Srishti Khanda Extracted Page 134

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-134

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Sanskrit Original

पुत्रत्वमगमततष्टस्तस्येद्रः कर्मणा ततः । दत्त्वेंद्राय पुरा राज्यं जगाम तपसे रजिः ॥८४॥ रजिपुत्रैस्दाछिन्नं बलादिंद्रस्य वै यदा । यज्ञभागश्च' राज्यं च तपोबलगुणान्वितैः ॥८५॥ राज्यभ्रष्टस्ततः शक्रो रजिपुत्रनिपीडितः। प्राह वाचस्पतिं दीनः पीडितोऽस्मि रजेः सुतैः ॥८ ६॥ न यज्ञभागो राज्यं मे पीडितस्य बृहस्पते। राज्यलाभाय मे यत्नं विधत्स्व धिषणाधिप ॥८७॥ ततोबृहस्पतिः शक्रमकरोद्दलदर्पितम् । ग्रहशांतिविधानेन पाष्टिकेन च कर्मणा ॥८८॥ गत्वाथ मोहयामास रजिपुत्रान्बृहस्पतिः । जिनधर्म समास्थाय वेदबाह्यं स॒ थर्मवित्॥८ ९॥ वेदत्रयीपरिभ्रष्टांश्चकार धिषणाधिपः । वेदवाह्यान् परिज्ञाय हेतुवादसमन्वितान् ॥९०॥ जघान शक्रो वज्रेण सवन्धिर्मबहिष्कृतान् । नहुषस्य प्रवक्ष्यामि पुत्रान्सप्तैव धार्मिकान् ॥९ ९॥ यतिर्ययातिश्शर्यातिरुत्तरःपर एव च । अयतिर्वियतिश्चैव सप्तैते वंशवर्धनाः ॥९२॥ यतिः कुमारभावेपि योगी वैखानसोऽ भवत् । ययातिरकरोद्राज्यं धर्मैकशरणः सदा ॥९ ३॥ शर्मिष्ठा तस्य भार्याभूहुहिता वृषपर्वणः । भार्गवस्यात्मजा चैव देवयानी च सुव्रता ॥९४॥ ययातेः पंचदायादास्तान्प्रवक्ष्यामि नामतः । देवयानी यदुं पुत्रं तुर्वसुं चाप्यजीजनत् ॥९५॥ तथा द्रुह्ममणं पूरु शर्मिष्ठा जनयत्सुतान् । यदुः पूरुश्च भरतस्ते वै वंशविवर्द्धनाः॥९६॥ पूरोर्वशं प्रवक्ष्यामि यत्र जातोसि पार्थिव । यदोस्तु यादवा जाता यत्र तौ बलकेशवौ ॥९७॥ भारावतारणार्थाय पांडवानां हिताय च । यदोः पुत्रा बभूवुश्च पंचदेवसुतोपमाः॥९८॥ नहीं स्वीकार किया और देवताओं ने उसे स्वीकार कर लिया ॥८१-८२॥ देवताओं ने कहा-- आप हमलोगों के स्वामी हो जायँ और शत्रुओं की सेना को नष्ट कर दें । उसके बाद वे असुर भी विनष्ट हो गये जिनको इन्द्र मार नहीं सके थे ॥८३॥ राजा रजि के कर्मो से प्रसन्न होकर इन्द्र उनके पुत्र बन गये । उसके बाद इन्द्र को राज्य प्रदान करके रजि तपस्या करने के लिए वन में चले गये ॥८४॥ तपस्या तथा बल रूपी गुण से युक्त रजि के पुत्रों ने इन्द्र से यज्ञ का भाग तथा राज्य दोनों छिन लिया तो ।।८५॥ रजि के पुत्रों से पीडित किए गये राज्यभ्रष्ट इन्द्र, दीन होकर बृहस्पति से कहे कि मुझे रजि के पुत्रों ने दुःख दिया है ॥८६॥ हे बृहस्पते ! अब न तो मेरा राज्य है और न तो यज्ञ का भाग ही मुझे मिलता है । हे देवाधिप आप ऐसा उपाय करें कि मुझे मेरा राज्य मिल जाय ॥८७॥ उसके बाद वृहस्पति ने इन्द्र को ग्रहशान्ति तथा पौष्टिक कर्मा के द्वारा बलसे युक्त बना दिया ॥८८॥ बृहस्पति ने जाकर रजि के पुत्रों को मोहित कर दिया । धर्मज्ञ बृहस्पति ने उन सबों को जैन धर्मावलम्बी बनाकर उन्हें वेदबाहय बना दिया।८९॥ बुद्धिमानों में श्रेष्ठ बृहस्पति ने रजि के पुत्रो को त्रयी धर्म से भ्रष्ट करके हेतु वादी (कुतार्किक) बना दिया, इस बात को जानकर ॥९०॥ उन समस्त धर्म बहिष्कृतों को इन्द्र ने वज्र से मार डाला । अब में यह बतलाता हूँ कि नहुष के सात ही पुत्र हुए । वे सब धार्मिक थे ॥९१॥ उन नहुष के पुत्रों के नाम थे यति, ययाति, शर्याति, उत्तर, पर, अयति तथा वियति । ये सातों वंश को बढाने वाले थे ॥९२॥ यति अपनी कुमारावस्था में वैखानस योगी हो गये । धर्म का पालन करते हुए ययाति राजा हुए ॥९३॥ ययाति को पत्नी वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा थी । उनकी दूसरी पत्नी शुक्राचार्य की पुत्री सुव्रता देवयानी थी ॥९४॥ ययाति के पाँच पुत्र हुए उनमें देवयानी ने दो पुत्रों को जन्म दिया यदु तथा तुर्वसु को; शर्मिष्ठा ने तीन पुत्रों को जन्म दिया द्रुहयु मण तथ पुरु को । उनमें यदु, पुरु तथा भरत ये तीनों तुम्हारे (भीष्मजी के) ही वंश को बढाने वाले थे ॥९६॥ हे राजन् ! अब मैं तुम जिस वंश में उत्पन्न हुए हो उस पुरु के वंश का वर्णन करूंगा । यदु के वंश में यादव हुए, जिस वंश में बलरामजी तथा भगवान् श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए॥९७॥

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