी हो तुम्हारा पाप हो तुमको मार डालेगा ॥१३०॥ तुम्हारी हजार भुजाओं को काटकर तथा तुम्हारा मंथन करके तुमसे बलवान् तपस्वी ब्राह्मण भार्गव (परशुराम) तुम्हारा वध करेंगे ॥१३१॥ ज्ञानी मुनि के शाप के कारण परशुरामजी ने सहत्तार्जुन का वध किया । सजस्रार्जुन के सौ पुत्र थे उनमें पाँच महारथी थे ॥१३२॥ महाबलवान् वे सबके सब शास्त्रा के ज्ञाता, वीर धर्मात्मा तथा महाबलवान थे । उनके नाम है शूरसेन, शूर, धृष्ट, कृष्ण ॥१३३॥ तथा ज्यध्वज । राजा जयध्वज ने ही अवन्ति को बसाया । जयध्वज के पुत्र महाबलवान् तालजंघ हुए ॥१३४॥ उनके तालजंघ के नाम से विख्यात सौ पुत्र हुए । उन हैहयों के पाँच वंश हुए ॥१३५॥ वीतिहोत्र, भोज, अवन्ति, तुण्डकेर और विक्रान्त । ये सबके सब तालजङ्घ कहलाते थे ॥१३६॥ वीतहोत्र के पुत्र पराक्रमी अनन्त हुए । अनन्त के पुत्र शत्रुओं के विनाशक दुर्जय हुए ॥१३७॥ वे महाराज सद्भाव एवं धर्मपूर्वक प्रजाओं का पालन करते थे । राजा कार्तवीर्य अर्जुन, हजार भुजाओं वाले थे ॥१३८॥ जिन्होंने अपने धनुष के बल पर समुद्र पर्यन्त पृथिवी को जीत लिया था । जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर सहस्रार्जुन का नाम लेता है, उसकी सम्पत्ति का नाश नहीं होता है और वह अपनी नष्ट सम्पत्ति को पुनः प्राप्त कर लेता है । जो व्यक्ति इस लोक में कार्तवीर्य के जन्म का वर्णन करता है वह यज्ञ करने वाले तथा दान देने वाले के समान स्वर्ग लोक में पूजित होता है ॥१४०॥ इस तरह पद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के यदुवंश वर्णन नामक बारहबें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ॥१२॥ — Oe
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