Srishti Khanda Extracted Page 126
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-126
Sanskrit Original
सर्वात्मना सुरुचिना महाचलमहानदी। ये तु पश्यंति तां गत्वा मानसे दक्षिणोत्तरे ॥७८॥ प्रणम्य द्विजमुख्येभ्यः प्राप्तं तैर्जन्मनः फलम्। यद्यदिच्छति वैमर्त्यस्तत्तदाप्नोत्यसंशयम् ॥७९॥ एष तूद्देशतः प्रोक्तस्तीर्थानां संग्रहो मया। वागीशोपि न शक्रोति विस्तरात्किमुमानुषः ॥८०॥ सत्यंतीर्थं॑ दयातीर्थ तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः। वर्णाश्रमाणां गेहेपि तीर्थं शम उदाहृतम् ॥८ १॥ येषु तीर्थेषु यच्छाद्धं तत्कोटिगुणमिष्यते। गयायां यत्तुवै श्राद्धं तच्छाद्धमपवर्गदम् ॥८ २॥ यस्मात्तस्मात्प्रयत्मेन तीर्थे श्राद्धं विधीयते । प्रातःकाले मुहूर्तात्रीन्संगवस्तावदेव तु ॥८३॥ मध्याह्ृस्निमुहूर्तः स्यादपराहूस्ततः परम् । सायाह्वस्तरमुहूर्तः स्याच्छाद्धं तत्र न कारयेत् ॥८ ४॥ राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु। अह्णो मुहूर्ताव्याख्याता दशपंच च सर्वदा॥८५॥ तत्राष्टमो मुहूर्तो 4: सकाल: कुतपः स्मृतः । मध्याह्वात्सर्वदा यस्मान्मंदी भवति भास्करः ॥८६॥ तस्मादनंतफलदस्तत्रारं भो विशिष्यते । खड्गपात्रं च कुतपस्तथानैपाल कंबलम् ॥८७॥ रुक्मं दर्भास्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमः स्मृतः । पापं कुत्सितमित्याहुस्तस्य तत्तापकारिणः ॥८८॥ अष्टवेते यतस्तस्मात्कुतपा इति विश्रुताः । ऊर्ध्व मुहुत्तत्कुतपान्महूर्त च चतुष्टयम् ॥८९॥ मुहूर्त पचकं चैव स्वधावाचनमिष्यते । विष्णुदेहसमुद्धूताः कुशाः कृष्णतिलास्तथा ॥९०॥ श्राद्धस्य लक्षणं कालमिति प्राहुर्मनीषिणः । तिलोदकांजलिर्देयो जलांते तीर्थवासिभिः ॥९९॥ करने से पितृगण मुक्त हो जाते हैं ॥७६॥ कुछ महर्षि अन्न दान करने को श्रेष्ठ वतलाते हैं, दूसरे धन दान करने को श्रेष्ठ वतलाते है । किन्तु महर्षिगण गया तीर्थ में मनुष्यों द्वारा किया गया पिण्डदान सबसे श्रेष्ठ बतलाते है।७७॥ जो लोग पूर्णरूप से रुचिपूर्वक मानसरोवर के दक्षिण एवं उत्तर तट पर जाकर महाचल तथा महानदी का दर्शन करते हैं॥७८॥ तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को प्रणाम करते हैं, वे जन्म का फल प्राप्त कर लेते हैं । ऐसा कहने वाला मनुष्य जो कुछ भी चाहता है, वह वही प्राप्त कर लेता है ॥७९॥ इसतरह से मैंने (सूतजी) ने संक्षेप में तीर्थो का वर्णन किया। विस्तार पूर्वक तो सभी तीर्थो का वर्णन वृहस्पतिजी भी नहीं कर सकते हैं, मनुष्यों की क्या बात है?॥८ ०॥ सत्य तीर्थ, दयातीर्थ है, इन्द्रियों का निग्रह भी तीर्थ है अपने घर में रहकर शम का पालन करते हुए अपने वर्ण एवं आश्रम धर्मो का अनुष्ठान भी तीर्थ कहा गया है ॥८१॥ जिस तीर्थ में जो श्राद्ध वतलाया गया है, उसके करोड़ गुणा फल गया श्राद्ध का होता है । गया में किया गया श्राद्ध मोक्ष प्रदान करने वाला होता है ॥८ २॥ अतएव तीर्थो में श्राद्ध का विधान किया गया है । सबेरे तीन मुहुर्त का प्रातःकाल होता है । तीन ही मुहूर्त का संगव होता है । उसके वाद तीन मुहूर्त का मध्याह्न होता है । उसके बाद तीन मुहूर्त का अपराहण होता है । उसके बाद तीन मुहुर्त का सायंकाल होता है । सायाह्न काल में श्राद्ध नहीं करना चाहिए ॥८४॥ यह बेला राक्षसी बेला होती है। वह सभी कमों के लिए निन्दित होती है । दिन के पन्द्रह मुहूर्त बतलाये गये हैं ॥८५॥ उनमें जो दोपहर के बाद आठवाँ मुहूर्त होता है, उसकाल को कुतप कहते हैं । चूकि मध्याह्न के बाद सूर्य मन्द होने लगते हैं ॥८६॥ उसी बेला में प्रारम्भ किया जाने वाला श्राद्ध अनन्त फल प्रदान करने वाला है । खड्गपात्र, कुतप, नेपाल में बना हुआ कम्बल ॥८७॥ सुवर्ण, कुश, तिल, गौ तथा आठवाँ दौहित्र (पुत्री का पुत्र) ये आठो पापों को सन्तप्त करने वाले हैं॥८८॥ इसीलिए इन आठों को कुतप कहा जाता है । कुतप मुहूर्त के बाद चार मुहूर्त तक ॥८९॥ ये पाँच मुहूर्त स्वधावाचन श्राद्ध के समय बतलाये गये हैं । कुश तथा काले तिल ये भगवान् विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुए हैं ॥९०॥ मनीषियों ने यही श्राद्ध का लक्षण और काल बतलाया है । तीर्थ में निवास करने वालों को जल में प्रवेश करके तिलाञ्जलि देनी चाहिए ॥९१॥
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know