Srishti Khanda Extracted Page 130
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-130
Sanskrit Original
ततः सशिष्यो गिरिशः पिनाकी ब्रृहस्पतेः स्नेहवशानुबद्ध: । धनुर्गृहित्वाऽजगवं पुरारिर्जगाम भूतेश्वरसिब्धजुष्टः ॥३९॥ युद्धायसोमेन विशेषदीप्तस्तृतीयनेत्रानलभीमवक्त्रः । सहैव जग्मुश्च गणेश्वराणां विशाधिकाषष्ठिरथोग्रमूर्तिः ॥३ २॥ यक्षेश्वराणां सगणैरनेकैर्युतोन्वगात्स्यंदनसंस्थितानाम् । वेतालयक्षोरगकिन्नराणां पद्मेन चैकेन तथार्बुदानाम् ॥३३॥ लक्षैस्त्रिभिद्ददशभीरथानां सोमोप्यगात्तत्र विवृद्धमन्युः । शनैश्चरांगारकवृद्धतेजा नक्षत्रदैत्यासुरसैन्ययुक्तः ॥३४॥ जम्मुर्भयंसप्ततथैव लोका धरावनद्वीपसमुद्रगर्भाः । स सोममेवाभ्यगमत्पिनाकी गृहीतदीप्तास्त्रविशालवह्विः॥ ३ ५॥ अथाभवद्Vरीषणभीमसोमसैन्यद्टयस्याथमहाहवोसौ । अशेषसत्वक्षयकृत्प्रवृद्धस्ती क्ष्णप्रधानोज्चलनैकरूपः ॥३६॥ शस्त्रैर थान्योन्यमशेषसैन्यं द्रयोर्जगामक्षयमुग्नतीक्ष्णैः । पतंति शस्त्राणि तथोज्चलानि स्वर्भूमिपातालमलं दहान्ति ॥३७॥ रुद्रः क्रोधाद्ृह्यशिरो मुमोच सोमोपिसोमास्त्रममोधवीर्यम् । तयोर्निपातेन समुद्रभूम्योर थान्तरिक्षस्य च भीतिरासीत् ॥३८॥ तदासुयुद्धं जगतां क्षयाय प्रवृद्दमालोक्यपितामहोपि । तत:प्रविश्याथ कथंचिदेव निवारयामाससुरैः सहैव ॥३९॥ किया । पृथिवी पर शङ्करजी के चरण कमलों की पूजा अनेक रुद्र करते हैं ॥३०॥ उसके बाद बृहस्पति के स्नेह से आबद्ध होकर शङ्करजी अपने अजगव नामक धनुष को धारण करके अपने गणों के साथ चन्द्रमा के पास गये।।३ १॥ उस समय उनके तीसरे नेत्र की अग्नि प्रकाशित हो रही थी । वे चन्द्रमा के साथ युद्ध करने के लिए गये थे । उनका मुख भयङ्कर हो गया था । उनके साथ अस्सी उग्र मूर्ति गणेश्वर भी गये थे ॥३२॥ रथों पर बैठकर उनके साथ अनेक क्षेत्र भी गये थे । उस सेना में एक पद्म अर्बुद की संख्या में वेताल, यक्ष, सर्प तथा किन्नर थे ॥३३॥ क्रुद्ध होकर चन्द्रमा भी छत्तीस लाख रथियों के साथ वहाँ युद्ध करने के लिए आ गरें । शनिश्चर तथा भौम के द्वारा जिनका तेज वढा हुआ था, ऐसा ताराओं तथा असुरों की सेना चन्द्रमा के साथ थी ॥३४॥ उस समय सातो लोक तथा वन, द्वीप तथा समुद्रों से युक्त पृथिवी भयभीत हो गयी । देदीप्यमान असतों तथा विशाल नेत्राग्नि से युक्त शङ्करजी चन्द्रमा से युद्ध करने लगे ॥३५॥ उस समय चन्द्रमा तथा शङ्करजी की सेना के बीच भयङ्कर युद्ध हुआ. । सम्पूर्ण जीवों को विनष्ट कर देने वाला तीक्ष्ण अग्नि स्वरूप वह युद्ध हो रहा था ॥३६॥ दोनों ओर के तीक्ष्ण शस्त्रो के द्वारा सेना क्षीण हो गयी । उस समय स्वर्ग, भूमि तथा पाताल को जलाते हुए शस्रपात हो रहे थे ॥३७॥ रुद्र ने क्रुद्ध होकर ब्रह्मशिरः अस्त्र का प्रयोग किया तो चन्द्रमा ने भी अपने अमोघ पराक्रम सम्पन्न सोमास्र का प्रयोग किया । उन दोनों के प्रयोग से समुद्र, पृथिवी तथा अन्तरिक्ष के विनष्ट होने का खतरा उपस्थित हो गया ॥३८॥ उस समय संसार को विनष्ट करने वाले युद्ध को बढे हुए देखकर ब्रह्माजी वहाँ पर आकर किसी तरह देवताओं और असुरों को युद्ध करने से रोके ॥३९॥ उन्होंने कहा-- सोम तुम भी बिना किसी कारण के ही लोगों को विनष्ट करने वाले इस अकार्य को
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