Srishti Khanda Extracted Page 125

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-125

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Sanskrit Original

कीकटेषु गया पुण्या पुण्यं राजगृहं वनम् । च्यवनस्याश्रमं पुण्यं नदी पुण्या पुनःपुना ॥६४॥ विषयाराधनं पुण्यं नदी या तु पुनः पुना। यत्र गाथा विचरति ब्रह्मणा परिकीर्तिता ॥६५॥ एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोपि गयां ब्रजेत् । यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥६६॥ एषा गाथा विचरति तीर्थेष्वायतनेषु च । सर्वे मनुष्या राजेंद्र कीर्तयंतः समागताः ॥६७॥ किमस्माकं कुले काश्चिह्यां यास्यति यः सुतः । प्रीणयिष्यति तान् गत्वा सप्तपूर्वास्तथापरान् ॥६८॥ मातामहानामप्येवं श्रुतिरेषा चिरंतनी । गंगायामस्थिनिचयं गत्वा क्षेप्स्यति यः सुतः ॥६९॥ तिलैः सप्ताष्टभिर्वापि दास्यते च जलांजलिम् । अरण्यत्रितयं वापि पिंडदानं करिष्यति ॥७०॥ प्रथमं पुष्करारण्ये नैमिषे तदनंतरं। धर्मारण्यं पुनः प्राप्य श्राद्धं भक्तद्या प्रदास्यति ॥७९॥ गयायां धर्मपृष्ठे वा सरसि ब्रह्मणस्तथा । गयाशीर्षवटे चैव पितृणां दत्तमक्षयम् ॥७२॥ ब्रजन्कृत्वा निवापं यस्त्वध्वानं परिसर्पति । नरकस्थान्पितृन्सोपि स्वर्गं नयति सत्वरम् ॥७३॥ कुले तस्य न राजेंद्र प्रेतो भवति कक्चन। प्रेतत्वं मोक्षभावं च पिंडदानाच्च गच्छति ॥७४॥ एको मुनिस्ताम्रकराग्रहस्त ह्याग्रेषु मूले सलिलं ददाति । आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च |तृप्ता एका क्रियाङ्ष्यर्थकरी प्रसिद्धा ॥७५॥ गयायां पिण्डदानस्य नान्यद्दानं विशिष्यते । एकेन पिंडदानेन तृप्तास्ते मोक्षगामिनः ॥७६॥ धान्यप्रदानं प्रवरं वदंति वसुप्रदानं च तथा मुनीद्राः। गयासुतीर्थेषु नरैः प्रदत्तं तद्ध्महितुं प्रवरं वदन्ति॥७७॥ 0. य क न प तीर्थो का स्वामी सप्तगोदावरी तीर्थ । श्राद्ध का अनन्त फल प्राप्त करना चाहने वालों को इन स्थानों में श्राद्ध करना चाहिए ।।६३।। कीकट प्रदेश में गया तीर्थ पवित्र है तथा राजगृह नामक वन पवित्र है, वहाँ का च्यवनाश्रम पवित्र है तथा पुनः पुना (पुन-पुन) नदी पवित्र है ॥६४।। विषयाराधन तीर्थ में विद्यमान पुन-पुन नदी पवित्र है । जहाँ पर ब्रह्माजी द्वारा गायी गयी गाथा विचरण करती है ॥६५॥ एष्टव्या० इत्यादि गृहस्थों को अनेक पुत्रों को प्राप्त करने की कामना इसलिए करना चाहिए कि हो सकता है कि उन सबों में से कोई अपने पिता का श्राद्ध करने के लिए गया जाय, अथवा अश्वमेघ याग करे, अथवा पिता के नाम पर काला सांड छोड़े ॥६६॥ यह गाथा सभी तीर्थो तथा सभी गृहों में विचरण करती है । हे राजेन्द्र ! एक बार सभी मनुष्य यह गाते हुए गया में आये ॥६७॥। क्या हमारे कुल का कोई पुत्र गया जायेगा ? वहाँ जाकर क्या वह अपने से सात पीढी पहले के तथा सात पीढी बाद के होने वाले जीवों को तृप्त करेगा ?॥६८॥ मातामह (नाना) आदि के भी विषय में यही प्राचीन गाथा है कि क्या कोई हमारे वंश का पुत्र गया तीर्थ में जाकर हमारी अस्थियों को वहाँ डालेगा 2॥६९॥ क्या वह सात आठ तिलों से भी हमें वहाँ जलाज्ञलि प्रदान करेगा । अथवा तीन अरण्यों में जाकर पिण्डदान करेगा 2॥७०॥ क्या वह पहले पुष्कर अरण्य में, उसके बाद नैमिषारण्य में तथा उसके बाद धर्मारण्य में जाकर भक्तिपूर्वक श्राद्ध करेगा 2॥७१॥ गया के धर्मपृष्ठ पर या ब्रह्मसरोवर पर अथवा गयाशीर्ष वट में पितरों के लिए किया गया दान अक्षय होता है ॥७२॥ जो व्यक्ति घर पर श्राद्ध करके गया के लिए मार्ग में जाते समय ही, वह शीघ्र ही नरक में भी विद्यमान पितरों को स्वर्ग में पहुँचा देता है ॥७३॥ हे राजेन्द्र ! उसके वंश में कोई प्रेत नहीं होता है और जो प्रेत हुए रहते है, वे पिण्डदान करने से मुक्त हो जाते है ॥७४॥ गया में एक मुनि थे वे अपने हाथ में कलश तथा कुश लेकर, आम की जड़ में तर्पण किया करते थे, उससे आम भी सींच जाते थे और पितृगण भी तृप्त हो जाते थे । इसतरह से एक ही क्रिया से दो प्रयोजनों की सिद्धि होती थी ॥७५॥ गया में जाकर पिण्डदान करने से बढ़कर कोई भी दान नहीं है । गया में एक ही पिण्डदान

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