Srishti Khanda Extracted Page 124

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-124

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

तथैव पंचतीर्थ च यत्र गोदावरी नदी । युतालिंगसहस्रेण सव्येतरजलावहा ॥४७॥ जामदग्न्यस्य तत्तीर्थं मोदायतनमुत्तमम्। प्रतीकस्य भयात्सिद्धा यत्र गोदावरी नदी ॥४८॥ तीर्थं तद्धव्यकव्यानामप्सरोगणसंयुतम् । श्राद्धाप्रिदानकार्यं च तत्र कोटिशताधिकम्॥४९॥ तथासहस्रलिंगं च राघवेश्वरमुत्तमम् । सेद्रकाला नदी पुण्या तत्रशक्रोगतः पुरा॥५०॥ निहत्य नमुचिं मित्रं तपसा स्वर्गमाप्तवान् । तत्र दत्तं नरैः आआद्धमनंतफलदं भवेत् ॥५१॥ पुष्करं नाम वै तीर्थ शालग्रामं तथैव च । शोणपातश्च विख्यातो यत्र वैश्वानराशयः ॥५२॥ तीर्थ सारस्वतं चैव स्वामितीर्थं तथैव च। मलंदरा नदी पुण्या कौशिकी चंद्रका तथा ॥५३॥ विदर्भा चाथवेगा च पयोष्णी प्राइमुखा परा। कावेरी चोत्तरांगा च तथा जालंधरो गिरिः ॥५४॥ एतेषु श्राद्धतीर्थेषु श्राद्धमानंत्यमश्नुते । लोहदंडं तथातीर्थं चित्रकूटस्तथैव च ॥५५॥ दिव्यं सर्वत्र गंगायास्तथानद्यास्तटं शुभम् । कुब्जाम्रकं तथातीर्थमूर्वशीपुलिनं तथा॥५६॥ संसारमोचनंतीर्थ तथैव ऋणमोचनम् । एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानंत्यमश्नुते॥५७॥ अट्टहासं तथा तीर्थ गौतमेश्वरमेव च। तथावसिष्ठतीर्थं च भारतं च ततः परम् ॥५८॥ ब्रह्मावर्त कुशावर्त हंसतीर्थं तथैव च। पिंडारकं च विख्यातं शंखोद्धारं तथैव च॥५९॥ भाडेश्वरं बिल्वकं च नीलपर्वतमेव च ।तथा च बदरीतीर्थ सर्वतीर्थेश्वरेश्वरम्॥६०॥ वसुधाराह्वयं तीर्थ रामतीर्थं तथैव च। जयंती विजया चैव शुक्लतीर्थं तथैव च ॥६९॥ एषु श्राद्धप्रदातारः प्रयांति परमं पदम् । तीर्थ मातृगृहं नाम करवीरपुरं तथा ॥६२॥ सप्तगोदावरीनाम सर्वतीर्थेश्वरेश्वरम् । तत्र श्राद्धं प्रदातव्यमनंतफलमीप्सुभिः ॥६ ३॥ बहुदा नदी, सिद्धवट नामक पवित्र तीर्थ ॥४५॥ पाशुपततीर्थ तथा पर्यटिका नदी, इन सबों में किया गया श्राद्ध तथा दान सौ करोड़ गुणा से भी अधिक पुण्यप्रद होता है ॥४६।। वह पञ्च तीर्थ जहाँ पर गोदावरी नदी दक्षिणावर्त प्रवाहित होती है । वह नदी हजार लिङ्गों से युक्त है ॥४७॥ परशुरामजी का वह तीर्थ सर्वोत्तम आनन्दप्रद है । वहाँ पर गोदावरी नदी प्रतीक के भय से सदा प्रवाहित होती रहती है ॥४८।। अप्सराओं के समूह से युक्त हव्य-कव्य तीर्थ में किया गया श्राद्ध तथा अग्निदान कार्य सौ करोड़ गुणा से भी अधिक फल देने वाला होता है ॥४९॥ उसी तरह सहस्रलिङ्ग तीर्थ, उत्तम राघवेश्वर तीर्थ, पवित्र इन्द्रकला नदी जहाँ पर प्राचीन काल में जाकर ॥५०॥ इन्द्र अपने मित्र नमुचि को मार कर स्वर्ग का राज्य प्राप्त किए । वहाँ मनुष्यों द्वारा किए गये श्राद्ध का अनन्त फल होता है ॥५१॥ पुष्कर तीर्थ, शालग्राम तीर्थ, शोणापत (सोनपत) नामक तीर्थ जहाँ पर वैश्ववानराशय तीर्थ है ॥५२॥ सारस्वत तीर्थ, स्वामी तीर्थ, पवित्र मलंदरा नदी, कौशिकी नदी, चन्द्रिका नदी ॥५३॥ विदर्भा नदी, वेगानदी, पयोष्णी नदी, प्राइमुखा नदी, कावेरी नदी, उत्तराङ्गा नदी, जालंधर पर्वत ॥५४॥ इन सभी श्राद्ध तीर्थो में किये गये श्राद्ध का अनन्त फल होता है । लोहदण्ड तीर्थ, चित्रकूट तीर्थ ॥५५॥ तथा सर्वत्र गङ्गा का मङ्गलमय तट, कुब्जाम्रक तीर्थ, उर्वशी पुलिन तीर्थ ॥५६॥ संसार मोचन तीर्थ तथा ऋणमोचन तीर्थ, इन पितृतीर्थों में किए गये श्राद्ध का अनन्त गुना फल होता है ॥५७॥ अट्टहास तीर्थ, गौतमेश्वर तीर्थ, वसिष्ठ तीर्थ, भारत तीर्थ ॥५८॥ ब्रह्मावर्त तीर्थ, कुशावर्त तीर्थ, तथा हंस तीर्थ, विख्यात पिण्डारक तीर्थ, शंखोद्धार तीर्थ ॥५९॥ भाण्डेश्वर तीर्थ, विल्वक तीर्थ, नीलगिरि, सभी तीर्थो का स्वामी बदरिकाश्रम तीर्थ ॥६०॥ वसुंधारा नामक तीर्थ तथा रामतीर्थ, जयन्ती तीर्थ, विजयातीर्थ एवं शुक्ल तीर्थ।।६ १॥ इन तीर्थो में श्राद्ध करने वाले पुरुष मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं । माठृगृह तीर्थ, करवीर पुर नामक तीर्थ ॥६२॥ समस्त श्रेष्ठ

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know