Srishti Khanda Extracted Page 135

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-135

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Sanskrit Original

सहस्रजित्तथाज्येष्ठः क्रोष्टा नीलोञ्जिको रघुः । सहस्रजितो दायादः शतजिन्नाम पार्थिवः ॥९९॥ शतजितश्च दायादा स्त्रयः परमधार्मिकाः । हैहयश्च हयश्चैव तथातालहयश्चयः ॥९००॥ हैहयस्य तु दायादो धर्मनेत्रः प्रति श्रुतः । धर्मनेत्रस्य कुंतिस्तु संहतस्तस्य चात्मजः ॥१०१॥ संहतस्य तु दायादो महिष्मान्नाम पार्थिव: । आसीन्महिष्मतः पुत्रो भद्रसेन: प्रतापवान् ॥९० २॥ वाराणस्यामभूद्राजा कथितः पूर्वमेव हि । भद्रसेनस्य पुत्रस्तु दुर्दमो नामधार्मिकः ॥९०३॥ दुर्दमस्य सुतो भीमो धनको नामवीर्यवान् । धनकस्य सुताह्यासन् चत्वारो लोकविश्रुताः ॥९०४॥ कृताग्नि: कृतवीर्यश्च कृतधर्मा तथैव च। कृतौजाश्च त्रतुर्थोभूत्कृतवीर्याच्चसोऽर्जुनः ॥१०५॥ जातो बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरो नृपः । वर्षायुतं तपस्तेपे दुश्चरं पृथिवीपतिः ॥१०६॥ दत्तमाराधयामास कार्तवीयाँत्रिसंभवम् । तस्मै दत्तो वरान्प्रादाच्चतुरः पुरुषोत्तमः ॥१०७॥ पूर्व बाहुसहस्रं तु सवव्रे राजसत्तमः । अधर्म ध्यायमानस्य भीतिश्चापि निवारणम् ॥९०८॥ युद्धेन पृथिवी जित्वा धर्मेणावाप्य वै बलम्। संग्रामे वर्तमानस्य वधश्चैवाधिकाद्भवेत् ॥१०९॥ एतेनेयं वसुमती सप्तद्वीपा सपत्तना । सप्तोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता ॥११०॥ जज्ञे बाहुसहस्त्रं च इच्छतस्तस्य धीमतः । सर्वे यज्ञा महाबाहोस्तस्यासन्भूरिदक्षिणाः ॥१११॥ सर्वे कांचनयूपास्ते सर्वे कांचनवेदिकाः। सर्वे देवैश्च संप्राप्ता विमानस्थैरलंकृतैः॥१९२॥ गंधर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवापि सेविताः । यस्य यज्ञे जगौ गाथा गंधर्वो नारदस्तथा॥९९३॥ कार्तवीर्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः । न नूनं कार्त्तवीर्यस्य गतिं यास्यंति पार्थिवा:॥१ १४॥ वे दोनों पृथिवी के भार को उतारने के लिए तथा पाण्डवों का कल्याण करने के लिए अवतीर्ण हुए थे । यदु के देवताओं के समान पाँच पुत्र हुए ॥९८॥ सहस्रजित्, क्रोष्टा, नील, अञ्िक तथा रघु । इनमें सहस्रजित् सबसे बड़े थे । सहस्रजित् के पुत्र राजा शतजित् हुए ॥९९॥ शतजित् के तीन परम धार्मिक पुत्र हुए हैहय, हय तथा तालहय।।१००॥ हैहय का पुत्र धर्मनेत्र के नाम से विख्यात था । धर्मनेत्र के पुत्र कुन्ति हुए और कुन्ति के पुत्र संहत हुए ॥१०१॥ संहत के पुत्र राजा महिष्मान् हुए महिष्मान् के भद्रसेन प्रतापी पुत्र हुए ॥१०२॥ वे वाराणसी के राजा हुए इस बात को मैं पहले कह चुका हूँ । भद्रसेन के धार्मिक पुत्र दुर्दम हुए । दुर्दम के धनक नाम से प्रसिद्ध भीम हुए । धनक के लोक विख्यात चार पुत्र हुए ॥१०४॥ कृताग्नि, कृतवीर्य, कृतधर्मा तथ कृतौजा । कृतवीर्यं के पुत्र सहस्रार्जुन हुए ॥१०५॥ उनकी एक हजार भुजायें थी । वे सातो द्वीपों के स्वामी हुए । उन्होंने दश हजार वर्ष पर्यन्त कठोर तपस्या की ॥१०६॥ कार्तवीर्य ने महर्षि अत्रि के पुत्र दत्तात्रेय की आराधना की । उससे प्रसन्न होकर पुरुषोत्तम दत्तात्रेय ने उसे चार वरदान दिया ॥१०७॥ प्रथम वरदान में राजा ने अपनी एक हजार भुजाओं को माँगा । दूसरे वरदान में उन्होंने माँगा कि उनको अधर्म का भय न रहे ॥१०८॥ तीसरे वरदान के रूप में धर्मत: बल प्राप्त करके युद्ध में सम्पूर्ण पृथिवी पर विजय माँगा और चौथे वरदान के रूप में अपने से अधिक बलवान् के द्वारा युद्ध में मारा जाना माँगा ॥१०९॥ इस वरदान के द्वारा सहस्रार्जुन क्षात्र विधि से सात द्वीपों, तथा नगरों से युक्त सात समुद्रों से घिरी हुयी परथिवी पर विजय प्राप्त किया ॥११०॥ सहस्रार्जुन की इच्छानुसार उसकी एक हजार भुजायें हो गयीं । उन महाबाहू ने प्रभूत मात्रा में दक्षिणा देकर सभी यज्ञों को किया ॥१११॥ उनके यज्ञ के सभी स्तम्भ तथा सभी वेदियाँ सुवर्ण निर्मित थीं । वे सबके सब अलंकृत विमानों वाले देवताओ से प्राप्त हुए थे ॥११२॥ वे गन्धर्वो तथा अप्सराओ से सदैव ही सेवित थे । उस राजा के यज्ञ में गन्धर्व तथा नारदजी ने गाथा गाया था ॥११३॥ राजर्षि

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