Srishti Khanda Extracted Page 131

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-131

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Sanskrit Original

अकारणं किं क्षयकृज्जनानां सोमत्वयापीदमकार्यकार्यम् । यस्मात्परस्रीहरणाय सोम त्वया कृतं युद्धमतीवभीमम् ॥४०॥ पापग्रहस्त्वं भविता जनेषु पापोस्यलं वह्विमुखाशिनां त्वम् । भार्यामिमामर्पयवाक्पतेस्त्वं प्रमाणयन्नेवमदीयवाचम् ॥४९॥ तथेतिचोवाच हिमांशुमाली युद्धादपाक्रामदतः प्रशांतः । बृहस्पतिस्तामथ गृह्या तारां हृष्टो जगाम स्वगृहं च रुद्रः ॥४ २॥ पुलस्त्य उवाच ततः संवत्सरस्यांते द्वादशादित्यसन्निभः । दिव्यपीताम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः ॥४३॥ तारोदरविनिष्क्रान्तः कुमारस्सूर्यसन्निभः । सर्वार्थशा्रविद्विद्वान् हस्तिशास्त्रप्रवर््तकः ॥४४॥ नामयद्रापुत्रोयं विश्रुतो राजवैद्यकः। राज्ञः सोमस्य पुत्रत्वाद्राजपुत्रो बुधः स्मृतः ॥४५॥ जनानां तु स तेजांसि सर्वाण्येवाक्षिपद्दली। ब्रह्माद्यास्तत्र चाजम्मुर्देवादेवर्षिभिः सह ॥४६॥ बृहस्पतिगृहे सर्वे जातकमोत्सवे तदा । पप्रच्छुस्ते सुरास्तारां केन जातः कुमारकः ॥४७॥ ततः सा लज्जिता तेषां न किंचिदवदत्तदा । पुनः पुनस्तदा पृष्टा लज्जयंती वरांगना ॥४८॥ सोमस्येति चिरादाह ततो गृह्णाद्विधुः सुतम् । बुधइत्यकरोन्नाम प्रादाद्राज्यं च भूतले ॥४९॥ अभिषेकं ततः कृत्वा प्रदानमकरोद्विभुः । ग्रहमध्यं प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रहार्षिभिर्युतः ॥५०॥ पश्यतां सर्वभूतानां ततत्रैवांतरधीयत। इलोदरे च धर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत् ॥५१॥ अश्वमेधशतं साग्रमकरोद्यास्स्वतेजसा। पुरूरवा इति ख्यातः सर्वलोकनमस्कृतः ॥५२॥ हिमवच्छिखरे रम्ये समाराध्य पितामहम्। लोकैश्वर्यमगाद्राजन्सप्तद्वीपपतिस्तदा ॥५३॥ क्यों करते हो ? तुमने दूसरे की पत्नी का अपहरण करने के लिए यह अत्यन्त भयङ्कर युद्ध किया है ॥४०॥ तुम लोको में पापग्रह हो जाओगे, क्योंकि तुमने देवताओं का अपराध किया है । मेरी बात मानों बृहस्पति की इस पत्नी को लौटा दो ॥४१॥ जब सोम ने कहा कि ठीक है, तो उस समय शान्त होकर अंशुमाली (सूर्य) भी युद्ध से चले गये । बृहस्पति भी अपनी पत्नी तारा को लेकर प्रसन्नता पूर्वक अपने घर चले गये । रुद्र भी अपने स्थान पर चले गये ॥४२॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- संवत्सर के अन्त में द्वादशादित्य के समान दिव्य, पीताम्बरथारी, दिव्य अलङ्कारों से अलङ्कृत. ॥४३॥ सूर्य के समान बालक तारा के उदर से निकला । वह सभी शास्त्रों का ज्ञाता तथा हस्तिशा्र का प्रवर्तक था ॥४४॥ प्रख्यात राजवैद्य ने उसका नाम राजपुत्र रखा । राजा सोम का पुत्र होने के कारण बुध नाम का राजपुत्र हुआ ॥४५॥ वह बालक सभी लोगों के तेज को तिरस्कृत कर रहा था ब्रह्मा आदि सभी देवता देवर्षियों के साथ; जब उस बालक का जातकर्म संस्कार हो रहा था तो बृहस्पति के घर आये । उन लोगों ने तारा से पूछा कि यह किसका पुत्र है ?॥४६-४७।। उस समय लज्जित होने के कारण उन लोगों के बार-बार पूछने पर भी वह नहीं बोली ॥४८॥ बहुत देर के बाद तारा ने कहा यह सोम का पुत्र है, अतएव उसको चन्द्रमा ने ले लिया और उसका बुध नाम रखकर उन्होंने उसे पृथिवी का राज्य दे दिया ॥४९॥ चन्द्रमा ने उसका अभिषेक करके पृथिवी का राज्य दे दिया और ब्रह्माजी ने उसे ग्रहों के बीच एक ग्रह बना दिया ॥५०॥ उसके बाद ब्रह्माजी सबों के देखते-ही- देखते वहाँ से अन्तर्धान हो गये । बुध ने इला के गर्भ से एक धार्मिक पुत्र को पैदा किया ॥५१॥ वह सभी लोगों से नमस्कृत था । उसका नाम पुरूरवा हुआ । उसने सौ से भी अधिक अश्वमेध यागो को सम्पन्न किया ॥५२॥

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