Srishti Khanda Extracted Page 136

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-136

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Sanskrit Original

यज्ैदनिस्तपोभिश्च॒ विक्रमेण श्रुतेन च। सप्तद्वीपाननुचरन् वेगेन पवनोपमः ॥११५॥ पंचाशीतिसहरस्त्राणि वर्षाणां च नराधिपः । सप्तद्वीपपृथिव्याश्च चक्रवर्ती बभूव ह ॥११६॥ स एवपशुपालो भूत्क्षेत्रपालः स एव हि । स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनो भवत् ॥११७॥ योऽसौ बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा । भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनेव भास्करः ॥११८॥ एष नाम मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः । एष वेगं समुद्रस्य प्रावृट्काले भजेत वै ॥११९॥ क्रीडते स्वसुखायैव प्रतिस्त्रोतो महीपतिः । ललनाः क्रीडता तेन प्रतिबद्धोर्मिमालिनी॥१२०॥ ऊर्भिभ्रुकुटिमाला सा शांकिताभ्येति नर्मदा । एष एव मनोर्वशे त्ववगाहेन्महार्णवम् ॥१२१॥ करेणोडूत्यवेगं तु कामिनी प्रीणनेन तु । तस्य बाहु सहस्रेण क्षोभ्यमाणे महोदधौ ॥१२२॥ भवंति लीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः । तदूरुक्षोभचकिता अमृतोत्पादशंकिताः ॥१ २३॥ नता निश्चलमूर्द्ानो भवंति च महोरगाः । एष धन्वी च चिक्षेप रावणं प्रतिसायकान् ॥१२४॥ एष धन्वी धनुर्गृह्ण उत्सिक्तं पंचभिः शरैः। लंकेशं मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात् ॥१२५॥ निर्जित्य बद्धा त्वानीय महिष्मत्याम्बबंध तम् । ततो गतोहं तस्याग्रे अर्जुनं संप्रसादयन् ॥१२६॥ मुमोच राजन् पात्रं मे सख्यं कृत्वा च पार्थिव । तस्य बाहुसहस्रस्य बभूव ज्यातलस्वनः ॥१२७॥ युगांताग्नेः प्रवृतस्य यथा ज्यातलनिः स्वनः । अहोबलं विधेवीर्य भार्गवः स यदा च्छिनत् ॥१२८॥ मृधे सहस्रं बाहूनां हेमतालवनं यथा। यं वसिष्ठस्तु संक्रुद्धो ह्यर्जुनं शप्तवान्विभुः ॥१२९॥ कार्तवीर्य की महिमा को देखकर लगता है कि कोई भी राजा कार्तवीर्य के समान नहीं होगा ॥११४।। यह राजा यज्ञं दानों, तपस्याओं तथा पराक्रम के द्वारा सातो द्वीपों में वायु के वेग के समान सञ्चरण करता है ॥११५॥ यह राजा सप्त द्वीपा पृथिवी का पच्चासी हजार वर्ष तक चक्रवर्ती राजा बना रहा ॥११६॥ वही पशुपाल, क्षेत्रपाल, वृष्टि करने वाला पर्जन्य देव तथा योगी होने के कारण अर्जुन बना रहा ॥११७॥ संग्राम में हजार बाहुओं के द्वारा ज्याघात करने के कारण कठोर त्वचा वाला यह राजा शरत् कालीन कान्तियों से युक्त सूर्य के समान सुशोभित होता है ।।११८॥ यह महिष्मती में सभी मनुष्यों से अधिक कान्तिसपत्न है । ये वर्षाकाल में समुद्र के वेग को रोक लेते थे ॥११९।। स्त्रियों के साथ क्रीडा करता हुआ वह राजा नदियों के स्रोतों के समक्ष खड़ा होकर अपने सुखानुभव के लिए उन्हे राक दता था ॥१२०॥ लहरियाँ ही जिसकी भृकुटी थी ऐसी नर्मदा नदी शंकित होकर उसके पास आती थी कि यह मनु के वंश में महा समुद्र की अवगाहन कर सकता है ॥१२१॥ अपनी पत्नियों को प्रसन्न करने के लिए जब यह अपने भुजाआ को उठाता था तो समुद्र क्षुब्ध हो जाता था । उस समय पाताल में रहने वाले असुरगण निश्चेष्ट होकर छिप जाते थे । उसकी जङ्घाओं के क्षोभ से आश्चर्यित होकर वे शंका करने लगते थे कि कहीं अमृत मंथन तो नहीं हो रहा हैं ॥१२२-१२३॥ बड़े-बड़े सर्प अपना शिर झुकाकर निश्चल हो जाते थे । यही धनुर्धारी रावण के विपरीत वाणों को चलाया था ॥१२४॥ यही धनुर्धारी धनुष धारण करके मदमत्त रावण को पाँच बाणों से उसकी सेना केसाथ रावण को मूर्छित करके उसको जीत कर तथा बाँधकर महीष्मती में लाया और उसको (रावण को) बाँध दिया। उसके बाद मैंने (पुलस्त्य महर्षि ने) उस अर्जुन के समक्ष जाकर मैने उसे प्रसन्न किया ॥१२५-१२६॥ मैंने कहा राजन् आप मेरे पौत्र को बन्धन से मुक्त कर दें और इसके साथ मित्रता कर लें । उस सहस्रबाहु की प्रत्यञ्चा की जब ध्वनि होती थी तो ॥१२७॥ वह युग के अन्त में प्रवृत अग्नि के प्रत्यञ्चा की ध्वनि के समान होती थी । भाग्य का बल आश्चर्यकारी है कि युद्ध में परशुरामजी ने सजस्त्रार्जुन की भुजाओ को तालवन के समान काट डाला । जिस सहस्रार्जुन को क्रुद्ध

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