Srishti Khanda Extracted Page 129

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-129

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

श्रोपद्ामहापुराण होतात्रिर्भगुरध्वर्युरुद्धाता च चतुर्मुख: । ब्रह्मत्वमगमत्तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम् ॥२०॥ सदस्याः सर्वदेवास्तु राजसूयविधिः स्मृतः । वसवोध्वर्यवस्तदवद्विश्वेदेवास्तथैव च ॥२९॥ त्रैलोक्यं दक्षिणा तेन ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादिता। सोमः प्राप्याथदुष्प्राप्यमैश्वर्यं सृष्टिसत्कृतम् ॥२२॥ सप्तलोकैकनाथत्वं प्राप्तस्स्वतपसा तदा । कदाचिदुद्यानगतामपश्यदनेकपुष्पाभरणोपशोभाम् ॥२३॥ बृहन्नितंबस्तनभार खेदां पुष्पावभंगेप्यतिदुर्बलांगीम्। भार्या च तां देवगुरोरनंगबाणभिरामायतचारुनेत्राम् ॥२४॥ तारां स ताराधिपतिः स्मरार्तः केशेषु जग्राह विविक्त भूमौ । सापि स्मरार्ता सह तेन रेमे तद्रूपकांत्या हतमानसैव ॥२५॥ चिरं विहृत्याथ जगाम तारां विधुर्गृहीत्वा स्वगृहं ततोपि । न तृप्तिरासीत्स्वगृहेपि तस्य तारानुरक्तस्य सुखागमेषु ॥२६॥ बृहस्पतिस्तद्विरहाम्निदग्धस्त्याननिष्ठैकमना बभूव । शशाक शापं न च दातुमस्मै न मंत्रशस्त्राग्रिविषैरनेकैः ॥ २७॥ तस्यापकर्तु विविधैरुपायैरनैवाभिचारैरपि वागधीशः । स याचयामास तस्तुदेवं सोमं स्वभार्यार्थमनंगतप्तः ॥२८॥ स याच्यमानोपि ददौ न भार्या बृहस्पतेः कामवशेन मोहितः । महेश्वरेणाथ. चतुर्मुखेन साध्यैर्मरुद्धः सहलोकपालैः ॥२९॥ ददौ यदा तां न कथंचिदिंदुस्तदाशिवः क्रोधपरो बभूव । यो वामदेवः प्रथितः पृथिव्यामनेकरुद्रार्चितपादपद्मः ॥३०॥ शङ्करजी रहें । भगवान् विष्णु के तथास्तु कहने पर चन्द्रमा ने राजसूय यज्ञ प्रारम्भ किया ॥१९॥ उस यज्ञ में होता महर्षि अत्रि थे, ' भृगु महर्षि अध्वर्यु हुए तथा ब्रह्माजी उद्गाता हुए । स्वयं भगवान् श्रीहरि उपद्रष्टा रूप से ब्रह्म हुए॥२०॥ उस राजसूय यज्ञ में सभी देवता सदस्य हुए । उस यज्ञ में वसुगण तथा विश्वेदेव अध्वर्युगण हुए ॥२१॥ चन्द्रमा ने ऋत्विजों को दक्षिणा में त्रैलोक्य को ही प्रदान कर दिया । उसके कारण सम्पूर्ण समादृत ऐश्वर्य को चन्द्रमा ने प्राप्त किया ॥२२॥ उस समय चन्द्रमा ने तपस्या के बल से सातो लोकों के अकण्टक स्वामित्व को प्राप्त कर लिया । एक बार चन्द्रमा ने उद्यान में गयी हुयी, अनेक प्रकार के पुष्पों के अलङ्कारों से अलङ्कृत शोभा सम्पन्न, विस्तृत नितम्ब तथा स्तनों के भार से खिन्न, पुष्पों से अलङ्कृत होने पर भी दुर्बल आङ्गो वाली बृहस्पति की सुन्दर े त्रों वाली पत्नी तारा को देखा और वह कामार्त होकर एकान्त स्थान में उसके केशों को पकड़ लिया । तारा भी चन्द्रमा के रूप और कान्ति को देखकर कामार्त हो गयी और उसके साथ उसने रमण किया ॥२३-२५॥ दीर्घ काल तक रमण करने के बाद चन्द्रमा तारा को लेकर अपने घर गये । अपने घर जाकर भी तारा में अनुरक्त मन वाले चन्द्रमा की तृप्ति नहीं हुयी ॥२६॥ बृहस्पति तारा की विरहाग्नि से संतप्त होकर, निरन्तर तारा की चिन्ता करने लगे। किन्तु वे चन्द्रमा को शाप देने में समर्थ नहीं हो सके, वे अनेक प्रकार के मन्त्र, शस्त्र तथा अग्नियों एवं अनेक प्रकार के उपायों एवं अभिचार कर्मो के द्वारा भी चन्द्रमा का अपकार करने में समर्थ नहीं हुए । अन्त में काम सन्तप्त बृहस्पति चन्द्रमा के पास जाकर तारा की याचना किए ॥२७-२८॥ किन्तु बृहस्पति के द्वारा याचना किए जाने पर भी काम परवश चन्द्रमा ने तारा को नहीं लौटाया । उसके बाद शङ्करजी, ब्रह्माजी, साध्य गण तथा लोकपालों एवं मरुद्गण के द्वारा प्रार्थना किए जाने पर भी ॥२९॥ जब चन्द्रमा ने तारा को नहीं दिया तो उस समय शङ्करजी ने कोप

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know