Srishti Khanda Extracted Page 132
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-132
Sanskrit Original
केशिप्रभूतयो दैत्यास्तद्धत्यत्व॑ समागताः । उर्वशी यस्य पत्नीत्वमगमद्रूपमोहिता ॥५४॥ सप्तद्वीपा वसुमती सशैलवनकानना । धर्मेण पालिता तेन सर्वलोकहितैषिणा ॥५५॥ चामरग्रहणाकीर्तिः स्वयं चैवांगवाहिका । ब्रह्मप्रसादाद्देवेंद्रो ददावर्द्धासनं तदा ॥५६॥ घर्मार्थकामाऱ्धर्मेण समवेतोभ्यपालयत् । धर्मार्थकामास्तं द्रष्टुमाजग्मुः कौतुकान्विताः ॥५७॥ जिज्ञासवस्तच्चरितं कथं पश्यति नः समम् । भक्त्या चक्रे ततस्तेषामर्ध्यपाद्यादिकं ततः ॥५८॥ आसनत्रयमानीय दिव्यं कनकभूषणम् । निवेश्याथाकरोत्पूजामीषद्धमेधिकां पुनः ॥५९॥ जग्मतुस्तौ च कामार्थावतिकोपं नृपं प्रति । अर्थः शापमदात्तस्मै लोभात्त्वन्नाशमेष्यसि ॥६०॥ कामोप्याह तवोन्मादो भविता गंधमादने। कुमारवनमाश्रि्य वियोगाच्चोर्वशीभवात् ॥६ १॥ धर्मोप्याह चिरायुस्त्वं धार्मिकश्च भविष्यसि । संततिस्तवराजेंद् यावदाचंद्रतारकम् ॥६ २॥ शतशो वृद्धिमायाति न नाशं भुवि यास्यति। षष्ठिवर्षाणि चोन्माद ऊर्वशीकामसंभवः॥६३॥ अचिरादेवभार्यापि वशमेष्यति चाप्सराः । इत्युक्त्वांतर्दधुः सर्वे राजा राज्यं तदान्वभूत् ॥६४॥ अहन्यहनि देवेद्रं द्रष्टुं याति पुरूरवाः। कदाचिदारहा रथं दक्षिणांबरचारिणा॥६५॥ सार्घं शक्रेण सोऽपश्यन्नीयमानामथांबरे । केशिनादानवेन्द्रेण चित्रलेखामथोर्वशीम् ॥६६॥ तं विनिर्जित्य समरे विविधायुधपातनैः । पुराशक्रोपि समरे येन वद्री विनिर्जितः ॥६७॥ मित्रत्वमगमत्तेन प्रादादिंद्राय चोर्वशीम् । ततःप्रभृति मित्रत्वमगमत्पाकशासनः ॥६८॥ हिमालय पर्वत के शिखर पर ब्रह्माजी की आराधना करके वह सम्पूर्ण लोकों के ऐश्वर्य को प्राप्त करके सातों द्वीपों का स्वामी हो गया ॥५३॥ केशी आदि दैत्य उसके नौकर थे । उसके रूप को देखकर मोहित हुयी उर्वशी उसकी पत्नी वन गयी ॥५४॥ सम्पूर्ण लोकों का कल्याण चाहने वाले उस राजा ने. पर्वत, कानन तथा वन से युक्त पृथिवी का धर्मपर्वक पालन किया ॥५५॥ चामर को ग्रहण करने वाली कीर्ति स्वयं उसके अड्डों की सेवा करने वाली हुयी । ब्रह्माजी की कृपा से इन्द्र ने पुरूरवा को अपना आधा आसन प्रदान किया ॥५६॥ वह धर्म, अर्थ तथा काम इन तीनों का समान रूपेण पालन करता था । एक बार कौतुक वशात् धर्म, अर्थ और काम राजा पुरुरवा को देखने के लिए आये ॥५७॥ वे यह जानना चाहते थे कि यह राजा किस प्रकार हम तीनों को समान रूप से मानता है ? राजा ने आये हुए उन तीनों को भक्ति पूर्वक अर्ध्य प्रदान किया ॥५८॥ वह तीन सुवर्ण निर्मित आसनों को लाया । वह तीनों को उन आसनों पर बैठाकर इन तीनों का पूजन किया, किन्तु धर्म की उसने थोड़ी अधिक पूजा की ॥५९॥ उसके कारण अर्थ एवं काम राजा के प्रति अत्यन्त क्रोध किए । अर्थ ने राजा को शाप दिया कि लोभ के कारण तुम्हारा नाश हो जायेगा ॥६०॥ काम ने भी कहा कि गन्धमादन पर्वत पर तुम्हें उन्माद हो जायेगा । कुमार वन में तुम्हारा उर्वशी से वियोग हो जायेगा और उसके कारण तुम उन्मत्त हो जाओगे ॥६१॥ धर्म ने आशीर्वाद दिया तुम लम्बी आयु वाले तथा धार्मिक होओगे । हे राजेन्द्र ! तुम्हारी सन्तानें तब तक बनी रहेंगी जब तक सूर्य और चन्द्रमा रहेंगे ॥६२॥ उसकी अनेक प्रकार से वृद्धि होगी उसका नाश नहीं होगा । तुम्हें उर्वशी विषयक काम के कारण साठ वर्षो तक उन्माद होगा ॥६३॥ वह अप्सरा भी शीघ्र ही तुम्हारी वशवर्तिनी भार्या हो जायेगी । यह कहकर वे तीनों अन्तर्धान हो गये और राजा पुरूरवा भी राज्य करने लगे ॥६४॥ पुरूरवा प्रतिदिन देवेन्द्र से मिलने जाते थे । एक वार रथ पर चढकर दक्षिणाम्बरचारी रथ से ॥६५॥ इन्द्र के साथ वह केशी नामक दानवेन्द्र के द्वारा चित्रलेखा तथा उर्वशी नामक अप्सरा को ले जाते हुए देखा । केशी ने पहले इन्द्र को भी पराजित कर दिया था । उस केशी
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know