Srishti Khanda Extracted Page 128

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-128

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Sanskrit Original

शान्ति कृत्वात्ममनसा तदत्रि: संयमे स्थितः । माहात्म्यं तपसो वापि परमानंदकारकम् ॥४॥ यस्माद्दंशपतिः सार्द्ध समये तदथिष्ठित: । तं दृष्ट्वा चष्टसोमेन तस्मात्सोमोभवद्विभुः ॥५॥ अथ सुस्राव नेत्राभ्यां जलं तत्रात्रिसंभवम्। द्योतयद्विश्वमखिलं ज्योत्स्नया सचराचरम् ॥६॥ तहिशोजगृहुस्तत्र सत्रीरूपेणसहच्छया: । गर्भो भूत्वोदरेतासां स्थितः सोप्यत्रिसंभव: ॥७॥ आशाश्च॒ मुमुचुर्गर्भभशक्ता धारणे ततः । समादायाथ तं गर्भमेकीकृत्य चतुर्मुखः ॥८॥ युवानमकरोद्वह्मा सर्वायुधधरं नरम् । स्यंदनेथ सह स्तेन वेदशक्तिमये प्रभुः ॥९॥ आरोप्य लोकमनयदात्मीयं स पितामहः । ततो ब्रह्मर्षिभिः प्रोक्तं ह्यास्मत्स्वामीभवत्वयम् ॥१०॥ ऋषिभिदेंवगंधर्वैरप्सरोभिस्तथैव च। स्तूयमानस्य तस्याभूदधिकं महदंतरम् ॥११॥ तेजोवितानादभवद्धवि दिव्यौषधीगणः । तहीप्तिरधिका तस्माद्रात्रौ भवति सर्वदा ॥९२॥ तेनौषधीशः सोमोऽ भूदिह्जेष्वपि हिगण्यते । वेदधामा रसश्चायं यदिदं मंडलं शुभम् ॥१३॥ क्षीयते वर्धते चैव शुक्ले कृष्णे च सर्वदा। विंशतिं च तथा सप्त दक्षः प्राचेतसो ददौ ॥९४॥ रूपलावण्यसंयुक्तास्तस्मै कन्याः सुवर्चसः। ततः शक्तिसहस्राणां सहस्राणि दशैव तु ॥१५॥ तपश्चकार शीतांशुर्विष्णुध्यानैकतत्परः। ततस्तुष्टश्च भगवांस्तस्मै नारायणो हरिः ॥१६॥ वरं वृणीष्व चोवाच परमात्मा जनार्दनः । ततो वव्रे वरं सोमः शक्रलोके यजाम्यहम् ॥१७॥ प्रत्यक्षमेव भोक्तारो भवंतु मम मंदिरे । राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्या ये चतुर्विधाः ॥१८॥ रक्षपालः सुरोस्माकमास्तांशूलधरो हरः । तथेत्युक्तः समाजह्ले राजसूयं तु विष्णुना ॥१९॥ मन से शान्ति प्राप्त किये, उसी तप को अत्रि महर्षि करने लगे । उस महातप का माहात्म्य भी परमानन्द प्रदान करने वाला हैं ॥२-४॥ चूँकि यह वंश वंशपति के साथ सोम से अधिष्ठित, हुआ अतएव वह सोम कहलाया उसके वाद महर्षि अत्रि के दोनों नेत्रों से जल निकला । वह जल सम्पूर्ण चराचर को अपनी कान्ति से प्रकाशित कर रहा था ॥५-६॥ उसको दिशाओं ने स्त्री रूप से गर्भ रूप में धारण कर लिया । वह अत्रि मुनि से उत्पन्न जल दिशाओं के उदर में गर्भ रूप से स्थित हो गया ॥७॥ उस गर्भ को धारण करने में असमर्थ होकर दिशाओं ने उसका त्याग कर दिया । उस गर्भ को ब्रह्माजी ने एकत्रित कर दिया ॥८॥ और उसको युवक बना दिया । वह सभी आयुधों को धारण करने वाला मनुष्य हो गया । उसके बाद वेदशक्ति से युक्त रथ पर ॥९॥ बैठाकर ब्रह्माजी उसे अपने साथ लाये । उसके बाद ब्रह्मर्षियों ने कहा यह हमारा स्वामी है । उसी तरह ऋषियों, देवताओं, गन्धर्वो तथा अप्सराओं ने उस युवक को अपना स्वामी माना । स्तुति किए जाने वाले उस युवक में महान् अन्तर हो गया ॥१०-११॥ उसके तेज के प्रकाश से प्रथिवी पर दिव्य औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं । उसके कारण उसकी कान्ति रात्रि में अधिक होती है ॥१२॥ उसके कारण वह सोम (चन्द्रमा) औषधियों तथा द्विजं (ब्राह्मणों) का स्वामी माना जाता है । उसका मण्डल (चन्द्रमण्डल) वेद की कान्ति का रस (सार) है ॥१३॥ वह सदा कृष्ण पक्ष में क्षीण होता है तथा शुक्ल पक्ष में बढता है । दक्ष ने अपनी सत्ताइस कन्याओं का विवाह चन्द्रमा से कर दिया ॥१४॥ दक्ष की वे सारी कन्यायें, रूप, लावण्य तथा कान्ति से सम्पन्न थीं ॥१५॥ उसके बाद चन्द्रमा ने हजारों हजार वर्ष तक भगवान् विष्णु के ध्यान में मग्न रहकर तपस्या की । उससे प्रसन्न होकर भगवान् श्रीहरि प्रकट होकर चन्द्रमा को वरदान माँगने के लिए कहे । उसके बाद चन्द्रमा ने वरदान माँगा कि मैं इन्द्र लोक में यज्ञ करने वाला होऊं ॥१६-१७॥ मेरे उस राजसूय यज्ञ में ब्रह्मा आदि जो चारो प्रकार के देवता हैं वे मेरे यहाँ प्रकट रहकर यज्ञ के भाग के भोक्ता बनें ॥१८॥ उस यज्ञ के रक्षक शूलपाणि

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